सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 143, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रह कारक : १२७ (४) यदि तृतीय भाव में ३ या ३ से अधिक पाप ग्रह हों तो बाधा रहित विपरीत अगंला I होता है । उस अगला से भी फल की पुष्टता होती है (५) उसी प्रकार ५ स्थान अर्गला का ९ स्थान बाघक है । (६)
अर्थात्
राहु केतु
९
की
अगंला
सदा वक्रगति होने से अगला और बाधक स्थान विपरीत होते हैं, स्थान ५ बाधक स्थान है । (e) एक ग्रह से कनिष्ठ, २ से मध्यम, ३ या अधिक ग्रह से अगला श्रेष्ठ होती है । (८) इस प्रकार राक्षि और ग्रह दोनों से अगंला बिचारना । निर्बाध अगंला ही फल-प्रद है
उसका
सबाघा अर्गला निष्फल होती है। जो राशि या ग्रह सागंल हो उसको दशा में ही फल पुष्ट होता है । (९) अर्गछा और उसका प्रतिवन्ध भी राशि के प्रथम चरण में स्थित ग्रह को चतुर्थ चरण स्थित ग्रह से और द्वितीय चरण स्थित ग्रह को तृतीय चरणस्थ ग्रह से ही परस्पर स्पष्ट मान से समझना ।
(१०) ग्रह स्पष्ट करके अगला और उसका वाधक स्थान का इस प्रकार विचार करे । अर्गला स्थान ४ २ ११ ५ ३ राहु केतु का अर्गला स्थान ९ वाधक स्थान १० १२३ ९ ० राहुकेतुका वाधक स्थान प (११) अग्रह राशि = जिस राहि में ग्रह नहीं हँ । सग्रह राशि = जिस राखि में ग्रह हो । (१२) अग्रह राशि से सम्रह राशि बली होती हैं 1 यदि विचारणीय दोनों राशि सग्रह हों तो जिसमें ज्यादा ग्रह हों वह बली होती है। यदि दोनों में ग्रह की समता हो तो क्रमशः चर से स्थिर, स्थिर से द्विस्वभाव राशि बलवान होती है । अगला फल
(१) वद लग्न और उससे सप्तम भाव में निर्वाध अर्गला हो-विख्यात, भाग्यवान हो | (२) जिस ग्रह से अर्गला स्थान में पाप या शुभ ग्रह हो तथा उसका बाधक ग्रह न हो तो उस ग्रह की लग्न पर दृष्टि होने से भी-भाग्यवान, निरोग, सुखी हो I (३) इसी प्रकार धन आदि भाधों में अर्गला से घन आदि सुख होता हैं । (४) ६-८-१२ भाव का अगला अशुभ है शेष भाव में शुभ है ।
(५) इन में भी १-५-९ भाव की अर्गला अति शुभ है ।
(६) शुभ फल देने वाले ग्रह सागंल हों तो शुभ हैं ।
(७) अर्गला घन भाव में-धन धान्य युक्त हो 1 पाप फल देने वाले ग्रह सार्गल हों तो अशुभ होते हैं ।
तृतीय भाव-में-सहोदर आदि को सुख । अष्टम भाव में-कष्ट हो ! चतुर्थ भाव मे-घर पशु बन्धु कुल युक्त । नवम भाव मॅ-भाग्योदय हो ।
पञ्चम भाव मॅ-पृत्र पौत्रादि युक्त । दशम भाव मॅ-राज्य सम्मान ।
छठे भाव में-रिपु भव हौ । एकादश भाव में-लाम हो । |
सप्तम भाव में-धन स्त्री सुख बहुत हो । द्वादश भाव में-अधिक खचं हो । |
शुभ अगंला--बहुत सुख । पाप अती भष्म ।