भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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१४६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय-फलित खण्ड

विशेष संस्कार

यदि ग्रह उच्च में हो तो उक्त विधि से प्राप्त रश्मि संख्या > रे

82 मूल त्रिकोण 77 21 ”> x २

” स्वराशि ”> ”> ” x š

” अधिमित्र 5 x १. xš

” मित्र रु z र? अ.

” शत्रु ” ” 12 x 3

” अधिषात्रु टर पि ” xš

” समगृही ws ” > पुवे प्राप्त रश्मि ही

इस प्रकार सब ग्रहों की रश्मि निकाल कर सब को योग करना 1 जिस प्रकार ग्रहों

में रदिम निकाली गई है उसी प्रकार षड़वर्ग से भी रश्मि निकाली जाती है ।

होरा, नवांश, त्रिंशांश, द्वादशांश आदि से भी रश्मि निकालने के पूर्व प्राप्त रश्मि

में षड्वर्ग के अनुसार मैत्री का विचार कर देखना कि यह वगंस्वामी पंचघा मैत्री में सूर्य

आदि ग्रह (जिसकी रदिम प्राप्त हुई है) उसकी मित्र शत्रु या सम आदि है । उस मैत्री के

अनुसार पूर्वे प्राप्त रद्म में विशेष संस्कार करना पड़ता है तब उस वगग की प्रत्येक ग्रह

की रषिम जानी जाती ë ।

क्षेशवीय जातक में उच्च रदिमिसाधन कुछ भिन्न प्रकार से इस प्रकार बताया ë —

( ग्रह स्पष्ट-नौच ) = शेष से अधिक हो तो षड़भाल्प कर ग्रहण करना अर्थात्‌ १२

गशि से घटाकर ग्रहण करना । पदचात्‌ ६ का भाग देना तब उच्च पल कलादि में प्राप्त

तेता है । इसमें ६ गुणा कर १ अंश जोड्ने से उच्च रहिम होती है 1 यहाँ ६ का भाग

ने की विशेष रीति है--शेष में २ का गुणा कर राशि के अंश बना कर ६ का भाग

ने से उच्च पल आता है या शेष की राशि को अंश बनाकर २ का भाग देदेनेसेभी

च्च पळ प्राप्त होता है । यहाँ बताई रीति में कुछ भिन्नता है एवं कुछ अधिक

स्कार है।

यहाँ ६ का भाग देना बताया है वह उपरोक्त विशेष रीति से ही देना उचित है या

बके अंश बना कर ३ का भाग देने से काम चल जायगा ।