सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
११ एकादश लाभ स्थान का फल
कारकांश से लाभ स्थान शुभग्रह युक्त या दृष्ट हो-भाई के 'सुख से से युत, सब
कार्यो में लाभ ।
हर पाप ss „ अनीतिसे लाभ करने वाला,
. विख्यात, पराक्रमी ।
१२ हादश (व्यय ) स्थान का फल
आत्मकारक नवांश से व्यय भाव शुभ ग्रह युत या दुष्ट-सत कायं में व्यय करने
वाळा और अन्त में सदगति पाने वाला स्वर्ग आदि शुभ लोक प्राप्ति हो ।
पाप ग्रह से युत या दुष्ट हो-असत कायं में खर्च । अन्त अघोगति पावे ।
आत्मकारक नवांश से व्यय भाव में कोई ग्रह न हो तो-शुभ फल ।
यदि स्वोच्च या स्वगृहो शुभ ग्रह हो-स्वगं आदि लोक को प्राप्ति ।
शुभ ग्रह से युत दृष्ट केतु हो-मोक्ष ।
शुभ ग्रह से युत या दृष्ट मेष या घनु में केतु हो-सायुज्य मुक्ति ।
केवल केतु हो या पाप ग्रह से युत दृष्ट-शुभ लोक की प्राप्ति नहीं होती ।
व्यय में केतु सूर्य युक्त हो-शंकर में भक्ति 1
» चन्द्र ,, -गौरी में ।
» शुक्र , “लक्ष्मी में ।
„ मङ्गल ,, -कातिकेय में ।
„ वघ शनि युक्त-विष्णु में ।
„# गुरु „ “शिव में ।
राहु से युत-तामसी दुर्गा में और क्षूद्र देवता में भक्ति ।
केतु - गणेश और कातिकेय में ।
पापराशि में शनि शुक्र हो-क्ष द्र देवताओं का भक्त हो ।
मीन या कर्क राशि हो : उसमें शुभ ग्रह हो-स्वर्ग आदि लोक प्राप्ति, सायुज्य
मुक्ति मिले ।
” | पाप ,, -नरक आदि की प्राप्ति हो ।
जिस प्रकार आत्मकारकांश के व्यय स्थान से देवताओं की भक्ति का विचार
होता है, उसी प्रकार आत्म कारकांश से षष्ठ स्थान से भी विचारना अर्थात्
बष्ट में सूर्य केतु -शिव में भक्ति ।
» चन्द्र ,, “गौरी में ।
„ शुक्र ,, लक्ष्मी में
`, मंगल ,, -कातिकेय में ।
» बुध ओर शनि -बिष्णु में ।
११ 8 ,, “पार्वती सहित शिव में ।