सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रह कारक : १२३
पद से सप्तम में गुरु शुक्र चन्द्र में कोई हो या तीनों हों-भीमान् हो । पद से सप्तम में अपने उच्चगत शुभ या पाप ग्रह हों-कीति युक्त धनवान । लग्न पद से द्वितीय स्थान का फल
छान पद से हितीय में केतु हो-थोड़ी अवस्था में बुढ़ापे का चिह्ल। लग्न पद से द्वितीय में चन्द्र गुरु शुक्र-श्रीमान हो | sa पद से द्वितीय में शुभग्रह या पाप ग्रह उच्च का हो तो श्रोमान हो। लग्न पद से द्वितीय में केवर शुभग्रह-सावंभौम राजा या सर्वज्ञ हो । शुक्र हो तो-कवि और वक्ता हो । š जिस प्रकार पद से सप्तम में जिस ग्रह का जैसा फल कहा हे पद से द्वितीय स्थान से भी उसी प्रकार फल का विचार करना । आख्ढु स्थान से द्वितीय में-पाप ग्रह हो शुभ ग्रह न हों-चोर हो ।
बुध हो-सर्व विद्याओं का अधीश ।
गुरु-सर्वज्ञ ।
शुक्र-कवि या वक्ता ।
अब शेष फल जिस प्रकार आत्म कारक के नवांश में कहा है उसी प्रकार बहुषा ळग्नारूढ़ स्थान.से भी समझना । अर्थात् जिस २ प्रकार आत्म कारक के नवांश से जिन
२ स्थान में जो २ फल कहा Š उसो प्रकार लग्नारूढ स्थान से उसी २ स्थान में उसी २ फल का विचार करना ।
( बाघक के अभाव रहने पर स्वांश वश फल समझना अन्यया नहीं )
जिस प्रकार पद या लानःसे भावों के फल कहे हैं उसी प्रकार आत्म कारकांण से
भी समझता । | लग्न पद से विशेष विचार
(१) अञेन्द्र या कोण में सप्तम भाव का पद हो या दोनों पद सबल ग्रहों से युक्त हों
तो लक्ष्मीवान हो, विख्यात हो ।
(२) पद से ६-८-१२ भाव में सप्तम का पद हो-जातक निर्धन हो |
( ३ ) केन्द्र त्रिकोण और षष्ठ रहित उपपद में सप्तम भाव का पद-स्त्री पुरुष दोनों में
मित्रता हो । ` पद या उससे ३,४,५,७,९,१०,११ में बलवान ग्रह हो-स्त्री पुरुष दोनों में
5 मित्रता हो ।
( ४ ) पद से सप्तम का पद केन्द्र या त्रिकोण में हो तो-स्त्री पुरुष दोनों में मित्रता हो 1 ( ५ ) यदि पद से ६-८-१० भाव में. सप्तम का पद पई-स्त्रो पुरुष दोनों में शत्रुता हो।
( ६) उसी प्रकार पद से पुत्रादि के पद भो केन्द्र में पड तो पुत्र आदि से asr समझना । यदि विक में पड़े तो शत्रुता समझना | इसो प्रकार भाई-पिता-पृत्र
और अन्य से भी मंत्री या वैर का विचार करना 1