सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंग्रह कारक : ११३
| केवल शनि की दृष्टि--संन्यासी का भेष धारण करने वाला नकली संन्यासी हो । रवि और शुक्र की दृष्टि-राजभूत्य हो ।
ये फल आत्मकारकांश के कहे हैं आगे कारकांश के अन्स्थान का फल कहा है।
२ फारकांश से हितोय स्यान का फल
(१) द्वितीय भाव में शुक्र और मंगल का षड़वर्ग हो-पर स्त्री गामी । उसपर शुक्र और मंगल की दृष्टि हो-आमरण परपत्नी के रहे ।
उसमें केतु हो तो यह फल नहीं होता ।
द्वितीय में केतु हो उस पर पाप दृष्टि हो-तो शीघ्र बोलने में असमर्थ हो ।
(२) द्वितीय में गुरु-स्त्री में आसक्त ।
राहु-्त्री के हेतु धन का नाश ।
हे तृतीय स्थान फल
(१) कारकांश से तृतीय स्थान में पाप ग्रह हो-शूर प्रतापी ।
तृतीय स्थान में शुभ ग्रह हो-कायर ( डरपोक ) ।
४ चतुर्थं स्थान फल š
कारकांश से चतुर्थ में-चन्द्रमा या शुक्र का योग या दृष्टि ही-पक्का मकान हो ।
उच्च का ग्रह हो-प्रासाद ( पक्काघर ) ।
शनि या राहु का योग या दृष्टि हो-शिला गृह ।
मंगल केतु का योग या दृष्टि-इंट का घर 1
गुरु गा > लकड़ी का घर |
रवि ४. तृण का घर |
कारकांश से चतुर्थ में चन्द्रमा-आवरण रहित स्थान में हो गृहिणी (स्त्री ) के साथ
प्रथम समागम हो अर्थात् बिना परदे की जगह में स्त्रीसँयोग करने वाला ।
कारकांश से चतुर्थ में केतु हो-घड़ी बनाने वाला ।
बुध हो-परमहंस या दंडी ।
राहु -लोह यन्त्र बनाने वाला ।
सूर्यं -खड्ग धारण करने वाला ।
मंगल -भाला रखने वाला ।
५ पञ्चम स्थान फल
कारकांश से पञ्चम में मङ्गल और राहु हो तो-क्षय रोग की सम्भावना ।
उस पर चन्द्र की दृष्टि हो तो-निश्चय क्षय रोग हो ।
मङ्गल की दृष्टि-पिड़की आदि रोग का मय ।
केतु ,, संग्रहणी या जलोदर ।
राहु सहित गुलिक हो क्षुद्र विष का भय हो ।