सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंग्रह कारक : १११
आत्म कारक ग्रह के नवांश पर से ग्रहों का फल
१ मेष नवांश-घर में चुहे और बिल्ली का उपद्रव, पाप दृष्टि हो तो विशेष कर, र शुभ दृष्टि हो तो थोड़ा उपद्रव हो ।
२ वृष ,,--चतुष्पद पशुओं से सुख हो । ३ मिथुन ,,--दाद खुजलो आदि रोग हो, कुष्ठादि रोग हो । ४ कर्क ,,--जल में डूबने का भय हो, कुष्ठादि रोग हो | ५ सिंह ,,--बाघ आदि हिंसक जन्तुओं या कुवकुर आदि जीवों से भय हो । ६ कन्या ,,--खुजली स्थूलता और अग्नि भय । ७तुला ,,--वणिज से लाभ, व्यापारी और वस्त्र आदि बनाने वाला । ८ वृश्चिक ,,--जल सपं आदि जन्तुओ से भय, माता के स्तन में पीड़ा या दुध की हानि ।
५ घन उच्च स्थान से या वाहन से क्रमशः ( कहीं २ रुक २ कर ) पतन हो । १० मकर ,,--जल जन्तु और पक्षी आदि से लाम | तथा ग्रह दुःख दायक हो, कंडु रोग, दृष्ट, ग्रन्थि, गंड माला आदि का भय ।
११ कुंभ ,,--तालाब, कूप जलाशय आदि बनावे ।
१२ मीन ,,-घर्म में नित्यता और मोक्ष पावे ।
१ शुभ राशि या शुभ नवांश में आत्मकारक हो तो धनी होता है ।
२ केन्द्र में अंश हो शुम हो तो राजा होता है । शुभ राशि के अंश में शुभ ग्रह हो
स्वउच्च, स्वगृद्दी आदि हो, पाप योग रहित हो तब उपरोक्त फल होता है ।
इनमें शुभ ग्रहों को दृष्टि हो तो अशुभ फल नाश होता है । पाप दृष्टि हो तो शुभ
फल का अभाव रहता है । अर्थात्
` १ यदि आत्म कारक के नत्रांश में या लग्न के नवांश में शुभ ग्रह हो और केवल शुभ
दृष्टि हो तो निश्चय रूप से राजा हो!
२ आत्म कारक के नवांश से केन्द्र या त्रिकोण में शुभ ग्रह हो पाप योग या दृष्टि न हो
तो धनी और विद्वान हो 1 मिश्र ग्रह (शुभ और अशुभ ग्रह) से मिश्र फल हो ।
३ पूर्वोक्त उपग्रह (मध्यमांश) यदि अपने गृह या शुभ राशि में हो उस पर पाप योग
या दृष्टि न हो तो मुक्ति का भागी हो ।
४ आत्म कारक यदि चन्द्र मंगल या शुक्र के षड्वर्ग में हो तो परस्त्रीगामी हो उपरोक्त स्थिति से अन्यथा हो तो फल भी अन्यथा होगा ।
कारकांश में ग्रह स्थिति का फल
आत्म कारक नबांश में यदि
१ सुर्य हो--राज्य कायं कर्ता हो 1