सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
१४६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय-फलित खण्ड
विशेष संस्कार
यदि ग्रह उच्च में हो तो उक्त विधि से प्राप्त रश्मि संख्या > रे
82 मूल त्रिकोण 77 21 ”> x २
” स्वराशि ”> ”> ” x š
” अधिमित्र 5 x १. xš
” मित्र रु z र? अ.
” शत्रु ” ” 12 x 3
” अधिषात्रु टर पि ” xš
” समगृही ws ” > पुवे प्राप्त रश्मि ही
इस प्रकार सब ग्रहों की रश्मि निकाल कर सब को योग करना 1 जिस प्रकार ग्रहों
में रदिम निकाली गई है उसी प्रकार षड़वर्ग से भी रश्मि निकाली जाती है ।
होरा, नवांश, त्रिंशांश, द्वादशांश आदि से भी रश्मि निकालने के पूर्व प्राप्त रश्मि
में षड्वर्ग के अनुसार मैत्री का विचार कर देखना कि यह वगंस्वामी पंचघा मैत्री में सूर्य
आदि ग्रह (जिसकी रदिम प्राप्त हुई है) उसकी मित्र शत्रु या सम आदि है । उस मैत्री के
अनुसार पूर्वे प्राप्त रद्म में विशेष संस्कार करना पड़ता है तब उस वगग की प्रत्येक ग्रह
की रषिम जानी जाती ë ।
क्षेशवीय जातक में उच्च रदिमिसाधन कुछ भिन्न प्रकार से इस प्रकार बताया ë —
( ग्रह स्पष्ट-नौच ) = शेष से अधिक हो तो षड़भाल्प कर ग्रहण करना अर्थात् १२
गशि से घटाकर ग्रहण करना । पदचात् ६ का भाग देना तब उच्च पल कलादि में प्राप्त
तेता है । इसमें ६ गुणा कर १ अंश जोड्ने से उच्च रहिम होती है 1 यहाँ ६ का भाग
ने की विशेष रीति है--शेष में २ का गुणा कर राशि के अंश बना कर ६ का भाग
ने से उच्च पल आता है या शेष की राशि को अंश बनाकर २ का भाग देदेनेसेभी
च्च पळ प्राप्त होता है । यहाँ बताई रीति में कुछ भिन्नता है एवं कुछ अधिक
स्कार है।
यहाँ ६ का भाग देना बताया है वह उपरोक्त विशेष रीति से ही देना उचित है या
बके अंश बना कर ३ का भाग देने से काम चल जायगा ।
ग्रहों का रिम फल विचार १४७ Ó—ÚA3+z2cYAO ,. . l lo llleJllJJ.lua.UUUUIDIDLLLliCCU— ा ाौ एक टे ॥ 7,8०० t= nA 3-०?= 1०५, š— °= n> o 2A— S= ४ण Ayo t= nË t-,१ट¬०१= ॥१९०,१९० र, ०९-४६ -}7} &2-४2-०१०५ १&-७४-४७ ४०००» ०६-४- १80 2८/-६९-७१ ०४०९-२० —— — Fnans,oa `x sx ax hx Yx sx ०३१८ २३-६३-६८ $३- "गेट tt—th-e= 8०७४० Ab—bA—At= 2£-2००%८८ भेष t-7h = t t t=. t t = t= t= 22-१६-2०४- 2/-६ ६-४ 8 ४८८ ९ —At-7= 2४३०४ ८०-०५ »/--५८-५०४- ११० “9? १9००) छड = ग्य 0 Wg oO ००1४09 अ: ५ 11 1 २० n १ ० 9
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१४८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
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फल का स्थूल विचार : १५१
मंतांतर--ग्रह की गति के अनुसार भी ररिम में संस्कार करना बताया है--
ग्रह वक्ती आरम्भन्रदिम x २
ग्रह की अंतभागनरक्मि-- किम
ग्रह वक्री मध्यभागरअनुपात से
रह्मि
१० ग्रह इंदरा तिरि
ग्रह बहुत मंद गति-- Ër
ग्रह को शीघ्र a= R — हे -
शीघ्रतर मतिरिह
राजयोग और दरिद्रयोग में रश्मियोग का विशेष संस्कार
राजयोग करनेवाले ग्रह और दरिद्रयीग करनेवाले ग्रह की रदिम को लेकर राजयोग
रदिम से दरिद्र रस्मि घटाना, जो राजयोग ग्रह की रश्मि शोष रहे बही स्पष्ट जानना । इसी
प्रकार शुभ, अशुभ, शत्रू , मित्र आदि ग्रहों या रहिम के सम्बन्ध से उपरोक्त विचार करना ।
इसी प्रकार कई इष्ट बल कष्ट बल में पृथक-पृथक ग्रह रदिम का गुणा कर इष्ट
रश्मि और कष्ट रदिम बनाकर उस पर से शुभाशुभ फल का विचार करते हैं ।
अध्याय ९
फळ का स्थूल विचार
पिछले अध्यायो में फलित विचारने के लिए किन-किन बातों का विचार करना
आवश्यक है यह बताया गया है । रदिमफळ, भावफल, प्रहफळ, दृष्टिफल आदि फल
बिचारने की अनेक बातें आगे बताई जायगीं ।
यहाँ फलित का स्थूल विचार दिया जाता है । जिसको जान लेने से फलित बिचारने
में सहायता मिळती है । यह बात ध्यान रहे कि परिस्थिति वश इस स्थूल में भो परिवर्तन
हो सकता हूँ । š
ग्रहों का मित्र, शत्रू, स्व, उच्च, नीच आदि जिस प्रकार की राशि में है वेसा विचार
कर फल कहना पड़ता है ।
१--भाव में पाप ग्रह हो-पापफल, भाव को हानि, विचारणीय विषय का नाश ।
२--भाव में पाप युक्त या पाप दृष्टनफल हानि ।
३--भाव में पाप ग्रह नीच काउ्सब फल नाश ।
४--भाव में शुभ ग्रहन्र्भावफल की वृद्धि ।
१५२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
५--भाव में मिश्चित ग्रह=मिश्रफल ( अच्छा और बुरा मिला हुआ फल /।
६--पापग्रह यदि मित्रराशि में या उच्च मेंच्शुभ फल ।
७--शुभग्रह यदि शत्रु राशि में, नोचराशि में या अस्त gl=m< फल
s: डी ग्रह नीच या शत्रु गृही पाप युवत या अस्त हो-्हानिकारक है, वुरा फल
1 है ।
९--कोई ग्रह दृष्ट स्थान में. हो था शत्रू गृही या नीच नवांशक में होम्त्अयुभ फल ।
१०--पापग्रह भी मूलत्रिकोण उच्च या मित्रगृही हो तो-भाव शुभ फल देता है,
उस भाव की वृद्धि करता है ।
११--पापग्रह भो जब केन्द्र, त्रिकोण जैसे अच्छे घर में होंच्ञच्छा फल देते हैं ।
१२--पापग्रह भी योगकारक ग्रह (उन्नति करनेवाले ग्रह) से सम्बन्ध हों तो अच्छा
फल देते हैं ।
१३--अच्छे या बुरे भाव किसी ग्रह से युक्त या दृष्ट न हों तो मध्यम फल देते हैं ।
१४--जो भाव शुभग्रह से युक्त या दुष्ट हों या पापग्रह युषत या दुष्ट न हो तो
शुभ फल देते हैँ ।
१५--भाव में नीच या शत्र क्षेत्री या अस्त ग्रह हो तो भाव फल निष्फल ।
१६--मिन्रक्षेत्री स्त्रक्षेत्री या उच्च या मूलत्रिकोण का ग्र हर् # वृद्धि करता ë!
स्त्रक्षेत्री, मित्रक्षेत्री, अधिमित्रक्षेत्री या उच्च का ग्रहन्शुभ दायक है 1
१७--कोई ग्रह स्व या उच्च का हो और उसी समय मित्रग्रह से युक्त या दृष्ट हो
तो घन युक्त राजा सरीखा पद देता है ।
¿—q अपने उच्च या मित्र के नवांश या राशि में शुभग्रह से दृष्ट हो तो शुभ
फल देता है ।
१९--ग्रह उच्च का हो ती इष्टबल देता है, परन्तु परमोच्च हो तो उस भाव का
उत्तम फल देता है, मूलत्रिकोण का उससे मध्यम फल देता है ।
मूलच्रिकोण ग्रह उच्च से अधिकार में कम है परन्तु यह अपने अधिकार में उत्तम
फल देता है उच्च के बराबर ही बलवान् होता ë ।
२०--उच्च, मित्र या बली ग्रह से युक्त या दृष्टग्रहःशुभ होता ë |
२१--स्वक्षेत्री उच्च या शुभवर्ग का ग्रह भाव को पृष्ट करता है !
२२--ग्रह समक्षेत्री हो तो सम फल देता ë ।
२३--स्वक्षेत्री, उच्च, मित्रक्षेत्री ग्रह पडबल में बलवान भी हो तो भी यदि
संधि में हो तो भाव का पूर्ण फल नहीं देता ।
२४--सुयं से उदय ग्रह यदि वक्री होकर निमंल कान्ति हो तो अच्छा फल देता ë ।
जळ तारा ( मंगल, बुघ, गुरु, शुक्र, शनि) यदि वक्री हो तो साधारण
अशुभ
२६--जिन ग्रहों के २ स्वस्थान ë उनमें जो उसका मूलत्रिकोण हो उसका प्रभाव
रहेगा उसी का फल जान पड़ेगा ।
७७ - क
फल का स्थूल विचार : १५३
: २७--ऐसे २ स्थान वाले ग्रह की दशा में उसके दोनों भावों का फल होगा पूर्वा
में दशाकाल में जो क्रम से आता हैं उसका फल रहेगा । इसमें विषम घर में उस ग्रह का
फल पहिले अनुभव होगा 1 सम राशि का बाद में ।
२८--भावेश अपने घर में हो या स्वस्थान पर उसकी दृष्टि हो या उसका स्वस्थान
शुभयुक्त या दृष्ट हो तो उस भाव की वृद्धि करता है । अर्थात् भावेश युक्त या दुष्ट या
शुभयुवत या दुष्ट भाव की वृद्धि होती है।
२९--भावेश स्वस्थानी, उच्च या मूलत्रिकोण का हो तो अच्छा फल देते हैँ अन्यथा
शुभ फल नहीं देते
३०--कोई भाव अपने भावेश से युवत या दुष्ट न हो तो मध्यम फल देते हैँ ।
३१--पाप ग्रह और भावेश के शत्रु से युक्त या दृष्ट ग्रह अनिष्ट फल देता है ।
३२--शुभ भाव के स्वामीयुक्त या दृष्टमाव जो पापयुक्त न हो, शुभ फल
देते हैं ।
३३--पापयुक्त, पाप भाव के स्वामीयुक्त, या पापदृष्ट, नीचगत, अस्तंगत, हीनबल
ग्रह अशुभ फल देते हैं ।
३४--पापयुबत या दृष्ट भाव की हानि होती है । परन्तु ६-८-१२ भाव में विपरीत फल होता हैं ।
३५--भावेश शत्रु गही या नीचराशि में हो, शुभयुबत या दृष्ट न हो तो उस भाव
का नाश होता है ।
३६--भावेश अष्टम में हो या अस्त, नीच या शत्रु गृही हो, कोई शुभयुक्त या
दृष्ट न हो तो उस भाव की हानि होती है । इसमें उस भाव से उस भाव का स्वामी
अष्टम हो या लग्न से अष्टम हो, दोनों प्रकार से विचारना । ,
३७--यदि शुभ ग्रह भी सिवाय भावेश के उपरोषत प्रकार से भाव में हो तो भावफल अच्छा नहीं देता । यदि पापग्रह उपरोवत प्रकार से हो तो उस भाव का फल पूर्ण
नाश हो ।
३८--किसी भाव का स्वामी जिप राशि में है उस राशि का स्वामी दुष्ट स्थान
में हो तो वह भाव दुर्बल हो जाता है ।
३९--भावेश् को छोड़कर अन्य ग्रह कुछ शुभ, कुछ अशुभ हो तो उस भाव का फल
मिश्च होता है ।
४०--भावेश यदि पापग्रह हो तो उससे युक्त या दृष्ट भाव जब वे नीच में या
अस्तंगत या शत्रू गृही न हों तो शुम फल देते हैं ।
४१--भावेश या उसके मित्र या शुभ ग्रह से युक्त व दृष्ट भाव हो तो फल की वृद्धि
होती है । ४२--भावेश पापयुक्त या दृष्ट हो या उसके घर में पापग्रह हो या पापदृष्टि हो
तो बुरा फल होता Š 1 उस माव के फल का हवास होता है।
१५४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
४३--शुभ राशिवाले भाव के स्वामी उन भावों में हों और वे पापयुक्त या दृष्ट
न हों तो उस भाव की वृद्धि होती है ।
४४--कोई ws पापग्रह और शुभ ग्रह दोनों से युक्त या दृष्ट हो या उस भाव
में शुभ और पापग्रह दोनों हों या उनकी दृष्टि हो तो मिश्रफल होगा ।
४५--कोई भावेदा शुभग्रह युक्त या दृष्ट हो या वह भाव शुभयुक्त या दृष्ट होतो
उस भाव का शुभफल होता है ।
४६--किसी भाव में शुभग्रह हो या शुभस्थान के स्वामी से युक्त या दृष्ट यह भाव
हो यदि उस भाव में दुष्टग्रह या दुष्टमावेश युक्त या दृष्टि न हो तो वह भाव अच्छा फल
देता है । यदि वह भाव बुरा धर है तो भी अच्छे ग्रहों के प्रमाव से अच्छा हो जाता है ।
४७--शुभ ग्रह जैसे शुभ या अशुभ स्थान में हो उसके शुभ या अशुभ फल को
बढ़ाते हैं और अशुभ ग्रह अच्छे या बुरे दोनों प्रकार के फलों को घटाते हैँ । इसलिये
शुभग्रह शुभ स्थान मे अतिशुभ और अशुभ ग्रह अशुभ स्थान में हो तो अशुभ फछ को
कम करने के कारण अच्छे होते हैं तथा शुभ घर में बैठकर उसके शुभ प्रभाव को घटाने
के कारण हानिकारक हैं ।
४८--म्रह जिस भाव को देखता है उसके बल को बढ़ाता हुँ । विशेषकर जब किसी
भाव का स्वामी होकर उस भाव पर दृष्टि डाळे तो उत्तम हे ।
४९--कोई भावेश अपने मिन्रस्थान, स्वगृह, मूलत्रिकोण या उच्च में हो तो अच्छा
फल देता है । यदि शत्रु स्थान या नीचगृही हो तो बुरा फल देता ë!
५०--भावेश उच्च स्थान में हो और नवांश में नोच स्थान में भा जावे तो उस
भाव का फल लाभजनक नहीं होगा । यह शीघ्र नीच फल देता है ।
५१--किसी भाव का स्वामी नीच में हो परन्तु नवांश में उच्च का हो जाये तो
उस भाव का फल अच्छा होगा ।
५२--प्रह केन्द्र, त्रिकोण व लाभ में वली होकर शुभ फल देते हैं ।
५३--शुभ ग्रह केन्द्र, त्रिकोण और लग्न में आयु बढ़ाते हैं ।
५४-केन्द्र और त्रिकोण के स्वामियों से शुभ सम्बन्ध करने वाला ग्रह शुभ
होता है ।
५५--ग्रह जो ३, ६, ११, २, ७, ८ भाव के स्वामी न हों शुभ होते हैं 1
५६--प्रह जो १, ४, १०, ११ भाव में हो और जिसे हषंबल प्राप्त हुआ हो शुभ
होता है।
५७--भावेश अस्तंगत या नीच का हो तो केन्द्र, त्रिकोण में रहने पर भी शुभ फल
नहीं देता परन्तु अडचन और कष्ट के उपरांत फल देता है ।
५८--भावेश अनिष्टकारी होने पर भावस्थित ग्रह उतना उपकारी नहीं होता क्यों -
कि भावस्थित ग्रह तो उसका किरायेदार के समान है असलो उस भाव का मालिक तो
भावेश ही है । इससे भाव में वैसा शुभग्रह उस भाव को बाहरी चमक अवश्य देता है;
फल का स्थूल विचार : १५५
परन्तु भावेश बुरा होने पर उत्पन्न सच्चे फल की प्राप्ति म॑ अडचन होतो है । इससे
पहिले भावेश से फल का विचार करना ।
५९--भावेश ओर भाव बलरहित हो और उस भाव का कारक पापग्रह के बीच में
हो या पापयुक्त या पापदृष्ट हो या शत्रुग्रह युक्त या दृष्ट हो तो उस भाव का फल नाश
'हो जाता है, दूसरे प्रकार से नहीं ।
६००-कोई भाव जहाँ लग्नेश हो उस भाव को उन्नति होती है ।
६१--भावेश लग्न से केन्द्र त्रिकोण या लाभ में हो या किसी भाव से उस भाव का
भावेश १-५-९-११ स्थान में हो तो उस भाव की वृद्धि होती है ।
६२--भावेश उच्चादि वर्ग में प्राप्त होकर बलवान् हो तो उस भाव की पुष्टि
होती है ।
३--छग्न आदि प्रत्येक भाव से विचार करना कि उस भाव से त्रिकोण या
४-७-१० घर मे शुभग्रह या उसका स्वामी हो और वहाँ पापग्रह का योग या दृष्टि न हो
तो उस भाव का सब फल शुभ होता है या भाव पुष्ट होता ë । यदि ऐसा न हो तो उनउन भावों का नाश समझना । मिश्रग्रह युक्त हो तो मिश्रफल होता ë ।
६४--किसी भावेश के साथ नवमेश हो तो लाभजनक है ।
६५--कोई भावेश शुभग्रह हो और छरन से तीसरे घर में हो तो साधारण फल
देता है ।
६६--कोई भावेश जहाँ हो उस भाव का स्वामी दुष्टस्थान में हो तो मूलभाव को
निर्बल करता Š । यदि वह उच्च, मित्रराशि या स्वराष्षि में हो तो उस भाव की पुष्टि
करता है ।
६७--जिस भाव से ११, २, ३, स्थान में गत उस भावेश के मित्र या उसके
उच्चस्थान के स्वामी हों और वे ग्रह अस्त, शत्रुगृही या नीच गत न हों तो उस भावको
पुष्ट और बलवान् करते हैं 1
६८--जो भावेश अपने अंश के बराबर होकर जिस भाव में हो उप्त भाव का पूर्ण
फल देता है ! भाव से अल्प या अधिक ग्रह का अंश हो तो अनुपात से उसके फल का
अनुमान करना । -
६९--भावेश से ग्रहों के पापस्य और शुभत्व में अन्तर इस प्रकार पड़ जाता है—
(अ) केन्द्रेश-पाप ग्रह हो = शुभ फल देता ë
शुभ ग्रह हो = अशुभ फल देता हैं
(ब) त्रिकोणेश--चाहे पाप या शुभ ग्रह हो = सदा शुभ ।
(म) केन्द्र में उत्तरोत्तर १-४७-१० भाव क्रम से वली होते हैँ । अर्थात्
लग्नेश और चतुर्थेश पापग्रह हों तो लग्नेश की अपेक्षा चतुथंश शुभ फल
देने में अधिक समर्थं होगा और दशमेश पाप ग्रह हो तो सबसे उत्तम
फल देगा । इसी प्रकार लग्नेश और चतुर्थेश शुभग्रह होतो लग्न की
१५६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड
अपेक्षा चतुर्थेश पापफल देने में अधिक बलवान् होगा । दशमेश यदि शुभग्रह हो तो सब से अधिक हानिकारक होगा । दशमेश से कम सप्तमेश
उससे कम चतुर्थेश उससे कम लग्नेश शुभग्रह होने पर हानिकारक होंगे ।
(द) त्रिकोण में पंचमेश से नवमेश बरी हैं । _
७०-लग्न से ५, ९, ४, ७ वां स्थान शुभयुक्त या दुष्ट हो, पापयुक्त या दृष्ट न हो
तो पूर्ण शुभ, यदि पापग्रहों का योग व दृष्टि हो तो भाव के शुभ फल का ह्लास हो जाता
है । शुभ पाप दोनों प्रकार के ग्रहों के योग व दृष्टि से मिश्रफल होता है ।
७१--किसी भाव से त्रिकोण ( ५-९ ) और २, ४, ७, १० भावों में शुभग्रह
हो और पाप दृष्टि न हो या भावेशयुक्त हो, पापयुक्त न हो तो बह भाव पुष्ट होता है ।
इसके विरुद्ध होने से भावफल नाश होते हैं, मिश्रग्रह होने से भावफल मिश्चित होता है ।
७२--ग्रह एक दूसरे से -६-८-१२ घर में हो तो बुरे होते हैं। कुछ हद तक
बुरा प्रभाव डालते हैं ।
७३--३, ६, ८, १२ भाव के स्वामी जिस भाव के साथ हों बुरे होते हैं ५, ९,
भाव के स्वामी अच्छे होते हैं ।
७४--४, ९, ११, २ भाव के स्वामी लग्न के सम्बन्धी हों और अधिक बलवाले
हों तो भाग्योदय करते हैं, कार्य सिद्ध होता है । ये भावेश बलवान और लग्न से सम्बद्ध
हों तब पूर्ण फल देते हैं। यदि निवळ हों तो दुःख देत हैं । मिश्रित हों तो मिश्रफल
देते हँ । इनका भाव कारक ग्रह, भावेश और भावगत ग्रह निर्बल हो तो विशेष कष्टदायक होते हैं । ;
७५--भावेश त्रिकोण या स्वस्थानी या ४, ७, १० घर में शुभयुक्त हो, पापग्रह
की दृष्टि न हो, नवम घर के स्वामी से युक्त हो और पापयुक्त न हो तो उस भाव की
उन्नति होती है ।
७६--जो ग्रह लग्न को देखे वह सुख और घन देता है ।
७७--भाव में शुभ ग्रह का पड्वर्ग शुभ होता है। पापग्रह का षड्वर्ग अशुभ
होता है ।
७८--पडवर्ग में बली ग्रह अर्थात् स्वक्षेत्री या अपने मित्र के द्रेष्काण, नवांश, त्र्यंश
आदि में स्थित ग्रह शुभ होता है 1
७९--षडवगं में निबंल ग्रह अर्थात शत्रुक्षेत्री आदि ग्रह अशुभ होते हैं ।
८०--पंचम घर में कको लग्न के नवांश या द्वादशांश में जो ग्रह हो वह शुभ फळ
` देताहे।
८१--नवम घर में जो राशि हो उसके नवांश या ढादशांश में जो ग्रह हो वह यदि
गुरु के द्रेष्काण में हो तो उसकी दशा शुभ होती है ।
८२-चतुर्थं भाव के नवांश या द्वादशांश में जो ग्रह अपने या चोथे लात के
द्रेष्काण में हो उसकी दशा में शुभ फल होता है ।
`
फल का स्थूल विचार : १५७
८३--ग्रह जिस भाव पें है उसका अधिकार सप्तवर्ग में जो है उस भाव के अधिकार प्रमाण अच्छा या वुरा पुर्ण फळ देते हैं ।
८ “--भावेश अपने भावस्थान में हो और वही कारक हो तो अच्छा फल देता हँ । ८५ कोई भावेश और उसका कारक भी बली हो तो अच्छा फल देगा ।
लग्नेश विचार
१--जिस भाव में लग्नेश हो उस भाव के फल को वृद्धि होती है ।यदि वह भाव या उसका भावेश बली हो तो भावफल अच्छा देगा । बलहीन हो तो दुःख देगा ।
२--परन्तु लग्नेश जिस भाव में अष्टमे से युक्त हो उस भाव की हानि होती है ।
३--लग्नेश जिस भाव-स्वामी के साथ हो उस भाव का फल देगा । यदि यह भाव या भावेश बली हो तो अच्छा फछ देगा बलहीन हो तो दुःख देगा ।
४-०लेग्नेषा पापग्रह हो तो वह जहाँ हो उस भात्र के फल को बढ़ायेंगा । यदि वह ६-८-१२ भाव का स्वामी हो तो छान के स्वामित्व का फल बढ़ेगा न कि दसरे का जैसे लग्नेश मंगल सिहराशि का पंचम में हो और शुभग्रहों को दृष्टि हो ततो बहुत शीघ्र
पंचमभाव का फल देगा।
५--अ्रह अष्टमेश होकर लग्नेश भी हो तो शुभ समझा जाता है ।
६--लग्नेश के साथ जो ग्रह हो या जो ग्रह लग्नेश को देखे उस ग्रह का स्वस्थान
क्या है माळूम करें, इन्हीं भावों के प्रभाव का फल लग्नेश के प्रभाव से बढ़ेगा ।
७--जो भाव लग्नेश के अष्टकवगं में बहुत शुक्र रेखा लिये हो यदि उससे
सम्बन्धित स्वामी थलो हो और लग्नेश के साथ हो तो फल सुखप्रद होता है ।
८ लग्नेश लग्न में हो, स्वनवांश में हो व सब ग्रहों में बली हो उसका जो रूप,
गुण, स्वभाव आदि लग्न से विचारणीय वातें हैं बह बहुत करके उस ग्रह के प्रभाव से
होते हैं ।
९--लग्नेश लग्न में न होकर दूसरी जगह. हो यह जिस ग्रह के नवांश में हो उस
ग्रह सरीखा भावफल देता है ।
१०--लग्नेश गुरु हो, लग्न में हा तो लगन वलवान् हो जाता है । यदि उस गुरु
पर बुघ को दृष्ट हो तो, लग्न और बली हो जाता है परन्तु और ग्रहों को दृष्टि लग्न
पर नहों होती ।
११--ह स्नेश शुभग्रह युक्त शुभराशि में व मित्रगृही या उच्च में हो तो लग्न शुभ
वर्गाधिक्य होने से इनके सम्बन्ध के सब शुभ फड होंगे ।
१२--छग्नेश ६-८-१२ भाव के स्वामियों के माथ हो तो बुरा है !
१३--लग्नेश वलहीन हो और उसमें पापग्रह हो तो और बुरा है, रोगी रहेगा ।
१४--लग्नेश बलहीन होकर केन्द्र, त्रिकोण में हो तो बुरा स्वास्थ्य रहे।
१५--लग्नेश जहां हो उस भाव का स्वामी ६-८-१२ भाव में हो तो शरीर रण
= <ë ।
१५८ : ज्योतिष-जिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
१६--वः लग्नेश शुभग्रह युक्त या दृष्ट होकर जिस भाव में हो उस भाव का
विशेष शुभ फल और यदि नीच या शब्गृही हो तो अशुभ फल होगा ।
१७--लग्नेश अष्टम हो तो स्वास्थ्य विगड़ेगा परन्तु शत्रुदृ ष्ट हो तो बुरा फल नहीं
होता ।
लग्न
१--लग्न में जो ग्रह ३ उस सरीखो भावोक्त बातें होती हैं । यदि वहां २-४ ग्रह
हों तो उनमें से जो बली हो उसी सरोखा फल होगा । ग्रहों के आयुप्रमाण से जो वली
हो उस ग्रह का गुण दोष आगे होगा उसकी अपेक्षा कम बळ वाले का प्रभाव होगा ।
२--लग्न अधिक पापवर्ग हो, उसका स्वामी पाप या पापराशिगत या शत्र”
राशि व तीचराशि में हो तो लग्न सम्बन्धी अनिष्टफल होगा। एक प्रकार से शुभ
और अन्य प्रकार से अशुभ हो तो मिश्रफल होगा । जैसे लग्गेश शुभराशि में नीच व
शन्रुराशि गत हो या लग्नेश पापराशि में मित्र या उच्चराशि में हो तो मिश्रफल होगा ।
३--इसी प्रकार हितीय, तृतीय आदि भाव के सम्बन्ध में विचारना ।
४--छर्न पापग्रह युवत और अस्तंगत हो तो निर्बल होकर दुष्टफल देता है l
५--लग्त के पूर्वार्ध में जो लग्न है वह प्रत्यक्षे फल देता है । पराद्धं में जो ग्रह है
बह परोक्ष फल देता है ।
६--.लग्न व लग्नेश दोनों पूर्णबली हों तो फल वृद्धि हो । दोनों बलहीन हों तो फल
की हानि हो ।
७-- लग्न स्वट्टादशञांदा या स्पद्रेष्काण में हो तो वह शुभ होता है ।
८--लछग्न और उसका नवांश आरम्भ में पूर्ण फल देता है । मध्य में मध्यम और
अन्त में अशुभ फल देता है ।
९--लग्न में सौम्य ग्रह का नवांश शुभ होता है । पाप या शत्र् राशि का नवांश
अशुभ होता है !
१०--लग्न में पापग्रह हो तो स्वास्थ्य बिगड़े ।
११--लग्न में शुभ राशि हो तो दीर्घायु एवं सुखी ह्रो ।
१४--लग्न को ल नेश देखता हो तो धन और करीति की वृद्धि हां ।
भाव से २-१२ स्थान ( दिर्ढादश योग )
१--यदि किसी भाव का स्वामी या किसी भावविद्येष में एक ओर शुभ ग्रह हो
दुसरी ओर भी शुभ ग्रह हो अर्थात् शुभ ग्रहों से घिरा हो तो उप भाव के फळ की बुद्धि
होगी । जैसे चतुर्थ स्थात लो, इसके पहिले अर्थात् तीसरे भाव में और आगे पंचम भाव
में शुभग्रह हो तो शुभ ग्रहों के बीच यह चतुर्थ भाव हुआ ।
२--यदि कोई भाव दोनों ओर से पाप ग्रहों से घिरा हुआ हो तो उस भावका
फल नष्ट होगा ।
फल का स्थूल विचार : १५९
३--यदि एक ओर शुभग्रह दूसरी ओर अशुभग्रह हो तो मिश्रफल होगा ।
२ और १२ भाव पर विचार
१--व्ययेश और धनेश अपने स्वभाव के अनुसार फल नहीं देते । ये भाव, भावेश
और राशि के अनुसार फल देते हैं ।
( अ ) जिस प्रकार शुभ या अशुभ घर में हो ।
( आ ) जिस प्रकार शुभ या अशुभ भावेश के साथ हो।
(इ) या जिस स्थान का स्वामी हो वह राशि जैसी शुभ या अशुभ हो उसी के
अनुसार शुभ या अशुभ फल देते हैं ।
अर्थात् ( क ) द्वितीये के साथ जो ग्रह हो वह अपना ही फल देगा यदि वहाँ बहुत
ग्रह हों तो उनमें जो बली हो उसके अनुसार द्वितीयेश फल देगा ।
( ख ) यदि किसी ग्रह का साथ न हो तो जिस अन्य स्थान का स्वामी हो उसी के
के अनुसार फल देगा ।
( ग ) यदि वह अन्य दूसरे स्यान का स्वामी भी न हो जैसे सूर्य और चंद्र जिनका
एक ही स्वस्थान है तो हितीयेश जिस भाव में बैठा हो उसके अनुसार फल देगा ।
( घ ) यदि ये योग न हों तथा अन्य स्थान का स्वामी भी न हो और अपने स्थान
में ही हो तो वह अपने स्वभाव के अनुसार ही शुभ या अशुभ फल देगा ।
२--इसी प्रक्रार व्ययेश का फल भी विचारना ।
३-२-१२ भाव के स्वामियों का अपना कोई विशेष गुण-दोष नहीं है । ये स्वामी
जिस भाव में पड़े हों, जिस ग्रह के साथ हों, जिस भाव में पड़े हो, उस भाव का स्वामी
किस भाव में पड़ा है इन तीनों रीति से उस के गुण दोष विचारना अर्थात् शुभ स्थान में
शुभ युक्त हो तो शुभ, अशुभ स्थान ( ६.८.१२ भाव ) या अशुभ ग्रह युक्त हो तो अशुभ
होता है ।
धनभाव
१--घनेश धन रखनेवाला है उसके साथ यदि पापी ( दुष्ट ) रहता है तो उसके
घन को समय पाकर नष्ट कर देता है और यदि उसके साथ शुभ अर्थात् शुभावितक रहे तो
उसके धन की रक्षा करेगा इस कारण घनेश अपने साथो के अनुसार फल देता है ।
इससे द्वितीयेश अपने साथी, स्थिति और दृष्टि के अनुसार अच्छे या बुरे हो जाते gë!
२--घनेश जहाँ हो उस भाव राशि को जगह में विशेष वृद्धि करते हैं। वह राशि
जिस दिशा की है उस ओर से द्रव्यलाभ होता है । यदि वक्री हो तो सब दिशाओं में
लाभ हो । र
३--द्वितीयभाव में अच्छा ग्रह हो और हितोयेश शुम ग्रह हो तो उसकी दशा मे
उन्नति होगी । शुभ वार्ता सुनने का आनंद होता है ।
४--द्वितीयेश पापग्रह हो पापयुक्त हो तो दणा-अतर्दशा में अग्नि, शस्त्र चोर आदि
शोक के द्वारा हानि हो साधारण असुख हो ।
१६० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
५--द्वितीयेश पापग्रह हो तो जब उस राशि में बुरे ग्रह आवें तो उस समय जिम्मे-
दारी का काम करने से हानि होगी ।
२-७ भाव
१--२-७ घर मारक होने से अशुभ समझे जाते हैं । इन स्थानों के स्वामी मारकेश कहलाते हैं ।
२--यह अशुभ होकर २-४ घर में हों तो अशुभ होते हैं ।
३--ग्रहो के स्वस्थान में सप्तम स्थान अशुभ समझा जाता ë । जैसे मकर का
चन्द्र । यह चन्द्र के स्वस्थान ककं से सातवाँ है !
तुतीय भाव
१--कोई भावेश पापग्रह हो तो वह लग्न से तीसरे घर में पड़ जाय तो अच्छा
फल देगा ।
२--यदि शुभ ग्रह तीसरे स्थान में पड़े तो मध्यम फल देगा जैसे नवमेश गुरु तीसरे
स्थान में हो तो गुरु शुभ होने से मध्यम फल देगा ।
चतुर्थंभाव
१--चतुर्थं और दशमभाव विशेष शुभ होते है । इनमें शुभ ग्रह अच्छे है पाष ग्रह
कुछ कष्ट देते हैँ ।
२--शुभ ग्रह उच्च या स्वक्षेत्री या चतुर्थ में हो तो पशु वाहन आदि प्राप्त हो,
चन्द्र हो तो अन्न मिले, शुक्र हो तो गाने-बजाने में रचि हो, गुरु हो तो धन याः उत्तम
बाहन प्राप्त हो ।
पाप ग्रह मंगल हो तो अग्नि भय, भूमि हानि आदि, सूयं हो तो राजभय, राहुं हो
तो बिष आदि का भय, घनहानि, शनि हो तो शरीर कष्ट हो ।
पंचमभाव
१--पंचमेश बुरे स्थान में हो तो अशुभ समझा जाता है ।
२--पंचमेश क्रूर ग्रह हो तो भी शुभ होता है !
३--पंचम घर में दशमेश हो तो सुखदायक होता है ।
४- पंचम में गुरु हो या ९-१२ राशि हो तो संतान का दुःख हो ।
षष्ठभाव
१--कोई कहते हैं कि छठे घर में, ग्रह अच्छा फल देता है, कोई कहते हैं बुरा
फल देता ë परन्तु सिद्धांत यह हैं कि--
पापग्रह किसी भाव में हो उस भाव के फल को नष्ट करते हैं या कम करते हैं और
शुभग्रह किसी भाव में हो तो उस भाव के फळ को बढ़ाते हैँ ।
२---छठा भाव रोग, ऋण, शत्रु का मुख्य स्थान है यदि पापग्रह वहाँ हो तो उस
भाव के बुरे फल को नाश करेगा अर्थात रोग शत्रु ऋण आदि नष्ट होने से अवश्य
सुख होगा ।
फल का स्थूल विचार : १६१
यदि अच्छे ग्रह यहाँ हों तो उस भाव के फलको बढ़ावेंगे अर्थात् रोग आदि की
वृद्धि होगी ।
3—= कई का मत है कि छठे भाव में ग्रह विरुद्ध फल देता है । इस पर
भिन्न-भिन्न मंत Š । बताया गया है कि गुरु छठे भाव में हो तो शत्रू, आदि का नाश
कर सुख देता है।
४--छठा घर उपचय भी है, अघि या वसुमती योग में छठे भाव में अच्छे ग्रह हों
तो अच्छा फल बताया है । इस प्रकार भिन्न-भिन्न मत हैं । लेखक का मत है कि अज्छे
ग्रह इस भाव में हों तो षष्ठेश होने पर अधिक लाभ नहीं करः सकते यदि कुछ अच्छा .
करेंगे तो तो अधिक रूप से नहीं ।
५--छठे भाव का स्वामी अशुभ है 1
६--यवनाचायं के मत से षष्ठेश षष्ठ में शुभ है।
७६-७ s< का स्वामी दशम में हो या दशमेश के साथ हो तो शुभ समझा
जाता है ।
६-८ घर
१--शुभ ग्रह नीच या शत्रु गृही या ६-८ घर में हो दुःखदाई होता है।
२--पाप ग्रह ऐसी स्थिति में बहुत ही दुःखदाई होते हैं।
३--मंगल या शनि अष्टम हो तो मृत्यु समीप होगी वनिस्वत गुरु के, यदि गुरु
अष्टम हो ।
४-६-८ घर में अशुभ ग्रह नीच का हो तो उसकी दशा में शत्रू या चोर से
हानि हो।
८ भाव
१--अष्टम भाव में सूर्य चन्द्र बली होते हैं ।
२--अष्टम भाव का स्वामी लग्नेश हो तो शुभ है।
अष्टमेश यह भाग्य का व्यय भाव होने से अशुभ है यदि यह लग्नेश भी हो तो
अशुभ होने पर भी शुभ हो जाता है। :
३--अष्टमेश स्वतः अष्टमेक्ष मात्र हो अर्थात वह किसी दूसरे स्थान का स्वामी न
हो तो शुभ होता है । जैसे सूर्य ओर चन्द्र जिनके एक ही स्वस्थान है । परन्तु दूसरे ग्रहों
के दो स्वस्थान होने से यहाँ बुरे माने जाते हैं ।
४--त्रिकोण शुभ माना जाता है यहाँ ९-५ भाव की अपेक्षा लग्न अल्पबली है
इससे लग्नेश हो जाने से अष्टमेश शुभ हो जाता है। यदि बह पंचमेश या नवमेश भी
हो तो और भी शुभ हो जाता है ।
५--अष्टमेश यदि त्रिषडाय अशुभ स्थान का स्वामी भी हो तो विशेष अशुभकारक
हो जाता है । ६--अष्टमेश निबॅळ होकर जहाँ रहता है उस भाव का नाश करता है ।
११
१६२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
७--अष्टमेश शुभ ग्रह के साथ हो तो शुभ हो जाता है शुभ फल देता है ।
८--जिस भाव में अष्टमेश हो उस भाव का नाश करता है, परन्तु अष्टमेश मित्र
गृही हो तो अच्छा है ।
९--बष्टमेण अष्टम हो तो यवनाचार्य के मत से शुभ होता है 1
१०--अष्टम में शुभ ग्रह हों तो अच्छा ओर दीर्घायु करते हैं ।
११--अष्टमेश ३-७ या ११ भाव का स्वामी भी हो तो विशेष अशुभ होता है ।
परन्तु त्रिकोण का स्वामी हो तो शुभ हो जाता है ।
त्रिक स्थान ६-८-१२ भाव
१--कहा है शुभ ग्रह भाव की वृद्धि करते हैं और पापग्रह हानि करते हैं परंतु ६-८-
१२ भाव में विपरीत फल होता है । छठे पापग्रह रोगादि की हानि करते हैं अष्टम हों तो
मृत्यु की हानि, व्यय में हों तो व्यय को हानि करते हैँ ऐसा सत्याचार्य का मत है ।
ग्रह वल देख कर फल विचारना कहा है, शुभ ग्रह उस भाव के फल को बढ़ाते हैं, पाप
ग्रह नष्ट करते हैं ओर मिश्र ग्रह मिश्रित फल करते हैं. परन्तु यहाँ बिपरीत फल होता है -
इससे त्रिक में शुभग्रह अनिष्ट कारक बताया है ।
२--जिस भाव का स्वामी त्रिक में हो उस भाव के अच्छे फल को बुरा
करता है और बुरे फल को अच्छा करता है । ग्रह बलहीन हो तो बहुत हानि करता
है बली हो तो अल्प हानि करता है ।
३--जिस भाव का स्वामी त्रिक में हो या त्रिकेश जिस भाव में हो उप्त भाव का
फल नाश करता है परन्तु उसे शुभ ग्रह देखता हो तो शुभ हो जाता है ।
४--नीच ग्रह अशुभ ग्रह के साथ त्रिक में हो तो महादुःखदाई होता है ।
५---ब्रिक में उच्च के ग्रह का अच्छा फल नहीं होता ।
६--सब भावों से गिनने पर ६-८-१२ भाव में पापग्रह अशुभफल देते हैं । परम्तु
शुभग्रह शुभफल महीं देते । परन्तु इन भावों में शुभग्रह अशुभ फल भी नहीं होने देते ।
इस प्रकार प्रत्येक भाव से विचारना ।
७--लग्न से ६-८-१२ भाव में अच्छे ग्रह हों या इनके स्वामी हों तो बहुत अच्छा
फल नहीं देते ।
८--भावेश जिस भाव में हो उस भाव का स्वामी fs में हो तो उस भाव को
निबेल बना देता है परन्तु ग्रह उच्च का, मिंत्रगृही या स्वगृही हो तो वह भाव कुछ
बलवान् हो जाता है ।
९--भावेद पापयुक्त होकर त्रिक स्थान, शाच्रुस्थान या नीच में हो तो उस भाव की
हानि होती है 1
१०--६-८-१२ के भावेशों को छोड़कर अन्य भाव के स्वामी छरन से केन्द्र या
त्रिकोण में हों तो शुभ होता है ।
११--त्रिकेश केन्द्र या त्रिकोण में हों तो भी अच्छा फल नहीं देते ।
फल का स्थल विचार : १६३
१२--इसी प्रकार दूसरे भावों का फल ग्रह के समान त्रिकोण केन्द्र आदि का विचार
ह और यह देखकर कहना चाहिये कि उस भाव का स्वामी वहाँ से त्रिक में तो
š!
१३--कोई ग्रह अपने स्वस्थान में हो और उसका दूसरा भी स्थान हो जो दुष्टमाव
में पड़ता होतो यह.दुष्ट स्थान का भी स्वामी कहलायेगा । परन्तु दुष्ट स्थान का फल न
देगा अपने ही स्थान का फल देगा जहाँ पर कि वह है । जैसे पंचम में मकर का शनि
स्वस्थानी है यही छठे कुंभ का स्वामी होने से षष्ठ स्थान का हामि कारक फल न देगा ।
१४--त्रिकेश त्रिक में हो तो देह सुख न होगा | षष्ठेश षष्ठ में हो तो रोग या
दात्रु से रहित होकर सुखी होगा परन्तु कृपण होगा । अष्टमेश अष्टम में हो तो बहुत
व्याधि रहित तो होगा परन्तु वह परिश्रमी न होकर फरदी होगा ।
१५--लग्न को देखने वाला, लग्नेश और लरनस्थ ग्रह में तोनों त्रिक स्थान के
स्वामी हों, शत्रगृही हों या निर्बल हों तो ये ग्रह अपनी दशा में लग्न के फल को नहीं
देते हैं ।
८-१२ भाव
१--८-१२ भाव से सब तरह के पाप व क्लेश का विचार होता है ।
२--किसी भाव से ८ या १२ घर के स्वामी की राशि या नवांश में जब शनि
गोचर में पहुँचता है तब उसका फल बिलकुल नाश हो जाता है ।
३००इन तीनों स्वामियों के त्रिकोण में जो राशि हो उस राशि में जब शनि गोचर
में जावे तब यह फल होता है ।
नवम भाव
१--नवम भाव से भाग्य का विचार होता है 1
२--नवम की राणि या वर्ग में जैसे शुभाशुभ बली या निबॅल ग्रह हों या नवांश
जैसा शुभस्थान में बली या निर्बल हो वैसा भारथ शुभ मध्यम या भाग्यहानि समझना ।
दशम भाव
१--दशमेश का सम्बन्ध नवम पंचम घर से हो तो राजयोग होता है ।
२--दशमेश, नवमेश स्वगृही हो तो शुभ है ओर राजयोग कारक हो जाता है ।
(३) दशमेश या किसी त्रिकोणेश में शुभ सम्बन्ध अच्छा होता हैं ।
( ४ ) दशमेश नवम में नवमेश दशम में हो तो बहुत शुभ होता है ।
एकादशभाव
(१ ) लाभभाव से सब वस्तुओं के मिलने का विचार होता है
( २ ) एकादशमाव में प्रायः सभी ग्रह शुभ फळदायक हैं, अच्छे या बुरे ग्रह सब
लाभभाव में अच्छा फल देते हैं ।
(३) सूर्य इस भाव में बलवान होता है सब भय दुर करता है |
१६४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
व्ययभाव
( १ ) बारहवें भाव में अशुभग्रह हो तो उस ग्रह की दशा अशुभ होती है ।
( २) व्ययेश व्यय में हो तो यवनाचार्य के मत से शुभ होता है 1
(३) अधिक व्यय करने वालों के साथ भले या दुष्ट पुरुष लग जाते हैं और स्थान
एवं वंश के अनुसार खचे कराते हैं इसी प्रकार व्ययेश के साथ शुभ या अशुभग्रह जिस
प्रकार रहते हैं या जिसके अनुसार स्थान का स्वामी होकर जैसे स्थान में हो उसी के
अनुसार शुभ या अशुभ कार्य में खर्च कराते हैं 1
किसी भी भाव से उसके व्ययभाव की स्थिति
( १ ) लग्नेश यह द्वितीय ( घन ) भाव का व्ययेश होने से यदि शरीर रक्षा के
निमित्त घन खर्च करता है तो लग्नेश शुभ ही हुआ ।
( २) द्वितीयेश यह सहजभाव का व्ययेश हुआ । इस भाव से पराक्रम तथा आयु
का विचार होने से इनका व्ययकारक द्वितीयेश होने से अशुभ हुआ 1 यह आयुक्षीण करने
के कारण मारकेश कहलाया ।
( ३ ) तृतीयेश् यह सुखभाव का व्ययेश हुआ । सुख का व्यय करने के कारण
तृ तीये अशुभ हुआ ।
( ४ ) चतुर्थेश यह विद्या या पुत्र स्थान का व्ययेश हुआ । यदि अच्छा पुरुष अर्थात्
शुभ होकर विद्या का नाश करता है तो अति अनुचित है । यदि पापी होकर अपने स्वभाव के अनुसार विद्या का नाश करता है तो दुष्ट के विचार से उसका कायं उचित ही
Ë 1 इस कारण शुभग्रह चतुर्थश हो जाय तो अशुभ है चतुर्थेश पापग्रह हो तो अपने
स्वभाव के अनुसार उचित करता है । इससे चतुर्थेश पापग्रह शुभ होता है 1
( ५ ) पंचमेश रिपुभाव का व्ययेश है अत. शत्रु या रोग का नाशक होने से अच्छा
हुआ। `
(६) षष्ठेश यह जायाभाव का व्ययेश है अतः स्त्री का नाशक होने से अशुभ
हुआ ।
( ७ ) सप्तमेश यह आयु भाव का व्ययकारक है अतः आयु का नाशक हुआ इससे
सप्तमेश मारकेश कहलाया ।
( ८ ) अष्टमेश यह धमं या भाग्य भाव का व्ययेश होने के कारण अशुभ हुआ ।
4 ९ ) नवमेश यह कर्मभाव का व्ययकारक होने से शुभ हुआ क्योंकि कर्म अर्थात्
सांसारिक बन्धनों का वह मारक हुआ ।
(१०) दशमेश यह लाभ का व्ययेश होने के कारण अशुभ हुआ क्योंकि लाम की
हानि अनुचित है । दशमेश पापग्रह हो तो इच्छित पापफल की प्राप्ति का नष्ट करने
वाला हुआ इससे अपने कतंव्य के अनुसार शुभ माना जाता है ।
(११) लामेश यह व्यय स्थान का व्ययेश है । खर्च न होने देने से आवश्यक सामग्री
प्राप्त करना कठिन होगा इससे यह अशुभ माना जाता है 1
`
फल का स्थूल विचार : १६५
इन सबको संक्षेप में विचारने से प्रकट होगा कि त्रिषडाय के स्वामी पापकारक है केन्द्रेश शुभ हो तो अशुभ और अशुम हो तो शुभ होते हैं ओर २-८-१२ के स्वामी अपने साथी भोर स्थान के अनु सार फल देते हैं ।
३-६-८ भाव
(१) ग्रह ३-६-८ के भावेश हों तो पापफल देते हैं ।
(२) शुभग्रह भी दो अशुभ स्थान के स्वामी हो जावें तो अशुभफळ देते है--जैसे तुला लग्न हो तो गुरु ३-६ घर का स्वामी हुआ या मेष लग्न में बुध ३-६ घर का
स्वामी हुआ या मीन लग्न में तुतीयेश शुक्र हुआ तो ये अशुभफल देंगे ।
इसी प्रकार पापग्रह भी अशुभ फल देंगे-जैसे कन्या लग्न में तृतीयेश मंगल हुआ । यदि
वृश्चिक लर्न में मंगल है तो वह लग्न और षष्ठ भाव का स्वामी हुआ या वृष लगन में
शुक्र हो तो लग्न और षष्ठभाव का स्वामी हुआ । यद्यपि मंगल या शुक्र लग्नेश हँ परन्तु
अशुभभाव ६ के स्वामी होने से अशुभ हुए ।
च्रिषडाय ३-६-११ भाव
(१) ३-६-११ के भावेश शुभ मो हों तो अच्छे नहों होते ।
(२ ) ३-६-११ भाव में पाप ग्रह हों तो शुभफल देते हैं जीवन तत्त्व बढ़ाते हैं ।
पापत्व में तीसरे भाव से छठा ओर छठे से ग्यारहवां स्थान बली है ।
( ३ ) कहा है जिन्हें विशेष पराक्रम हो, शत्र, हों, और सदा लाभ ही हो वे अच्छो
प्रकृति के रहने पर भी उनमें कुछ क्रूरता आ जाती हे । इससे इन ग्रहों के स्वामी शुभग्रह होने पर भी क्रूरता आ जाने से वे अशुभ स्थान माने गये Q ।
(४) ३-६-११ भाव के स्वामी होने पर सभी ग्रह पापफल देते हैं ।
( ५) साधारण प्रकार से ३-६-११, ८, १२ के भावेश जिसके साथ हों बुरा फल
करते हैं । इनके योग से जो भाव बने उसका नाश हो जाता है !
(६ ) इसके लिये इन सब भावों का भाव स्पष्ट लेकर सबका योग करना, राशि
का योग १२ से अधिक हो तो १२ से भाग देना या १२ राशि घटा देना । जो शेष बचे
वह राशि अंशादि भाव कुण्डली में जिस भाव में पड़े उस भाव की निश्चय हानि जानो ।
२-८-१२ भाव
(१) २-८-१२ भाव के स्वामी साहचयं ( साथी ) के अनुसार फल देते हैं तथा
अपने द्वितीय स्थान के अनुसार फल देते हँ। १२ से २ स्थान बली है २ से ८ स्थान
बली है ।
Í २) इन स्थानों में प्रबळ स्थान का स्वामी अपने से निर्बल स्थान के स्वामी के
फल का बाघक होकर अपना फल देता हैं ।
(३) १, ३, १२ थे चारों स्थान अल्पबली हैं अतः इनमें एक-एक गुण माने गये
हैं । यदि एक ग्रह को २ स्थानों का आधिपत्य हो जाय तो अधिक गुण वाले स्थान का
_ फल होगा ।