भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 142

१२६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

( १ ) उपरोक्त स्थान में मंगल शनि हो-पुत्र हीन व दत्तक पुत्र वाला या सहोदर के के पुत्र से पुत्रवान ।

11 ० विषम राशि-बहुत पुत्र ।

पा ` ऐप -अल्प पुत्र

„ ३ नवम भाव में शनि, चन्द्र, वुध-सन्तान हीन ।

रवि गुरु राहु-बहुत पुत्र.। चन्द्र-एक पुत्र । मिश्र ग्रह हो-विलस्ब.से पुत्र ।

किन्तु सूर्य गुरु राहु के योग से जो पुत्र हो-वह बली प्रतापी होता ë 1

उपपद गें सिंह राशि हो-थोड पुत्र वाला ।

उपपद में कन्या राशि हो-अधिक कन्या ।

इसी प्रकार पञ्चम के नवांश से भी विचारना और जैसे लग्न - कुंडली से .विचार

कहा गया है वैसे ही त्रिशांश कुंडली में भी योगों से विचार करना ।

पद से ३ में शनि हो तो-छोटे भाई का मरण ।

११ में शनि हो तो--बड़े भाई का मरण ।

शुक्र हो तो--मातृ गर्भ का नाश करता है ।

लग्न या पद या उस से ८ में शुक्र का योग या दृष्टि हो--तो भी उपरोक्त फल 1

यदि ३-११ भाव में चन्द्र बुध गुरु हो--बहुत बड़े प्रतापी सहोदर होते हैं ।

यदि ३-११ भाव में केवल शनि हो--तो स्वयं शेष और सहोदर भाई नष्ट 1

केतु हो तो--अधिक बहिन होती ë ।

पद से ६ भाव में पाप ग्रह हो उस पर शुभग्रह की योग दृष्टि न हो--चोर हो ।

७ या १० स्थान में यदि राहु का योग या दृष्टि हो तो" ज्ञानी और भाग्यवान हो पद

मॅ बुध हो सब देशों का अधिप । गुरु--सर्वज्ञ । शुक्र--कवि और वक्ता !

उपपद या पद से द्वितीय स्थान में शुभग्रह--सब द्रव्यो से युत्त और बुद्धिमान ।

उपपद से द्वितीयेश यदि द्वितीय भाव में पाप युक्त हो--चोर हो ।

उपाख्ढ़ से जो सप्तमेश हो उससे द्वितीय स्थान में राहु हो--दंतुल ( दंष्ट्रावान ) हो 1

केतु हो--बोलने में अक्षम । शनि हो--कुरूप हो । मिश्र ग्रह से--मिश्र फल ।

अर्गला विचार

जिससे ग्रह का या भाव का फल निश्चित होता है उसे भगला कहते हैं ।

(१) किसी राशि के ग्रह से ४-२-११ स्थान में ग्रह हो तो अर्गला होता है ।

(२) इन तीनों अर्गछास्थानों के १०,१२, ३ घाधक स्थान हँ अतः इनमें ग्रह हो तो

उक्त अगला का प्रतिबन्ध होता है अर्यात्‌ ४ का प्रतिबन्ध १०,२ कः १२ और ११

का प्रतिबन्ध ३ होता है ।

(३) अगला कारक ग्रह से बाघक स्थानस्थ ग्रह निर्बल हो या--न्यून संख्या में हो तो

बाधक नहीं होता । अर्थात्‌ अगला ३ हो और बाधक २ ग्रह हों तो बाधक नहीं

होता है । या अर्गला कारक २ हो वाघक १ हो तो मी बाधक नहीं होता । बाघक

निर्बल हो तो भी बाघा नहीं होती ।

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १) · पृष्ठ 142, कुल 418 में से · BharatKosha