सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
११६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
११ एकादश लाभ स्थान का फल
कारकांश से लाभ स्थान शुभग्रह युक्त या दृष्ट हो-भाई के 'सुख से से युत, सब
कार्यो में लाभ ।
हर पाप ss „ अनीतिसे लाभ करने वाला,
. विख्यात, पराक्रमी ।
१२ हादश (व्यय ) स्थान का फल
आत्मकारक नवांश से व्यय भाव शुभ ग्रह युत या दुष्ट-सत कायं में व्यय करने
वाळा और अन्त में सदगति पाने वाला स्वर्ग आदि शुभ लोक प्राप्ति हो ।
पाप ग्रह से युत या दुष्ट हो-असत कायं में खर्च । अन्त अघोगति पावे ।
आत्मकारक नवांश से व्यय भाव में कोई ग्रह न हो तो-शुभ फल ।
यदि स्वोच्च या स्वगृहो शुभ ग्रह हो-स्वगं आदि लोक को प्राप्ति ।
शुभ ग्रह से युत दृष्ट केतु हो-मोक्ष ।
शुभ ग्रह से युत या दृष्ट मेष या घनु में केतु हो-सायुज्य मुक्ति ।
केवल केतु हो या पाप ग्रह से युत दृष्ट-शुभ लोक की प्राप्ति नहीं होती ।
व्यय में केतु सूर्य युक्त हो-शंकर में भक्ति 1
» चन्द्र ,, -गौरी में ।
» शुक्र , “लक्ष्मी में ।
„ मङ्गल ,, -कातिकेय में ।
„ वघ शनि युक्त-विष्णु में ।
„# गुरु „ “शिव में ।
राहु से युत-तामसी दुर्गा में और क्षूद्र देवता में भक्ति ।
केतु - गणेश और कातिकेय में ।
पापराशि में शनि शुक्र हो-क्ष द्र देवताओं का भक्त हो ।
मीन या कर्क राशि हो : उसमें शुभ ग्रह हो-स्वर्ग आदि लोक प्राप्ति, सायुज्य
मुक्ति मिले ।
” | पाप ,, -नरक आदि की प्राप्ति हो ।
जिस प्रकार आत्मकारकांश के व्यय स्थान से देवताओं की भक्ति का विचार
होता है, उसी प्रकार आत्म कारकांश से षष्ठ स्थान से भी विचारना अर्थात्
बष्ट में सूर्य केतु -शिव में भक्ति ।
» चन्द्र ,, “गौरी में ।
„ शुक्र ,, लक्ष्मी में
`, मंगल ,, -कातिकेय में ।
» बुध ओर शनि -बिष्णु में ।
११ 8 ,, “पार्वती सहित शिव में ।
ग्रह कारक : ११७
षष्ठ मै राहु केतु -मूतादिक देवताओं में ।
-गणेश और कातिकेय में । पापराणि में शनि व शुक्र हों-क्ष॒द्र देवताओं में भक्ति । कारकांश का ओर भी विशेष फल १
५
कारकांश से ५--९ भाव में २ पाप ग्रह हों = मन्त्र तन्त्र जानने वाला । उस पर पाप ग्रह कौ दृष्टि हो = यह निग्रह ( दंड ) करने वाला हो । उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो = अनुग्रह करने वाला हो । आत्मकारक नवांश में चन्द्र हो 'उस पर शुक्र को दृष्टि हो-रस ( स्वर्णभस्म, मकर- ध्वज आदि ) का बनाने वाला और जानने वाला । उस पर वुध को दृष्टि-उत्तम धैच हो । आत्मकारकांश से चतुर्थ में चन्द्र हो उस पर शुक्र को दृष्टि हो-श्वेत कुष्ठी या पाण्डुरोग ।
चन्द्र हो मङ्गल को दृष्टि-रक्त पित्त से महारोगी । चन्द्र हो केतु की दृष्टि हो-नील कुष्ठी ।
आत्मकारकांश से ४ या ५ भाव में मङ्गल या राहु हो-क्षय रोगी ।
इस राहु पर चन्द्र की दृष्टि हो-निश्चय क्षय रोगी । आत्मकारकांश से ४-५ भाव में केवल मंगल हो-पिड़को ( फोड़ा आदि 'रोग ) होती है।
केवल केतु हो-संयहणो या जलोदर रोग । केवल राहु और गुलिक हो-विष वैद्य या विष से पीड़ित, या बिच्छू आदि क्षुद्र विष
से पोडित ।
आत्मकारकांश से २ या ३ भाव में केतु-बोलने में अक्षम ।
पाप दृष्टि हो-विशेष कर बोलने में अक्षम । कारक योग विचार द ( १') कारक-लग्न गत ग्रह का दशम चतुर्थ वाला ग्रह यदि उच्चादि राशियों में हो
तो कारक कहलाता ë ।
(२ ) स्वराशि का मूल त्रिकोण या उच्चगत ग्रह केन्द्र में हो और वंसा ही स्वगृहादि
स्थिति बाला ग्रह उससे दशम में हो तो कारक योग होता हैं । दशम स्थान में
वह तात्कालिक मित्र होता है इससे दशम का महत्त्व है। अर्थात् जन्म समय मित्र
की राशि, स्व॒रांशि, उच्च या मूल त्रिकोण के ग्रह होकर केन्द्र में हों तो यह
कारक (सुख योगोत्पादक ) होते हैं। जैसे १,७,४,१० भाव bie उच्चादि
शुभ स्थान में ग्रह हो तो योग कारक होते हँ । उनमें ss में विशेष योग कारक
होते है । यहाँ लग्न से केन्द्र होना योग का हेतु नहो हे । यदि ग्रह अपने २
उच्चादि में होकर किसी भाव से भी परस्पर केन्द्र में हों तो भी ' योग्य कारक
११८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
समझे जाते हैं । जिनके जन्म समय इस प्रकार योग कारक हो वह नीच बंश में
भी उत्पन्न होकर राजा के समान धनवान. और सुखी होता हँ । राज बंशोपन्न
तो निश्चय हो राजा होता है। इसी प्रकार कारक की संख्या और कुल के
अनुसार अनुपात से फल समझना। जैसे
लग्न कर्क में चन्द्र गुरु हो, चतुर्थ में शनि
हो, सप्तम मंगल; दशम _ सूर्य हो- तो ये
सब ग्रह केन्द्र में उच्चवर्गी हैं भतः ये
परस्पर कारक हुए। ऐसे हो स्वगृही, मूल
विशषण वाले ग्रह भी कारक होते हैं ।
या चन्द्र स्वगृही होकर या उच्च का
होकर लग्न में हो ओर मंगल सूर्य शनि गुरु ये चारों ग्रह भी केन्द्र में हों तब सब ग्रह
कारक संज्ञक कहलायेंगे ।
या जन्म में सिह या मेष का सूर्य लग्न में हो तो सूयं शनि गुरु ये परस्पर कारक
संज्ञक हुए ।
( ३ ) कुंडली में शुभ ग्रह लग्न में हो और कोई भी ग्रह दशम या चतुर्थ में बैठा हो तो
वह कारक संज्ञक हो जाता है वह कारक ग्रह अपने उच्च राशि मूल त्रिकोण या
स्व राशि में हो तो फलदायक होता है ।
( ४ ) उच्च, मूल, त्रिकोण, स्वराशि, व स्वनवांश में बैंठा ग्रह दशम भाव में हो तो
विशेष कारक होतां है । इनमें भी विशेष कर सूर्य को यह कहा जाता है ।
(५ ) एक ग्रह दुसरे ग्रह से अच्छा सम्बन्ध होने से जन्म समय. कारक होते हैं जैसे गुरु
जन्म में सूर्य से नवम है तो यह कारक हो गया ।
शनि जन्म में चन्द्र से ग्यारहवां है तो यह कारक हो गया ।
शनि मंगल का कारक तब हो जाता है जब वह जन्म समय जहां है वहाँ से
ग्यारहवें में हो । ऐसी स्थिति लाभजनक होती है।
( ६) जो ग्रह दशम स्थान में ह वह॒ उस ग्रह से दशम स्थान में जो ग्रह है उस ग्रह में
विशेष कर कारक हो जाता है ।
(७ ) लग्न को छोड़कर परस्पर केन्द्र .में स्वक्षेत्र या उच्च या मूल त्रिकोण में हो तो
कारक होता ë । -
(८) जो ग्रह लग्न में हो यह ग्रह लन में दशाम में या चतुर्थ में हो तो कारक होता है ।
(९) इग्न में जो ग्रह हो उससे सर्व ग्रह कारक होता हूँ. परन्तु शेष स्थान में लग्न में
का ग्रह कारक नहीं होता ।
(१०) कारक होने का केन्द्र कारण है ऐसा नहीं है परन्तु जो ग्रह. स्वदोत्री उच्च या
मूल त्रिकोण में है व उसते दशम में. जो ग्रह है वह ऊपर बताये अधिकार का या
मित्र क्षेत्र का है तो कारक होता ë 1: यदि जन्म काल में उपरोक्त अधिकार को
ग्रह कारक: ११९
छोड़ कर केवल दशम स्थान में हो तो कारक नहीं होता क्योंकि उसे स्वक्षीत्र आदि का अधिकार नहीं है ।
(११) कारक ग्रह यात्रा व युद्ध के समय अवश्य देखना चाहिये क्योंकि उस समय (१) नीच का ग्रह (२) पराजित ग्रह (३) या लग्नेश का शत्रु ग्रह हो तो इन ३ ग्रहों की दशा में गमन नहीं करना ।
(१२) जन्म लग्नेश की दशा या उसके मित्र की दशा में या चन्द्र से दूसरे स्थान में शुभ ग्रह है तो उसकी दशा में या जिस:राशि का कारक है वहाँ उस राशि में चन्द्र ë तो युद्ध या यात्रा करने में सौख्य, धन प्राप्त होता है । इसके अतिरिक्त अन्य की दशा मे कष्ट होता है ।
(१३) सूर्य से दूसरे स्थान में शुभ ग्रह बुध, गुरु, शुक्र में से कोई हो तो जन्म सफल जानो । (१४) चार केन्द्र में से एकाघ केन्द्र में ग्रह न. हो तब भी जन्म सफल जानो । (१५) जन्मकाल में कारक ग्रह जिसे है उसका जन्म शुभ होता है जितना विशेष गुण हो उतना शुभ होता है।
(१६) यदि जन्म या यात्रा काल में शुभ ग्रह केन्द्र में न हो तो वह जन्म या यात्रा शुभ नहों समझना ।
(१७) जिसके देखि संज्ञक स्थान में ( सूर्य से दूसरे स्थान में ) शुभ ग्रह हो और लग्न और जन्म राशि अपने नवांश में स्थित हो और समस्त केन्द्र ( चारों केन्द्र ) शुभ ग्रहों से युक्त हों उसके घर में लक्ष्मी वास करती है अर्थात् कई पीढ़ियों तक द्रव्य का अभाव नहीं रहता ।
“ इस योग में जन्म लग्न ही केवल अपने नवांश में हो तो भी उपरोक्त फल होगा ।
(१८) जिसका गुरु, लग्नेश ओर जन्म राशि का स्वामी केन्द्र में बैठे हों उसका भाग्य
मध्यावस्था में (जवानी में) उदय होता. ह अर्थात् सुख हो, भाग्य का विस्तार हो।
(१९) उपरोक्त गुरु, लग्नेश और जन्म राशीश यदि .शीर्षोदय राशि में हों तो गुरु से
बालपने में, छग्नेश से मध्यावस्था में, और चन्द्र राशोश से बृद्धावस्था में भाग्यो-
दय होगा अर्थात् इनमें से जो भी शीर्षोदय राशि में हो उस अवस्था में भाग्योदय
गा ।
(२०) र 'कुण्डली में वर्गोत्तम लग्न, नवांश हो या चन्द्र वर्गोत्तम नवांश में हो उसका
` सारा जन्म शुभ होता है । (२१) जिसके चारों केन्द्र ग्रह रहित नहो हैं उसका सारा जम्म शुभ होता है । इसमें शुभ प्रह होने से विशेष शुभ होता ë ।
(२२) जिसके ग्यारहवें या दशर्वे या लग्न हो के सम्मुख ग्रह हों तो कारक योग होता ë ।
नीच वंश में उत्पन्न भो उच्चपद पाता ë ।
१२० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(२३) शुभ वर्गोत्तम में जिसका जन्म हो और बारहवे स्थान में शुभ ग्रह और अशून्य
कारक ग्रह हो तो--
सूय केन्द्र में होने से-राजा का सेवक ।
चन्द्रमा केन्द्र में होने से-वेल्य वृत्ति करने वाला ।
मंगल केन्द्र में होने से-वीर और शस्त्र की वृत्ति करने वाला ।
बुघ केन्द्र में होने से-पढ्ने वाला ।
गुरु केन्द्र में होने से-अपने अनुष्ठान में रत अच्छी बुद्धि वाला ।
शूक्र केन्द्र में होने से-विद्या और द्रव्य युक्त ।
शनि केन्द्र में होने से-नीच की सेवा करने वाला ।
पद लग्न या आरूढ़ लग्न निकालना
जिस कुण्डली में पद लग्न जानना हो तो देखो लग्न स्वामी कौन है और कहाँ पर
हैं । लग्न से जितने स्थान पर लग्ने होगा उस स्थान अर्थात् लग्नेश के स्थान से उतना
ही स्थान और गिनने पर जो राशि वहाँ ही वहो पदलग्न होगी । जैसे यहाँ पर लग्नेश
बुध ९ स्थान कुंभ में है। तो बुघ से स्लम
९ स्थान आगे और गिना तो तुला
आया । लग्न से पांचवें घर में है तो
यहाँ तुला पदलरन हुआ ।
यदि लग्नेश सप्तमम हो तो सप्तम
स्थान से गिनने पर वही सप्तम स्थान
आया जहाँ लग्न है । ऐसी परिस्थिति
में लग्न की राशि ही पदलग्न हुआ। जैमिनि ने पदलग्न का प्रयोग किया है इसे ही
लरनाख्ढ़ कहा है । इसे पद कहते हैं । पद शब्द Q ऊग्नपद ग्रहण करना ।
इसमें स्वस्थान या सप्तम राशि पर पद नही होता । यह भी कहा हैं कि जब
सप्तम स्थान पर पद होता हो तो चतुथं भाव को पद समझना ।
यदि स्वस्थान पर पद होता हो तो दशम भाव को पद समझना ।
जैसे जब चतुर्थ में लग्नेश हो तो उससे चतुर्थ गिनने पर सप्तम भाव में पद आता
है ऐसी परिस्थिति में चतुथं भाव को ही पद समझना ।
जब लग्नेश सप्तम में हो तो उससे सप्तम स्थान गिनने पर वह लग्न स्थान आ
जाता है तब दशम भाव को पद समझना बताया गया है । i
यह पदलरन महत्त्व का होता है । इसको भी लग्न मानकर फल या विचार
होता है । '
भाव पद
लर्न का पद qaq प्रत्येक भाव का पद निकाळ कर उससे फल का विचार होता
है । उस भाव का स्वामी जितने स्थान पर है उस भावेश के स्थान से उतना ही आगे
OR **्णाणाणा -— 1
ग्रह कारक : के `
गिनने पर भाव का पद निकलता है 1 जैसे दूसरे स्थान मे कर्त है जिमका स्वामी चन्द्र कर्क राशि से अष्टम स्थान कुम्भ में है तो उससे आगे ८ स्थान और गिना तो सिह. राशि आई यहां शनि है यह दूसरे भाव का पद हुआ । इसो प्रकार प्रत्येक भावका | पद समझना ।
ग्रहों का पद
उपरोक्त प्रभार से ग्रहों का भी पद निकलता हे । जिस ग्रह से उसका गृह (स्वस्थान) जितने घर आगे हो उससे उतना ही आगे गिनने पर उस ग्रह का आरूढ़ ( qz) समझना । जिस ग्रह की २ राशि हों उसकी प्रवठ राशि तक गिनतो कर पद समझ कर उसके अनुसार फल विचारना ।
उपपद् विधार
(१) सम राशि का लग्न हो उससे जो द्वितीय भाव हे उतरा जो पद हुँ उसको उपपद कहते है । इस की गणना उत्क्रम गणना से होतो ë!
(२) विषम राशि क! लग्न हो तो उस से बारहवें भाव का जो पद Š उस को उपपद कहते हैँ । इस का गिनती क्रम गणना से होती ë
जैसे यहां धन लग्न है zg विपम हँ इस
कारण यहां क्रम गणना से लग्न के पृष्ठवर्ती
बारहवें भाव में वृश्चिक राशि हुई जिस का
स्वामी मंगल, वृद्दिचक से ११ वें स्थान कन्या
में हूँ । इस कारण कन्या से ११ स्थान आगे
गिना तो ११ š स्थान पर कर्क आया यही
इस कुण्डली में उपपद हुआ । उपपद को
उपारूढ़ और गौण पद भी कहते हैं ।
लग्न पद का फल
पद लग्न से ११वें स्थान में ग्रह के अनुसार फल
(१) पाप ग्रह या छूम ग्रह का योग या दृष्टि हो-सुखी और घनवान हो ।
( २) शुभ ग्रह से युत या दृष्ट हो-नीति मार्ग से घनका लाभ हो ।
(३) पाप ग्रह से युत या दृष्ट हो-कुत्सित वृत्ति से <न लाम हो ।
(४) दोनों शुभ और पाप ग्रह युत या दृष्ट होतो सुमागं ओर कुमार्ग से घन
लाभ करे । š
(५ ) उच्च स्वराशि मूल त्रिकोण आदि राशि मे ग्रह हो-विशेष कर लाभ हो 1
२-(१) यदि लग्नाख्ढ स्थान मे १ रैवें स्थान का ग्रह देखे ऑर द्वादश स्थात को न देखे
तो अति घनवान हो ।
१२२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(२) यदि लग्नारूड स्थान से ११ बॅ स्थान को बहुत ग्रह देखें-उससे भी अधिक
घनी हो । राजा के समान हो बिना विघ्न बाधा के सदा धन लाभ हो । जितने
अधिक ग्रहों का योग हो उतना ही अधिक लाभ हो ।
(३) यदि लग्नारूह द्रष्टा ग्रह उच्च का हो-धनवान हो ।
(४) यदि seg द्रष्टा ग्रह पर अगंलाओं का संयोग हो-उससे भी अधिक
घनी हो ।
(५) अगंला शुभ ग्रह का हो-उस से भी अधिक घनी हो ।
(६) यदि ११ वां स्थान अपने शुभ स्वामी से दृष्ट हो उसमें भी यदि लग्न, भाग्य
आदि शुभ स्थान गत शुभ स्वामी से दुष्ट हो तो इस प्रकार के योगों में उत्तरोत्तर भाग्य की प्रबलता समझना ।
यदि पद से १२ स्थान में भी ग्रह का योग हो तो उक्त योगों में ग्रहों के
अनुसार फल मे न्यूनता आ जाती है । इस कारण ग्रह का योग या दृष्टि बारहवें
स्थान में न हो तव उपरोक्त उत्तरोत्तर घनवान होने का फल होता है।
लगन पद से १२ वें स्थान का फल
( १ ) शुभ ग्रह या पाप ग्रह से, युक्त या दृष्ट हो-अधिक खचं।
( २ ) पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो-पाप कमं में खर्च ।
( ३ ) शुभ ग्रह से युवत या दुष्ट हो-शुभ कार्य में खर्च ।
( ४ ) शुभ और पाप क्षेत्रों से युत या दुष्ट-अच्छे और बुरे दोनों कार्य में खर्च ।
( ५) द्वादश में राहु या केतु हो तो-राजा द्वारा खर्च ।
( ६ ) द्वादश स्थान में शुक्र सूयं. या राहु हो-राजाओं के द्वारा धन व्यय ।
( ७ ) द्वादश स्थान में बुध और शुभ ग्रह से दुष्ट हो-गोतियों द्वारा व्यय ।
( ८ ) पाप ग्रह से दृष्ट हो-कलह में व्यय हो ।
( ९ ) द्वादशा स्थान में गुरु और अन्य ग्रह से दुष्ट हो-अपने हाथ से ही धन का व्यय हो।
(१०) द्वाद स्थान में शनि या मंगल या दोनों हों, अन्य ग्रह से दृष्ट हो-कलह में
व्यय हो ।
(११) इ।दश स्थान में चन्द्र की दृष्टि हो-रा जाओं द्वारा व्यय ।
(१२) द्वादश स्थान में बुघ हो-दामाद द्वारा कलह से व्यय । `
(१३) द्वादश स्थान में गुरु हो-अपने हाथ द्वारा व्यय ।
(१४) द्वादश स्थान में मंगल और शनि हो-भाई के द्वारा व्यय ।
लग्न पद से १२ स्थान में जिन ग्रहों द्वारा व्यय होना बताया है उसी प्रकार के
ग्रहों के लाम स्थान में होने से उसी प्रकार घन का लाभ समझना ।
लग्न पद से सप्तम स्थान का फल
पद से सप्तम में राहु या केतु हो-उदर रोगी ।
केतु यदि पाप दृष्ट हो-साहसी, saq केश आदि अवस्था के चिह्न से युक्त ।
ग्रह कारक : १२३
पद से सप्तम में गुरु शुक्र चन्द्र में कोई हो या तीनों हों-भीमान् हो । पद से सप्तम में अपने उच्चगत शुभ या पाप ग्रह हों-कीति युक्त धनवान । लग्न पद से द्वितीय स्थान का फल
छान पद से हितीय में केतु हो-थोड़ी अवस्था में बुढ़ापे का चिह्ल। लग्न पद से द्वितीय में चन्द्र गुरु शुक्र-श्रीमान हो | sa पद से द्वितीय में शुभग्रह या पाप ग्रह उच्च का हो तो श्रोमान हो। लग्न पद से द्वितीय में केवर शुभग्रह-सावंभौम राजा या सर्वज्ञ हो । शुक्र हो तो-कवि और वक्ता हो । š जिस प्रकार पद से सप्तम में जिस ग्रह का जैसा फल कहा हे पद से द्वितीय स्थान से भी उसी प्रकार फल का विचार करना । आख्ढु स्थान से द्वितीय में-पाप ग्रह हो शुभ ग्रह न हों-चोर हो ।
बुध हो-सर्व विद्याओं का अधीश ।
गुरु-सर्वज्ञ ।
शुक्र-कवि या वक्ता ।
अब शेष फल जिस प्रकार आत्म कारक के नवांश में कहा है उसी प्रकार बहुषा ळग्नारूढ़ स्थान.से भी समझना । अर्थात् जिस २ प्रकार आत्म कारक के नवांश से जिन
२ स्थान में जो २ फल कहा Š उसो प्रकार लग्नारूढ स्थान से उसी २ स्थान में उसी २ फल का विचार करना ।
( बाघक के अभाव रहने पर स्वांश वश फल समझना अन्यया नहीं )
जिस प्रकार पद या लानःसे भावों के फल कहे हैं उसी प्रकार आत्म कारकांण से
भी समझता । | लग्न पद से विशेष विचार
(१) अञेन्द्र या कोण में सप्तम भाव का पद हो या दोनों पद सबल ग्रहों से युक्त हों
तो लक्ष्मीवान हो, विख्यात हो ।
(२) पद से ६-८-१२ भाव में सप्तम का पद हो-जातक निर्धन हो |
( ३ ) केन्द्र त्रिकोण और षष्ठ रहित उपपद में सप्तम भाव का पद-स्त्री पुरुष दोनों में
मित्रता हो । ` पद या उससे ३,४,५,७,९,१०,११ में बलवान ग्रह हो-स्त्री पुरुष दोनों में
5 मित्रता हो ।
( ४ ) पद से सप्तम का पद केन्द्र या त्रिकोण में हो तो-स्त्री पुरुष दोनों में मित्रता हो 1 ( ५ ) यदि पद से ६-८-१० भाव में. सप्तम का पद पई-स्त्रो पुरुष दोनों में शत्रुता हो।
( ६) उसी प्रकार पद से पुत्रादि के पद भो केन्द्र में पड तो पुत्र आदि से asr समझना । यदि विक में पड़े तो शत्रुता समझना | इसो प्रकार भाई-पिता-पृत्र
और अन्य से भी मंत्री या वैर का विचार करना 1
१२४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(७ ) तथा जिस भाव का पद लग्न पद से त्रिकोण में पड़े उस भाव की वृद्धि और
त्रिक ( ६-८-१२ ) में पड़े तो उस भाव की हानि समझना ।
(८) लग्न और सप्तम रो पद दोनों परस्पर केन्द्र त्रिकोण या ३-११ में पड़े तो जातक
पृथ्वीपति राजा होता है । -
(९) इसी प्रकार दोनों पदों को देख कर धन आदि भावों के भी फल विचारना ।
लग्नपद और अगला
(१) लग्नपद और उसके सप्तम में अप्रतिबन्ध अगंला पड़े-भाग्यवान हो ।
(२) प्रतिबन्ध रहित अर्गला में शुभ ग्रह या पाप ग्रह हो और वही ग्रह आरूढ लग्न को
देखें-भाग्य को प्रबलता हो ।
(३) प्रतिबन्ध सहित भगला में ग्रह हो तो-भाग्य योग को प्रबलता नहीं होती ।
(४) लग्नपद और उससे राप्तम इन स्थानों में शुभ ग्रह कृत अगला प्रतिबन्धक युक्त भी
हो-धन वृद्धि हो । ;
(५) इससे सिद्ध होता है कि लग्तपद और उस से सप्तम में पाप ग्रह कृत अर्गला हो
तो-सामान्य रूप से घन हो ।
उपपद का फल विचार
(१) उपपद पाप ग्रह की .राशि में हो या पाप युक्त या दृष्ट हो-प्रब्राजक संन्यासी हो
या स्त्री नाश या स्त्री रहित ।
(२) उपपद से शुभ ग्रह का योग या दृष्टि हो-स्त्री पु्रादि का (पूर्ण सुख हो, उक्त
फल नहीं होता ।
(३) उपपद में नीच का ग्रह या नीच नवांश स्थिति या पाप qg हो-स्त्री का नाश ।
(४) उपपद में उच्चस्थ ग्रह हो या उच्च ग्रह की दृष्टि हो-रूप गुणों से युक्त हो, बहुत
पत्नी हों ।
(५) उपपद मिथुन राशि हो-बहुत स्त्री हों ।
( ६ ) उपपद अपने स्वामी से युक्त हो या अपनो दूसरी राशि में हो-वृद्धावस्था में
स्त्री-नाश ।
( ७.) उपपद उच्च में स्थित हो-श्रेष्ठ कुल से स्त्री लाभ ।
( ८ ) उपपद नीच में स्थित हो-नीच कुल से स्त्री ञाभ ।
(९ ) उपपद शुभ ग्रह के षडबगं, योग दृष्टि आदि से सम्बन्ध हो-सुन्दर स्त्री ।
(१०) उपपद और उस का स्वामौ शनि और राहु से युक्त दुष्ट हो-लोक अपवाद से
स्त्री का त्याग या नाश ।
(११) उपपद और उस का स्वामी शुक्र, केतु से युक्त. दुष्ट हो-स्त्री को. रक्त प्रदर ।
(१२) उपपद और उस का स्वामी बुध, केतु से युक्त दुष्ट हो-अस्थिश्वाव रोग युक्त,
मोटी स्त्री प्राप्त हो 1
(१३) उपपद और उसका स्वामी शनि, सूर्य, राहु से युक्त दृष्ट हो-अस्थि ज्वर वाली ।
ग्रह कारक : १२५
(१४) उपपद और उसका स्वामी ३ ९ राशि में हो शनि मंगल से राहु युक्त दुष्ट हो- नासिका रोग वाली स्त्री प्राप्त । (१५) उपपद ओर उसका स्वामी १-८ राक्षि में हो शनि मंगल या राहु से युक्त दृष्ट हो-नाड़िका निःसरण वाली स्त्री प्राप्त हो (१६) उपपद और उस का स्वामी गुरु राहु से युक्त दृष्ट हो-दन्त रोग वाली स्त्री हो । (१७) उपपद और उस का स्वामी १०-११ राशि में शनि राहु से युक्त दृष्ट हो- लंगड़ी-वात रोग वाली स्त्री प्राप्त हो। (१८) उपपद शुक्र ग्रह रो युक्त दृष्ट हो-पुर्वोक्त अशुभ फल नहीं होता । (१९) उपपद से सप्तम भाव, सप्तम भाव के नवांश और दोनों के स्वामी पर भी विचार कर पूर्वोक्त रीति से फल कहना । : यहां-सूर्य अपने उच्च में स्व राशि में या मित्र गृही हो तो पाप ग्रह नहीं समझना किन्तु नोच य। शत्र, गृह में हो तो पाप ग्रह ही समझना । ( १ ) उपपद से दितीय स्थान में शुभ ग्रह की राशि या sq qz की दृष्टि या योग हो-स्त्री सुख हो । क ( २ ) उपपद से द्वितीय स्थान में मिथुन राशि हो-बहुत पत्नी हों । (३ ) उपपद या द्वितीय में उस का स्वामी हो या अन्यत्र भी उसका स्वामी स्वराशि में हो-तो वृद्धावस्था में उस के सामने ही स्त्री का मरण हो। ( ५) उपपद स्वामी या स्थिर स्त्री कारक ग्रह उच्च में हो-उत्तम कुल से स्त्री लाभ। . नीच में हो-नीच कुल से स्त्रो लाम । i i
(.६ ) उपपद या उससे द्वितीय में शुभ ग्रह का सम्वन्ध हो-उस की स्त्री सौंदये और गुणों से युक्त हो ( ७ ) उपपद या उससे द्वितीय में शनि राहु हो-अपवाद से स्त्री त्याग या स्त्री मरण । ( ८ ) उपपद या उम से द्वितीय में केतु और शुक्र हो-स्त्री को रक्त प्रदर हो ।
(९) उपपद या उस से द्वितीय में बुघ केतु हो-अस्थि थाव ।
(१०) उपपद या उससे द्वितीय में शनि राहु सूयं-अस्थि ज्वर ।
(११) उपपद या उस से द्वितीय में बुध राह-स्थूलांगी 1
(१२) उपपद से द्वितीय स्थान में ३-६ राशि में शनि मंगल हो-नासिका रोग युक्त ।
(१३) उपपद से द्वितीय स्थान में १-८ ),: ,, ल्क जि
(१४) उपपद से द्वितीय स्थान में गुरु शनि हो-कर्ण रोग और नेत्र रोग ।
(१५) यदि उसमें स्तर ग्रह छोड कर भिन्न राशि का मंगल बुध हो या राहु बुध हो-स्त्री
दन्त रोग से युक्त ।
(१६) उपपद या द्वितीय में १०-११ राशि में शनि राहु-स्त्री पंगु, वात रोग पीडित ।
(१७) इन योगों में यदि शुभ ग्रहों का योग या दृष्टि हो-तो अशुभ फल नहीं होता । घ
(१८) इस प्रकार लग्न से, qz से, तथा उपपद से जो सप्तम राशि हो उससे, उसके
स्वामी से, उस वे; नवांश से भी फल निकाजना । š
१२६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
( १ ) उपरोक्त स्थान में मंगल शनि हो-पुत्र हीन व दत्तक पुत्र वाला या सहोदर के के पुत्र से पुत्रवान ।
11 ० विषम राशि-बहुत पुत्र ।
पा ` ऐप -अल्प पुत्र
„ ३ नवम भाव में शनि, चन्द्र, वुध-सन्तान हीन ।
रवि गुरु राहु-बहुत पुत्र.। चन्द्र-एक पुत्र । मिश्र ग्रह हो-विलस्ब.से पुत्र ।
किन्तु सूर्य गुरु राहु के योग से जो पुत्र हो-वह बली प्रतापी होता ë 1
उपपद गें सिंह राशि हो-थोड पुत्र वाला ।
उपपद में कन्या राशि हो-अधिक कन्या ।
इसी प्रकार पञ्चम के नवांश से भी विचारना और जैसे लग्न - कुंडली से .विचार
कहा गया है वैसे ही त्रिशांश कुंडली में भी योगों से विचार करना ।
पद से ३ में शनि हो तो-छोटे भाई का मरण ।
११ में शनि हो तो--बड़े भाई का मरण ।
शुक्र हो तो--मातृ गर्भ का नाश करता है ।
लग्न या पद या उस से ८ में शुक्र का योग या दृष्टि हो--तो भी उपरोक्त फल 1
यदि ३-११ भाव में चन्द्र बुध गुरु हो--बहुत बड़े प्रतापी सहोदर होते हैं ।
यदि ३-११ भाव में केवल शनि हो--तो स्वयं शेष और सहोदर भाई नष्ट 1
केतु हो तो--अधिक बहिन होती ë ।
पद से ६ भाव में पाप ग्रह हो उस पर शुभग्रह की योग दृष्टि न हो--चोर हो ।
७ या १० स्थान में यदि राहु का योग या दृष्टि हो तो" ज्ञानी और भाग्यवान हो पद
मॅ बुध हो सब देशों का अधिप । गुरु--सर्वज्ञ । शुक्र--कवि और वक्ता !
उपपद या पद से द्वितीय स्थान में शुभग्रह--सब द्रव्यो से युत्त और बुद्धिमान ।
उपपद से द्वितीयेश यदि द्वितीय भाव में पाप युक्त हो--चोर हो ।
उपाख्ढ़ से जो सप्तमेश हो उससे द्वितीय स्थान में राहु हो--दंतुल ( दंष्ट्रावान ) हो 1
केतु हो--बोलने में अक्षम । शनि हो--कुरूप हो । मिश्र ग्रह से--मिश्र फल ।
अर्गला विचार
जिससे ग्रह का या भाव का फल निश्चित होता है उसे भगला कहते हैं ।
(१) किसी राशि के ग्रह से ४-२-११ स्थान में ग्रह हो तो अर्गला होता है ।
(२) इन तीनों अर्गछास्थानों के १०,१२, ३ घाधक स्थान हँ अतः इनमें ग्रह हो तो
उक्त अगला का प्रतिबन्ध होता है अर्यात् ४ का प्रतिबन्ध १०,२ कः १२ और ११
का प्रतिबन्ध ३ होता है ।
(३) अगला कारक ग्रह से बाघक स्थानस्थ ग्रह निर्बल हो या--न्यून संख्या में हो तो
बाधक नहीं होता । अर्थात् अगला ३ हो और बाधक २ ग्रह हों तो बाधक नहीं
होता है । या अर्गला कारक २ हो वाघक १ हो तो मी बाधक नहीं होता । बाघक
निर्बल हो तो भी बाघा नहीं होती ।
ग्रह कारक : १२७ (४) यदि तृतीय भाव में ३ या ३ से अधिक पाप ग्रह हों तो बाधा रहित विपरीत अगंला I होता है । उस अगला से भी फल की पुष्टता होती है (५) उसी प्रकार ५ स्थान अर्गला का ९ स्थान बाघक है । (६)
अर्थात्
राहु केतु
९
की
अगंला
सदा वक्रगति होने से अगला और बाधक स्थान विपरीत होते हैं, स्थान ५ बाधक स्थान है । (e) एक ग्रह से कनिष्ठ, २ से मध्यम, ३ या अधिक ग्रह से अगला श्रेष्ठ होती है । (८) इस प्रकार राक्षि और ग्रह दोनों से अगंला बिचारना । निर्बाध अगंला ही फल-प्रद है
उसका
सबाघा अर्गला निष्फल होती है। जो राशि या ग्रह सागंल हो उसको दशा में ही फल पुष्ट होता है । (९) अर्गछा और उसका प्रतिवन्ध भी राशि के प्रथम चरण में स्थित ग्रह को चतुर्थ चरण स्थित ग्रह से और द्वितीय चरण स्थित ग्रह को तृतीय चरणस्थ ग्रह से ही परस्पर स्पष्ट मान से समझना ।
(१०) ग्रह स्पष्ट करके अगला और उसका वाधक स्थान का इस प्रकार विचार करे । अर्गला स्थान ४ २ ११ ५ ३ राहु केतु का अर्गला स्थान ९ वाधक स्थान १० १२३ ९ ० राहुकेतुका वाधक स्थान प (११) अग्रह राशि = जिस राहि में ग्रह नहीं हँ । सग्रह राशि = जिस राखि में ग्रह हो । (१२) अग्रह राशि से सम्रह राशि बली होती हैं 1 यदि विचारणीय दोनों राशि सग्रह हों तो जिसमें ज्यादा ग्रह हों वह बली होती है। यदि दोनों में ग्रह की समता हो तो क्रमशः चर से स्थिर, स्थिर से द्विस्वभाव राशि बलवान होती है । अगला फल
(१) वद लग्न और उससे सप्तम भाव में निर्वाध अर्गला हो-विख्यात, भाग्यवान हो | (२) जिस ग्रह से अर्गला स्थान में पाप या शुभ ग्रह हो तथा उसका बाधक ग्रह न हो तो उस ग्रह की लग्न पर दृष्टि होने से भी-भाग्यवान, निरोग, सुखी हो I (३) इसी प्रकार धन आदि भाधों में अर्गला से घन आदि सुख होता हैं । (४) ६-८-१२ भाव का अगला अशुभ है शेष भाव में शुभ है ।
(५) इन में भी १-५-९ भाव की अर्गला अति शुभ है ।
(६) शुभ फल देने वाले ग्रह सागंल हों तो शुभ हैं ।
(७) अर्गला घन भाव में-धन धान्य युक्त हो 1 पाप फल देने वाले ग्रह सार्गल हों तो अशुभ होते हैं ।
तृतीय भाव-में-सहोदर आदि को सुख । अष्टम भाव में-कष्ट हो ! चतुर्थ भाव मे-घर पशु बन्धु कुल युक्त । नवम भाव मॅ-भाग्योदय हो ।
पञ्चम भाव मॅ-पृत्र पौत्रादि युक्त । दशम भाव मॅ-राज्य सम्मान ।
छठे भाव में-रिपु भव हौ । एकादश भाव में-लाम हो । |
सप्तम भाव में-धन स्त्री सुख बहुत हो । द्वादश भाव में-अधिक खचं हो । |
शुभ अगंला--बहुत सुख । पाप अती भष्म ।
१२८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड
लगन कुण्डली
ग्रहों झा अला निकालने का उदाहरण--
_ अर्गला स्थान | २ २ | ४५१११ राहु | ९
J: _बाधक स्थान HE १०| ९ | ३| केतु | ५
rd के भाव में| ग्रह ग्रह ET [ह
|?
बाघक है या नहीं ।
राहु | १० | केतु दोनों समान नहीं हैं केन्द्र से
मिथुन घन हि. खण्ड में है अंश बराबर
fz. स्व. द्वि. स्व. | है इससे अगला में प्रवलता नहीं होने से नहीं लिया ।
गुरु ३ x वाघा नहीं सूर्य शुक्र | १२.| गुरु अगला कारक २ बाघक १ है
x ° ° तो बाघा नहीं ।
राहु ९| > बाघा नहीं ।
केतु ३|। x |
x
केतु | १२| + n
|
गुरु रु ° ° >
चंद्र बुध | १० | श. बाधक केवल १ है बाधा नहीं
शुक्र सूयं | ९| x बावा नहीं
१ १ x ° ° J” ” ” ”
चंद्र बुध | १२ | केतु बाघक केचल १, बाघा नहों
स्. शुक्र 2 Q ” ” ” 3”
१५ 12 o 9 31 11 ” ”
१ | मंगल | ३ | सूर्य शुक्र बाधक में अधिक हैं बाधा हुई
० x बाघक नहीं
९ x
š x
षु x
७६00 ai 01. 000 x yi mia Tre
ग्रह कारक : १२९
भाव से अर्गला विचार
"EU ; <s É =
ग्रह I बाधक है या नहीं भाव ! ग्रह
बावक द्विस्वभाव में है बली है
बाघक है ।
. | वाधक ग्रह अधिक है बाधा हुई
बाधक ग्रह नहीं है
3 >?
दोनों समान बली हुँ अर्गला
प्रबल नहीं हे
बाधा नहीं
बाधा नहीं x णु,
I
4° | वाघक ग्रह कम है बाधा नहीं हुई च. बु. | बाधक द्विस्व० के प्रबलहे। | ,, |
बाघा है 1
बाधा नहीं केतु |
17 गुरु बा. कम ग्रह । बाघा नहीं हुई |च. बु. |
१३० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड
।
१२ | गुरु
बु
णु
x
x
सू | बाधक ग्रह अधिक हैं। बाघा हुई x
j q x
Tg
x २ | मंगल वृश्चिक| बाघक स्थिर में sas हुमा । x
स्थिर arar हुई x
° बाघा नहीं गु,
१० | > x र्यं २.
x | x x
१२ | केन्द्र बाधक कम ग्रह बाधा नहीं हुई gas.
बाधा सू.शु.
x
बाधक ग्रह कम हैं वाघा नहीं हुई हि. शु.
x | x
९| x बाधक नहीं र
३| > x केतु
x | x x
१० | केतु | दोनों समान बली ë अर्गला प्रवल | x
I घन नहीं है ।
३ | राहु | बाधक द्वि. भाव में हे बाघा हुई x
मिथुन हवि.स्व. x | x x
0 ० राहु
९ | केतु | बाघक हिस्वभाव में वळी š x
: बाबा हुई
.स्व.
३| > बाधक नहीं है चंद्रगुरु
१२ | x राहु x
१० चं. | बाधक में अधिक ग्रह बाघा हुई x
31 > वाधा नहीं सू. शु.
त SNR
अध्याय ७
गुलिक आदि विचार
गुलिक का फल भिन्न २ भावों में
१ लग्न में गुलिक-चोर, कूर, विनय रहित, वेद शास्त्र के ज्ञान रंहित, बहुत स्थूल
नहीं होगा, नेत्र दोष युक्त, बहुत बुद्धिमान नहीं होगा, बहुठ सन्तान भी
नहीं होगी । अधिक भोजन करेगा, सुख रहित, लम्पट ओर दुष्ट,
दुराचारी, अधिक आयु न हो, शुरवीर नहीं होगा, मुखे, मंद बुद्धि,
चिडचिडा स्तरभाव, रोगी, पापी, शठ, अति दुःखी ।
२ दूसरे भाव सें-कलह करने चाला, मिष्ट भाषी न हो, अन्न धन रहित, विदेश में रहे,
अपनी बात पर स्थिर न रहे, विवाद में बुद्धि पूर्वक भाग लेने योग्य
नहीं रहे, क्रोधो, विषयातुर, श्रमण झील, व्यथं बकवाद करने वाला ।
पाप युक्त हो तो दरिद्र और मूर्ख हो । निलंज्ज, दुःखी ।
३ तीसरे में-एकान्त प्रिय होने से चमंडो, नशेवाज, और इसी प्रकार के गुण होने में
प्रसिद्ध, विरह, अहंकार आदि दुर्गुण युक्त, विशेष कोप, घन एकत्र करने
में व्यग्र चित्त, शोक भय से रहित, भाई बहनों से रहित, सुन्दर स्वरूप,
सज्जनों का प्रिय, राजमान्य ।
४ चतुर्थ में-विद्या से रहित, घन वाहन, गृह सुल रहित, पारिवार रहित) परदेश वासी,
रोगी, पापी, वात पित्त रोग से पीड़ित ।
५ पञ्चम-अति चंचळ, शील रहित, पाप बुद्धि, अल्पपुत्र, अल्पआयु, निन्दक, निर्धन,
अल्प बुद्धि, gs, नास्तिक, बोयं होन, स्त्री के वश ।
६ षष्ठ-बहुत शत्रुओं को मारने वाला, भूत विद्या में विनोदो, पराक्रमो, अच्छे पुत्र
वाला, पुष्ट देह, उत्साही, लोक हित कारक, स्त्री का प्रिय, शत्रु होन ।
७ सप्तम-कलह करने वाला, दुष्टा स्त्री वाला, कई स्त्रियों का पति, स्त्री के वश, सर्व
जनों का विरोधी, कृतघ्न, मंद बुद्धि, अल्प ज्ञान, दुर्बल देह, अल्प क्रोधी ।
मैत्री हीन, महापापी, स्त्री के घन से जीने वाला ।
च अष्टस-कुरूप मुख, विक नेत्र, हस्त्रदेह ( ठिंगना ), दुःखी, क्रूर, कठिन रोग,
निर्धन, निर्दय, तिगुंण, क्षुधा से पीड़ित ।
q नवम-गुरुजनों तया पितरों को मारने वाला या उनसे त्यक्त, पुत्रों से त्यक्त, नीच
कर्म कर्ता, कुकर्मी, निर्दय, चुगलखोर, बहुत कष्ट, पानी सा ठंडा ।
१० दशस-सैकडों अशुभ कर्म युक्त, घामिक और अच्छा काम त्यागे, निज कुल के हितकारी आचरण से रहित । बिना मान वाला । दूसरों को कोई चीज देने का
मन न करे । पुत्रवान, सुखी, मोगी, देव मदत योगी !
x - "नै
१३२ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतोय फलित खण्ड
११ लाभ-बहुत सुखी, धनी, तेजस्वी, सुन्दर सन्तान युक्त, बुद्धिमान, शवितवान, ज्येष्ठ
भाई को मारने वाला, पूज्य, योगी, नेता, बंधु उपकारी, छोटा कद 1
१२ व्यय-विषय-वासना से रहित, दोन बचन में प्रवीण, सब का धन हरे, खर्च अधिक,
गरीब, आलसी, पापी, भाग्य होन, अंग होन, गुणी होकर भी नीच कर्मी ।
गुलिकेश विचार
झ्ुभ- गुलिक के ग्रह का स्वामी बल युक्त हो तो अच्छा फल होता है वह वर
युवत हो और केन्द्र या त्रिकोण में हो या स्वगृही, स्वउच्च या मित्र गृही
हो तो-उसके पास हाथी घोड़े आदि वाहन हों, वह कामदेव तुल्य सुन्दर हो,
बहुत माननीय हो, अति प्रसिद्ध हो और पृथ्वीपति हो 1
अनिष्ट- गुलिक से त्रिकोण गत लग्न में जो ग्रह हो उसके द्वादशांश या नवांश में
जो ग्रह हो, गुलिक से युवत, गुलिक स्थित राशि का स्वामी ये सब अनिष्ट
करने वाले होते हैं ।
) गुलिक का फल भिन्न ग्रहों के साथ
) गुलिक सूर्य युकत-अपने पिता का विरोधी या पिता को मारे या क्लेश देवे ।
रर चन्द्र “ -माता को क्लेश देवे ।
२१ मंगल ” -भाइयो से रहित, या भाइयों को खोवे ।
” बुघ ” -उन्मादी हो ।
११ गुरु ” -पाखंडी हो, दूसरों का दूषक हो 1
० शुक्र ”-नीच पुरुष, नीच स्त्री का स्वामी, स्त्री जनित रोग से निहत ।
शनि ”-कुष्ट व्याधि युक्त, अल्पायु, सोख्य से युक्त ।
” राहु "विष देने वाला, विषैले रोग से रोगी ।
” केतु ”-गृहादि जलाने वाला या अग्नि से पीडित ।
विष नाडी से युक्त गृह में गुलिक-राजा भी हो तो निश्चय भिखारी हो ।
जन्म में उपग्रह से युक्त गुलिक-अनिष्ट फल दायक ।
यम कंटक के साथ गुलिक-अच्छे फळ की आशा रहती है।
गुलिक बुरा फल देने में बहुत शक्तिमान है यह फल देने में शनि के समान है ।
गुलिक मृत्यु लाता है।
प्राणपद फल
१ लग्न में-दुबल रोगी, ग् गा, पागल, मूर्ख, अंग हीन, दुःखी, कृश ।
२ घन सँ बहुत घन घान्य नौकर तथा प्रजा से युक्त, सुन्दर सोभाग्यवान ।
३ सहज हिसक, गौरव वाला, निठुर, मलिन, गुरुओं का अभक्त ।
` ४ चतुथ-सुली, सुन्दर, मित्रों और स्त्रियों का प्रिय, गुरु भक्त, मुदु, सत्य वक्ता ।
५ पञ्चम-सुखी, सुकर्मी, दयालु, सव कार्यो में निपुण। _
१ |
„ गुलिक आदि विचार : १३३
६ षष्ठ - बंधु क और शत्रु के वश में रहनेने वाला, मंदाग्नि रोगीगी, अल्पायु, दया होन,
७ सप्तम-ईर्ष्यावान, कामी, कठोर, भयंकर रूप, सब से अप्रसन्न, sq fg ।
ड अष्टभ-रोगो, राजा, नौकर, बंधु ओर पुत्रों से सदा दु:खी ।
९ नवम ना, घनी, भाग्यवान, सुन्दर रूप, नौकरी करने वाला, सरल हृदय और पंडित ।
१० वशस-बलो, बुद्धिमान, राज कार्य में चतुर, पंडित, देव भक्त ।
११ लाभ-विख्यात, गुणी, पंडित, भोगी, गौर वणं, माता का प्रिय ।
१२ व्यय-क्षुद्र, दुष्ट, अंग होन, बंधुओं का द्वेषी, नेत्र रोगी, काना ।
प्राणपद गुलिक आदि निकालना ।
प्राणपद
३ घड़ी-१२ राशि | १५ पल- ३० अंश | इन प्रकार इष्ट काल की घटा-
१ घड़ी- ४ राशि | १ पल २ अंश | पल का राशि अंश आदि बना लेना ।
१९पल- १ राशि| १ विपल- २ कला। वह मध्यम प्राणपद हागी ।
राशि १२ से अधिक हो तो १२ से भाग देने से जो बचे उप लेना ।
फिर निरयन सूर्य स्पष्ट लेना, देखना यह चर स्थिर आदि किस राशि में है यदि
सूर्य स्पष्ट चर राशि में हो सूर्य स्पष्ट में मध्यम प्राणपद जोड़ देने से षष्ट प्राणपद
हो जायगा ।
यदि सूर्य स्पष्ट चर न हो तो उस से पञ्चम या नवम भाव में जो राणि हो उन
में देखना कौन चर राशि है वही चर राशि का अंक लेना और सूर्य स्पष्ट में राशि के
स्थान में प्राप्त चर राशि लेकर शेष अंश पूर्ववत रहेंगे । इसमें मध्यम प्राणपद जोड़ने
से स्पष्ट प्रणपद हो जायगा ।
उवाहरण
घ. प. वि. रा०
इष्ट १५-५१-४२ का प्राणपद निकालना है । सूयं स्पष्ट ११-५-४००४५ हैं ।
रा. ०
१५ घड़ी=१५ > ४-६० राशि=०-०-०=०
५१ पल=५१ X २=१०२ अंश=३-१२-:-०
४२ वि.=४२ > २८४ कर्ा=०-१-२४
š वि.= % २=१ कला-=०-०-१
मध्यम प्राण पद योग्=२¬१ ३-२५ `
सूर्य मीन का द्वि स्वमाब है यदि चर राशि का सूर्य होता तो इसी में मध्यम प्राणपद
जोड़ना पड़ता 1 यहाँ दिस्वमाव राशि होने से इसके पंचम और नवम को राशि खोजा 1
पंचम में कर्क चर राशि है। नवम में वृश्चिक स्थिर राशि है। तो चर राशि कर्क
— `
गुलिकम दिन | रविवार | सोमवार
१३४ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड
यहाँ लिया । मीन के स्थान में ककं राशि सिर्फ बदलेगी शेष अंश आदि यही रहेंगे ।
तब सूर्य रेरा.-५ ४४ ०-४५४ मानना पड़ेगा 1
रा. ० "
सूर्य ३- ५-४०-४५ सूर्य मीन का था उसके बदले कर्क का होगा
मध्यम प्राणपद ३-१३-२५ अंशादि वे ही रहे । जो ऊपर गणित से प्राप्त हुआ था ।
— °
प्राणपद ६-१५-५-४५ .'. तुला राशि पर प्राणपद आया ।
प्राणपद स्पष्ट ६रा.-१ ९०-५'--४५" आया १
गुलिक इष्ट जानना em नाला
| बुघवार | गुरुवार | शुक्रवार | शनिवार
NR < ५ SNR x ३ २ १
७ २ र् ७ ६ 64 ! ४
रीति-दिन में=दिन मान 7 ८-लब्धि एक खंड का मान %इष्ट दिन का दिनध्रुवांक-गुलिक दिन इष्ट । रात्रि में-रात्रि मान + ८=छब्वि एक खंड का मान X इष्ट
दिन का रात्रि-धुवांक=्गुखिक रात्रि खंड + दिन मान=्गुलिक इष्ट 1
उदाहरण- मंगवार का जन्म, दिनमान २९-५३-२५ रात्रिमान ३० -९-३५
रात्रि का जन्म है।
रात्रि मान ३०६-३५ + ¿=š घ०-४५ ५०-४९ वि० रात्रि का एक खंड हुआ ।
मंगल को रात्रि धुवांक १ से । ( ३-४५-४९ ) x (०-४ व०-४९ वि०
रात्रि गुलिक खंड ३-४५-४१ गुलिक इष्ट से लग्नवत् गुलिक लग्न निकाल
ब.
मंगलवार
+दिन मान २९-५३-९५ लेना ।
गुलिक इष्ट =३३-३९-१४
गुत आदि खंड के स्पष्टीकरण का I l — आदि खंड के स्पष्टीकरण का चक्र
बार १संड १ खड रेलंड २खंड ३ vse खंड अ '४खंड ५ खंड ६ खंड . ७ खंड ८ खंड
रविवार रवि चंद्र मंगल बुध शु शुक्र शनि x
सोमवार चंद्र मंगल बुध गुरु शुके शनि रवि x
मंगलवार मंगल बुध गुरु शुक्र शनि रवि चंद्र Xx
E बुधवार बुघ गुरु शुक्र शनि रवि चंद्र मंगल x
गुरुवार गुरु शुक्र शनि रवि चंद्र मंगल बुघ Xx
शुक्रवार शुक्र शनि रवि चंद्र मंगल वुध गुरु x
tamia ss 2 —— शनि रवि चंद्र मंगल बध गुरु शुत्र >
w s. Ti
गुलिक आदि विचार : १३५
बार १ खंड २ खंड ३खंड ४खंड ५१ खंड ६ खंड ७ खंड ८ खंड
रविवार गुरु शुक्र शनि रवि चंद्र मंगल बुध
सोमवार शुक्र शनि रवि चंद्र मंगल बुघ गुरु
मंगलवार शनि रवि चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र
बुधवार रवि चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि
गुरुवार चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि रवि
शुक्रवार मंगल बुध गुर qm शनि रवि चन्द्र
शनिवार बुध गुरु शुक्र शनि रवि चन्द्र मंगल
रात्रि खणड
, उपरोक्त दिन व रात्रि खण्ड देखने से प्रगट होगा कि शनि कोन-कोन खण्ड में है,
१ शनि का खण्ड=्गुलिक खण्ड जहाँ-जहाँ शनि है, वह गुलिक का खण्ड
२ गुर. ,, =्यमघण्ट ,, हुमा । गुरु से यमघंट, मंगल से मृत्यु, रवि
३ मंगल „ मृत्यु # से काल और बुघ से अद्ध प्रहर का खण्ड
४ रवि „ काल र होता है। किस दिन रात्रि या दिन में कोनwq ,, घ्अद्धंप्रहर ,, कौन सा खण्ड होता है ऊपर चक्र से समझ
पड़ेगा आठवां खण्ड बिना स्वामी के होता है ।
गुलिक यमघण्ट आदि का ध्रुवक उपरोक्त चक्रानुसार
लंड दिन राव रविवार nes सोमवार. मंगलवार मरी बुधवार गुरुवार शुक्रवार शनिवार
खंड
गुलिक दिन ७ ६ ५ ॐ ३ २ १
pis s 9 ३३०१ ३ २ ००० १ ७ < ५ v
यमघण्ट दिन ५ x 3 २ १ ७ <
(aÍ) राव t ४ ९४ ` — कंटक) रात १ ७ ६ ५ x 3 २३४०5
मृत्यु खण्ड दिन ३ र १० NAN 3
KOR ६ ५ x 3 तया” २ १ ७
कार दिन १ ७ ६ ५ x ३ २
५400 हात bas हर मको x ३ २ १ ७ < ç
अडंप्रहर दिन x 3 २ रै ७ ६ ५
अभ र 0 00 न > नि क नु सकन ७ ६ प् x 3 २ १
उपरोक्त विधि से यह मी जान सकते हैं कि इष्ट काल में किसी विक्षेष दिन को
कौन सा खण्ड हे ।