सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 172, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ें१५६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड
अपेक्षा चतुर्थेश पापफल देने में अधिक बलवान् होगा । दशमेश यदि शुभग्रह हो तो सब से अधिक हानिकारक होगा । दशमेश से कम सप्तमेश
उससे कम चतुर्थेश उससे कम लग्नेश शुभग्रह होने पर हानिकारक होंगे ।
(द) त्रिकोण में पंचमेश से नवमेश बरी हैं । _
७०-लग्न से ५, ९, ४, ७ वां स्थान शुभयुक्त या दुष्ट हो, पापयुक्त या दृष्ट न हो
तो पूर्ण शुभ, यदि पापग्रहों का योग व दृष्टि हो तो भाव के शुभ फल का ह्लास हो जाता
है । शुभ पाप दोनों प्रकार के ग्रहों के योग व दृष्टि से मिश्रफल होता है ।
७१--किसी भाव से त्रिकोण ( ५-९ ) और २, ४, ७, १० भावों में शुभग्रह
हो और पाप दृष्टि न हो या भावेशयुक्त हो, पापयुक्त न हो तो बह भाव पुष्ट होता है ।
इसके विरुद्ध होने से भावफल नाश होते हैं, मिश्रग्रह होने से भावफल मिश्चित होता है ।
७२--ग्रह एक दूसरे से -६-८-१२ घर में हो तो बुरे होते हैं। कुछ हद तक
बुरा प्रभाव डालते हैं ।
७३--३, ६, ८, १२ भाव के स्वामी जिस भाव के साथ हों बुरे होते हैं ५, ९,
भाव के स्वामी अच्छे होते हैं ।
७४--४, ९, ११, २ भाव के स्वामी लग्न के सम्बन्धी हों और अधिक बलवाले
हों तो भाग्योदय करते हैं, कार्य सिद्ध होता है । ये भावेश बलवान और लग्न से सम्बद्ध
हों तब पूर्ण फल देते हैं। यदि निवळ हों तो दुःख देत हैं । मिश्रित हों तो मिश्रफल
देते हँ । इनका भाव कारक ग्रह, भावेश और भावगत ग्रह निर्बल हो तो विशेष कष्टदायक होते हैं । ;
७५--भावेश त्रिकोण या स्वस्थानी या ४, ७, १० घर में शुभयुक्त हो, पापग्रह
की दृष्टि न हो, नवम घर के स्वामी से युक्त हो और पापयुक्त न हो तो उस भाव की
उन्नति होती है ।
७६--जो ग्रह लग्न को देखे वह सुख और घन देता है ।
७७--भाव में शुभ ग्रह का पड्वर्ग शुभ होता है। पापग्रह का षड्वर्ग अशुभ
होता है ।
७८--पडवर्ग में बली ग्रह अर्थात् स्वक्षेत्री या अपने मित्र के द्रेष्काण, नवांश, त्र्यंश
आदि में स्थित ग्रह शुभ होता है 1
७९--षडवगं में निबंल ग्रह अर्थात शत्रुक्षेत्री आदि ग्रह अशुभ होते हैं ।
८०--पंचम घर में कको लग्न के नवांश या द्वादशांश में जो ग्रह हो वह शुभ फळ
` देताहे।
८१--नवम घर में जो राशि हो उसके नवांश या ढादशांश में जो ग्रह हो वह यदि
गुरु के द्रेष्काण में हो तो उसकी दशा शुभ होती है ।
८२-चतुर्थं भाव के नवांश या द्वादशांश में जो ग्रह अपने या चोथे लात के
द्रेष्काण में हो उसकी दशा में शुभ फल होता है ।
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