भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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फल का स्थूल विचार : १५७

८३--ग्रह जिस भाव पें है उसका अधिकार सप्तवर्ग में जो है उस भाव के अधिकार प्रमाण अच्छा या वुरा पुर्ण फळ देते हैं ।

८ “--भावेश अपने भावस्थान में हो और वही कारक हो तो अच्छा फल देता हँ । ८५ कोई भावेश और उसका कारक भी बली हो तो अच्छा फल देगा ।

लग्नेश विचार

१--जिस भाव में लग्नेश हो उस भाव के फल को वृद्धि होती है ।यदि वह भाव या उसका भावेश बली हो तो भावफल अच्छा देगा । बलहीन हो तो दुःख देगा ।

२--परन्तु लग्नेश जिस भाव में अष्टमे से युक्त हो उस भाव की हानि होती है ।

३--लग्नेश जिस भाव-स्वामी के साथ हो उस भाव का फल देगा । यदि यह भाव या भावेश बली हो तो अच्छा फछ देगा बलहीन हो तो दुःख देगा ।

४-०लेग्नेषा पापग्रह हो तो वह जहाँ हो उस भात्र के फल को बढ़ायेंगा । यदि वह ६-८-१२ भाव का स्वामी हो तो छान के स्वामित्व का फल बढ़ेगा न कि दसरे का जैसे लग्नेश मंगल सिहराशि का पंचम में हो और शुभग्रहों को दृष्टि हो ततो बहुत शीघ्र

पंचमभाव का फल देगा।

५--अ्रह अष्टमेश होकर लग्नेश भी हो तो शुभ समझा जाता है ।

६--लग्नेश के साथ जो ग्रह हो या जो ग्रह लग्नेश को देखे उस ग्रह का स्वस्थान

क्या है माळूम करें, इन्हीं भावों के प्रभाव का फल लग्नेश के प्रभाव से बढ़ेगा ।

७--जो भाव लग्नेश के अष्टकवगं में बहुत शुक्र रेखा लिये हो यदि उससे

सम्बन्धित स्वामी थलो हो और लग्नेश के साथ हो तो फल सुखप्रद होता है ।

८ लग्नेश लग्न में हो, स्वनवांश में हो व सब ग्रहों में बली हो उसका जो रूप,

गुण, स्वभाव आदि लग्न से विचारणीय वातें हैं बह बहुत करके उस ग्रह के प्रभाव से

होते हैं ।

९--लग्नेश लग्न में न होकर दूसरी जगह. हो यह जिस ग्रह के नवांश में हो उस

ग्रह सरीखा भावफल देता है ।

१०--लग्नेश गुरु हो, लग्न में हा तो लगन वलवान्‌ हो जाता है । यदि उस गुरु

पर बुघ को दृष्ट हो तो, लग्न और बली हो जाता है परन्तु और ग्रहों को दृष्टि लग्न

पर नहों होती ।

११--ह स्नेश शुभग्रह युक्त शुभराशि में व मित्रगृही या उच्च में हो तो लग्न शुभ

वर्गाधिक्य होने से इनके सम्बन्ध के सब शुभ फड होंगे ।

१२--छग्नेश ६-८-१२ भाव के स्वामियों के माथ हो तो बुरा है !

१३--लग्नेश वलहीन हो और उसमें पापग्रह हो तो और बुरा है, रोगी रहेगा ।

१४--लग्नेश बलहीन होकर केन्द्र, त्रिकोण में हो तो बुरा स्वास्थ्य रहे।

१५--लग्नेश जहां हो उस भाव का स्वामी ६-८-१२ भाव में हो तो शरीर रण

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