सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 154, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ें१३८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
३. परिधि फल
(१) लग्न मे-विद्वान्, सत्य वक्ता, शान्त, घनी, पुत्रवान्, पवित्र, दाता, गुरुभवत ।
(२) घन-महाघनी, सुन्दर, भोगी, सुधी, धर्मात्मा, राजा ।
(३) सहज-्त्री का प्रिय, सुन्दर देह, देव और कुटुम्ब का भक्त, नौकरो करने
वाला, गुरुभक्त ।
(४) चतुर्थ-विस्मय से युवत, सरल हृदय, संगीत ज्ञाता, शत्रुओं का भी हित
करने वाला ।
(५) पंचम-घनी, सुशील, सुन्दर, मधुर वाणी, धर्मात्मा, स्त्री का प्रिय ।
(६) षष्ठ-विख्यात, धनी, भोगो, सब जन्तु पर दया करने वाला, शत्रुओं को
जीतने वाला । ;
(७) सप्तम-अल्प सन्तान, सु खहीन, मन्द बुद्धि, निष्ठुर, रोगिणी स्त्री वाला ।
(८) अष्टम-अध्यात्म ज्ञानी, शान्त, चित्त, दृढ़ देह, दृढ़ प्रतिज्ञ, धर्मात्मा, बलवान् ।
(९) नवम-पुत्रवान्, सुखो, सुन्दर, धनी, स्थिर मानी और थोड़े में सन्तुष्ट होने
वाला ।
(१०) दशम-कलाओं का ज्ञाता, भोगी, मजबूत देह, सरल हृदय, सब शास्त्रों में
, निपुण ।
(११) लाभ-स्त्री से सुखी, बुद्धिमान, कुटुम्बियों का प्रिय, मन्दाग्नि रोग 1
(१२) व्यय-बहुत खर्च करने वाला, दुःखी, दुष्ट, बुद्धि, गुरुनिदक ।
४ चाप फल
(१) लग्न में-घन घान्य सुवणं से पूणं, कृतज्ञ, सज्जनों का प्रिय, सब दोषों से रहित ।
(२) घन-प्रिय वक्ता, दृढ़, धनी, विनीत, विद्यावान, सुन्दर, घर्मात्मा ।
(३) सहज-कंजूस, कलाओं को जानने वाला, चोर, अंग हीन, मित्र हीन ।
(४) चतुर्थ-सुखी, गो, घन धान्य से युक्त, राजमान्य, रोग हीन ।
(५) पंचम-सुन्दर, दुरदर्शी, देव भक्त, प्रिय वक्ता, सब कायं में सफल ।
(६) षष्ठ-शत्रुओं को जीतने वाला, अतिधूतं, सुखी, प्रेमी, पवित्र, सव कार्य
में लाभ ।
(७) सप्तम-ऐश्वयं युक्त, गुणो से पूर्ण, शास्त्रज्ञ, घर्मात्मा, जनप्रिय 1
(८) अष्टम-पापी, क्रूर, परस्त्री गामी, विकल अंग वाला ।
(_) नवम-तपस्वो, ब्रतघारी, विद्यावान्, लोक में विख्यात ।
s= (१०) दशम-बहुत पुत्र, घन ऐश्वयं, गौ भैंस आदि हो, लोक में विख्यात ।
L°. (११) छाम-सदा लाभ करने वाला, निरोग, प्रबल कोप, Tera, स्त्री प्रिय, अस्त्र
चलाने में निपुण । (१२) व्यय-दुष्ट, अभिमानी, कुजु, निर्लज्ज, धन हीन, वरस्त्रीगामी ।