भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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ग्रह कारक : ११७

षष्ठ मै राहु केतु -मूतादिक देवताओं में ।

-गणेश और कातिकेय में । पापराणि में शनि व शुक्र हों-क्ष॒द्र देवताओं में भक्ति । कारकांश का ओर भी विशेष फल १

कारकांश से ५--९ भाव में २ पाप ग्रह हों = मन्त्र तन्त्र जानने वाला । उस पर पाप ग्रह कौ दृष्टि हो = यह निग्रह ( दंड ) करने वाला हो । उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो = अनुग्रह करने वाला हो । आत्मकारक नवांश में चन्द्र हो 'उस पर शुक्र को दृष्टि हो-रस ( स्वर्णभस्म, मकर- ध्वज आदि ) का बनाने वाला और जानने वाला । उस पर वुध को दृष्टि-उत्तम धैच हो । आत्मकारकांश से चतुर्थ में चन्द्र हो उस पर शुक्र को दृष्टि हो-श्वेत कुष्ठी या पाण्डुरोग ।

चन्द्र हो मङ्गल को दृष्टि-रक्त पित्त से महारोगी । चन्द्र हो केतु की दृष्टि हो-नील कुष्ठी ।

आत्मकारकांश से ४ या ५ भाव में मङ्गल या राहु हो-क्षय रोगी ।

इस राहु पर चन्द्र की दृष्टि हो-निश्चय क्षय रोगी । आत्मकारकांश से ४-५ भाव में केवल मंगल हो-पिड़को ( फोड़ा आदि 'रोग ) होती है।

केवल केतु हो-संयहणो या जलोदर रोग । केवल राहु और गुलिक हो-विष वैद्य या विष से पीड़ित, या बिच्छू आदि क्षुद्र विष

से पोडित ।

आत्मकारकांश से २ या ३ भाव में केतु-बोलने में अक्षम ।

पाप दृष्टि हो-विशेष कर बोलने में अक्षम । कारक योग विचार द ( १') कारक-लग्न गत ग्रह का दशम चतुर्थ वाला ग्रह यदि उच्चादि राशियों में हो

तो कारक कहलाता ë ।

(२ ) स्वराशि का मूल त्रिकोण या उच्चगत ग्रह केन्द्र में हो और वंसा ही स्वगृहादि

स्थिति बाला ग्रह उससे दशम में हो तो कारक योग होता हैं । दशम स्थान में

वह तात्कालिक मित्र होता है इससे दशम का महत्त्व है। अर्थात्‌ जन्म समय मित्र

की राशि, स्व॒रांशि, उच्च या मूल त्रिकोण के ग्रह होकर केन्द्र में हों तो यह

कारक (सुख योगोत्पादक ) होते हैं। जैसे १,७,४,१० भाव bie उच्चादि

शुभ स्थान में ग्रह हो तो योग कारक होते हँ । उनमें ss में विशेष योग कारक

होते है । यहाँ लग्न से केन्द्र होना योग का हेतु नहो हे । यदि ग्रह अपने २

उच्चादि में होकर किसी भाव से भी परस्पर केन्द्र में हों तो भी ' योग्य कारक