सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
फल का स्थूल विचार : १५७
८३--ग्रह जिस भाव पें है उसका अधिकार सप्तवर्ग में जो है उस भाव के अधिकार प्रमाण अच्छा या वुरा पुर्ण फळ देते हैं ।
८ “--भावेश अपने भावस्थान में हो और वही कारक हो तो अच्छा फल देता हँ । ८५ कोई भावेश और उसका कारक भी बली हो तो अच्छा फल देगा ।
लग्नेश विचार
१--जिस भाव में लग्नेश हो उस भाव के फल को वृद्धि होती है ।यदि वह भाव या उसका भावेश बली हो तो भावफल अच्छा देगा । बलहीन हो तो दुःख देगा ।
२--परन्तु लग्नेश जिस भाव में अष्टमे से युक्त हो उस भाव की हानि होती है ।
३--लग्नेश जिस भाव-स्वामी के साथ हो उस भाव का फल देगा । यदि यह भाव या भावेश बली हो तो अच्छा फछ देगा बलहीन हो तो दुःख देगा ।
४-०लेग्नेषा पापग्रह हो तो वह जहाँ हो उस भात्र के फल को बढ़ायेंगा । यदि वह ६-८-१२ भाव का स्वामी हो तो छान के स्वामित्व का फल बढ़ेगा न कि दसरे का जैसे लग्नेश मंगल सिहराशि का पंचम में हो और शुभग्रहों को दृष्टि हो ततो बहुत शीघ्र
पंचमभाव का फल देगा।
५--अ्रह अष्टमेश होकर लग्नेश भी हो तो शुभ समझा जाता है ।
६--लग्नेश के साथ जो ग्रह हो या जो ग्रह लग्नेश को देखे उस ग्रह का स्वस्थान
क्या है माळूम करें, इन्हीं भावों के प्रभाव का फल लग्नेश के प्रभाव से बढ़ेगा ।
७--जो भाव लग्नेश के अष्टकवगं में बहुत शुक्र रेखा लिये हो यदि उससे
सम्बन्धित स्वामी थलो हो और लग्नेश के साथ हो तो फल सुखप्रद होता है ।
८ लग्नेश लग्न में हो, स्वनवांश में हो व सब ग्रहों में बली हो उसका जो रूप,
गुण, स्वभाव आदि लग्न से विचारणीय वातें हैं बह बहुत करके उस ग्रह के प्रभाव से
होते हैं ।
९--लग्नेश लग्न में न होकर दूसरी जगह. हो यह जिस ग्रह के नवांश में हो उस
ग्रह सरीखा भावफल देता है ।
१०--लग्नेश गुरु हो, लग्न में हा तो लगन वलवान् हो जाता है । यदि उस गुरु
पर बुघ को दृष्ट हो तो, लग्न और बली हो जाता है परन्तु और ग्रहों को दृष्टि लग्न
पर नहों होती ।
११--ह स्नेश शुभग्रह युक्त शुभराशि में व मित्रगृही या उच्च में हो तो लग्न शुभ
वर्गाधिक्य होने से इनके सम्बन्ध के सब शुभ फड होंगे ।
१२--छग्नेश ६-८-१२ भाव के स्वामियों के माथ हो तो बुरा है !
१३--लग्नेश वलहीन हो और उसमें पापग्रह हो तो और बुरा है, रोगी रहेगा ।
१४--लग्नेश बलहीन होकर केन्द्र, त्रिकोण में हो तो बुरा स्वास्थ्य रहे।
१५--लग्नेश जहां हो उस भाव का स्वामी ६-८-१२ भाव में हो तो शरीर रण
= <ë ।
१५८ : ज्योतिष-जिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
१६--वः लग्नेश शुभग्रह युक्त या दृष्ट होकर जिस भाव में हो उस भाव का
विशेष शुभ फल और यदि नीच या शब्गृही हो तो अशुभ फल होगा ।
१७--लग्नेश अष्टम हो तो स्वास्थ्य विगड़ेगा परन्तु शत्रुदृ ष्ट हो तो बुरा फल नहीं
होता ।
लग्न
१--लग्न में जो ग्रह ३ उस सरीखो भावोक्त बातें होती हैं । यदि वहां २-४ ग्रह
हों तो उनमें से जो बली हो उसी सरोखा फल होगा । ग्रहों के आयुप्रमाण से जो वली
हो उस ग्रह का गुण दोष आगे होगा उसकी अपेक्षा कम बळ वाले का प्रभाव होगा ।
२--लग्न अधिक पापवर्ग हो, उसका स्वामी पाप या पापराशिगत या शत्र”
राशि व तीचराशि में हो तो लग्न सम्बन्धी अनिष्टफल होगा। एक प्रकार से शुभ
और अन्य प्रकार से अशुभ हो तो मिश्रफल होगा । जैसे लग्गेश शुभराशि में नीच व
शन्रुराशि गत हो या लग्नेश पापराशि में मित्र या उच्चराशि में हो तो मिश्रफल होगा ।
३--इसी प्रकार हितीय, तृतीय आदि भाव के सम्बन्ध में विचारना ।
४--छर्न पापग्रह युवत और अस्तंगत हो तो निर्बल होकर दुष्टफल देता है l
५--लग्त के पूर्वार्ध में जो लग्न है वह प्रत्यक्षे फल देता है । पराद्धं में जो ग्रह है
बह परोक्ष फल देता है ।
६--.लग्न व लग्नेश दोनों पूर्णबली हों तो फल वृद्धि हो । दोनों बलहीन हों तो फल
की हानि हो ।
७-- लग्न स्वट्टादशञांदा या स्पद्रेष्काण में हो तो वह शुभ होता है ।
८--लछग्न और उसका नवांश आरम्भ में पूर्ण फल देता है । मध्य में मध्यम और
अन्त में अशुभ फल देता है ।
९--लग्न में सौम्य ग्रह का नवांश शुभ होता है । पाप या शत्र् राशि का नवांश
अशुभ होता है !
१०--लग्न में पापग्रह हो तो स्वास्थ्य बिगड़े ।
११--लग्न में शुभ राशि हो तो दीर्घायु एवं सुखी ह्रो ।
१४--लग्न को ल नेश देखता हो तो धन और करीति की वृद्धि हां ।
भाव से २-१२ स्थान ( दिर्ढादश योग )
१--यदि किसी भाव का स्वामी या किसी भावविद्येष में एक ओर शुभ ग्रह हो
दुसरी ओर भी शुभ ग्रह हो अर्थात् शुभ ग्रहों से घिरा हो तो उप भाव के फळ की बुद्धि
होगी । जैसे चतुर्थ स्थात लो, इसके पहिले अर्थात् तीसरे भाव में और आगे पंचम भाव
में शुभग्रह हो तो शुभ ग्रहों के बीच यह चतुर्थ भाव हुआ ।
२--यदि कोई भाव दोनों ओर से पाप ग्रहों से घिरा हुआ हो तो उस भावका
फल नष्ट होगा ।
फल का स्थूल विचार : १५९
३--यदि एक ओर शुभग्रह दूसरी ओर अशुभग्रह हो तो मिश्रफल होगा ।
२ और १२ भाव पर विचार
१--व्ययेश और धनेश अपने स्वभाव के अनुसार फल नहीं देते । ये भाव, भावेश
और राशि के अनुसार फल देते हैं ।
( अ ) जिस प्रकार शुभ या अशुभ घर में हो ।
( आ ) जिस प्रकार शुभ या अशुभ भावेश के साथ हो।
(इ) या जिस स्थान का स्वामी हो वह राशि जैसी शुभ या अशुभ हो उसी के
अनुसार शुभ या अशुभ फल देते हैं ।
अर्थात् ( क ) द्वितीये के साथ जो ग्रह हो वह अपना ही फल देगा यदि वहाँ बहुत
ग्रह हों तो उनमें जो बली हो उसके अनुसार द्वितीयेश फल देगा ।
( ख ) यदि किसी ग्रह का साथ न हो तो जिस अन्य स्थान का स्वामी हो उसी के
के अनुसार फल देगा ।
( ग ) यदि वह अन्य दूसरे स्यान का स्वामी भी न हो जैसे सूर्य और चंद्र जिनका
एक ही स्वस्थान है तो हितीयेश जिस भाव में बैठा हो उसके अनुसार फल देगा ।
( घ ) यदि ये योग न हों तथा अन्य स्थान का स्वामी भी न हो और अपने स्थान
में ही हो तो वह अपने स्वभाव के अनुसार ही शुभ या अशुभ फल देगा ।
२--इसी प्रक्रार व्ययेश का फल भी विचारना ।
३-२-१२ भाव के स्वामियों का अपना कोई विशेष गुण-दोष नहीं है । ये स्वामी
जिस भाव में पड़े हों, जिस ग्रह के साथ हों, जिस भाव में पड़े हो, उस भाव का स्वामी
किस भाव में पड़ा है इन तीनों रीति से उस के गुण दोष विचारना अर्थात् शुभ स्थान में
शुभ युक्त हो तो शुभ, अशुभ स्थान ( ६.८.१२ भाव ) या अशुभ ग्रह युक्त हो तो अशुभ
होता है ।
धनभाव
१--घनेश धन रखनेवाला है उसके साथ यदि पापी ( दुष्ट ) रहता है तो उसके
घन को समय पाकर नष्ट कर देता है और यदि उसके साथ शुभ अर्थात् शुभावितक रहे तो
उसके धन की रक्षा करेगा इस कारण घनेश अपने साथो के अनुसार फल देता है ।
इससे द्वितीयेश अपने साथी, स्थिति और दृष्टि के अनुसार अच्छे या बुरे हो जाते gë!
२--घनेश जहाँ हो उस भाव राशि को जगह में विशेष वृद्धि करते हैं। वह राशि
जिस दिशा की है उस ओर से द्रव्यलाभ होता है । यदि वक्री हो तो सब दिशाओं में
लाभ हो । र
३--द्वितीयभाव में अच्छा ग्रह हो और हितोयेश शुम ग्रह हो तो उसकी दशा मे
उन्नति होगी । शुभ वार्ता सुनने का आनंद होता है ।
४--द्वितीयेश पापग्रह हो पापयुक्त हो तो दणा-अतर्दशा में अग्नि, शस्त्र चोर आदि
शोक के द्वारा हानि हो साधारण असुख हो ।
१६० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
५--द्वितीयेश पापग्रह हो तो जब उस राशि में बुरे ग्रह आवें तो उस समय जिम्मे-
दारी का काम करने से हानि होगी ।
२-७ भाव
१--२-७ घर मारक होने से अशुभ समझे जाते हैं । इन स्थानों के स्वामी मारकेश कहलाते हैं ।
२--यह अशुभ होकर २-४ घर में हों तो अशुभ होते हैं ।
३--ग्रहो के स्वस्थान में सप्तम स्थान अशुभ समझा जाता ë । जैसे मकर का
चन्द्र । यह चन्द्र के स्वस्थान ककं से सातवाँ है !
तुतीय भाव
१--कोई भावेश पापग्रह हो तो वह लग्न से तीसरे घर में पड़ जाय तो अच्छा
फल देगा ।
२--यदि शुभ ग्रह तीसरे स्थान में पड़े तो मध्यम फल देगा जैसे नवमेश गुरु तीसरे
स्थान में हो तो गुरु शुभ होने से मध्यम फल देगा ।
चतुर्थंभाव
१--चतुर्थं और दशमभाव विशेष शुभ होते है । इनमें शुभ ग्रह अच्छे है पाष ग्रह
कुछ कष्ट देते हैँ ।
२--शुभ ग्रह उच्च या स्वक्षेत्री या चतुर्थ में हो तो पशु वाहन आदि प्राप्त हो,
चन्द्र हो तो अन्न मिले, शुक्र हो तो गाने-बजाने में रचि हो, गुरु हो तो धन याः उत्तम
बाहन प्राप्त हो ।
पाप ग्रह मंगल हो तो अग्नि भय, भूमि हानि आदि, सूयं हो तो राजभय, राहुं हो
तो बिष आदि का भय, घनहानि, शनि हो तो शरीर कष्ट हो ।
पंचमभाव
१--पंचमेश बुरे स्थान में हो तो अशुभ समझा जाता है ।
२--पंचमेश क्रूर ग्रह हो तो भी शुभ होता है !
३--पंचम घर में दशमेश हो तो सुखदायक होता है ।
४- पंचम में गुरु हो या ९-१२ राशि हो तो संतान का दुःख हो ।
षष्ठभाव
१--कोई कहते हैं कि छठे घर में, ग्रह अच्छा फल देता है, कोई कहते हैं बुरा
फल देता ë परन्तु सिद्धांत यह हैं कि--
पापग्रह किसी भाव में हो उस भाव के फल को नष्ट करते हैं या कम करते हैं और
शुभग्रह किसी भाव में हो तो उस भाव के फळ को बढ़ाते हैँ ।
२---छठा भाव रोग, ऋण, शत्रु का मुख्य स्थान है यदि पापग्रह वहाँ हो तो उस
भाव के बुरे फल को नाश करेगा अर्थात रोग शत्रु ऋण आदि नष्ट होने से अवश्य
सुख होगा ।
फल का स्थूल विचार : १६१
यदि अच्छे ग्रह यहाँ हों तो उस भाव के फलको बढ़ावेंगे अर्थात् रोग आदि की
वृद्धि होगी ।
3—= कई का मत है कि छठे भाव में ग्रह विरुद्ध फल देता है । इस पर
भिन्न-भिन्न मंत Š । बताया गया है कि गुरु छठे भाव में हो तो शत्रू, आदि का नाश
कर सुख देता है।
४--छठा घर उपचय भी है, अघि या वसुमती योग में छठे भाव में अच्छे ग्रह हों
तो अच्छा फल बताया है । इस प्रकार भिन्न-भिन्न मत हैं । लेखक का मत है कि अज्छे
ग्रह इस भाव में हों तो षष्ठेश होने पर अधिक लाभ नहीं करः सकते यदि कुछ अच्छा .
करेंगे तो तो अधिक रूप से नहीं ।
५--छठे भाव का स्वामी अशुभ है 1
६--यवनाचायं के मत से षष्ठेश षष्ठ में शुभ है।
७६-७ s< का स्वामी दशम में हो या दशमेश के साथ हो तो शुभ समझा
जाता है ।
६-८ घर
१--शुभ ग्रह नीच या शत्रु गृही या ६-८ घर में हो दुःखदाई होता है।
२--पाप ग्रह ऐसी स्थिति में बहुत ही दुःखदाई होते हैं।
३--मंगल या शनि अष्टम हो तो मृत्यु समीप होगी वनिस्वत गुरु के, यदि गुरु
अष्टम हो ।
४-६-८ घर में अशुभ ग्रह नीच का हो तो उसकी दशा में शत्रू या चोर से
हानि हो।
८ भाव
१--अष्टम भाव में सूर्य चन्द्र बली होते हैं ।
२--अष्टम भाव का स्वामी लग्नेश हो तो शुभ है।
अष्टमेश यह भाग्य का व्यय भाव होने से अशुभ है यदि यह लग्नेश भी हो तो
अशुभ होने पर भी शुभ हो जाता है। :
३--अष्टमेश स्वतः अष्टमेक्ष मात्र हो अर्थात वह किसी दूसरे स्थान का स्वामी न
हो तो शुभ होता है । जैसे सूर्य ओर चन्द्र जिनके एक ही स्वस्थान है । परन्तु दूसरे ग्रहों
के दो स्वस्थान होने से यहाँ बुरे माने जाते हैं ।
४--त्रिकोण शुभ माना जाता है यहाँ ९-५ भाव की अपेक्षा लग्न अल्पबली है
इससे लग्नेश हो जाने से अष्टमेश शुभ हो जाता है। यदि बह पंचमेश या नवमेश भी
हो तो और भी शुभ हो जाता है ।
५--अष्टमेश यदि त्रिषडाय अशुभ स्थान का स्वामी भी हो तो विशेष अशुभकारक
हो जाता है । ६--अष्टमेश निबॅळ होकर जहाँ रहता है उस भाव का नाश करता है ।
११
१६२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
७--अष्टमेश शुभ ग्रह के साथ हो तो शुभ हो जाता है शुभ फल देता है ।
८--जिस भाव में अष्टमेश हो उस भाव का नाश करता है, परन्तु अष्टमेश मित्र
गृही हो तो अच्छा है ।
९--बष्टमेण अष्टम हो तो यवनाचार्य के मत से शुभ होता है 1
१०--अष्टम में शुभ ग्रह हों तो अच्छा ओर दीर्घायु करते हैं ।
११--अष्टमेश ३-७ या ११ भाव का स्वामी भी हो तो विशेष अशुभ होता है ।
परन्तु त्रिकोण का स्वामी हो तो शुभ हो जाता है ।
त्रिक स्थान ६-८-१२ भाव
१--कहा है शुभ ग्रह भाव की वृद्धि करते हैं और पापग्रह हानि करते हैं परंतु ६-८-
१२ भाव में विपरीत फल होता है । छठे पापग्रह रोगादि की हानि करते हैं अष्टम हों तो
मृत्यु की हानि, व्यय में हों तो व्यय को हानि करते हैँ ऐसा सत्याचार्य का मत है ।
ग्रह वल देख कर फल विचारना कहा है, शुभ ग्रह उस भाव के फल को बढ़ाते हैं, पाप
ग्रह नष्ट करते हैं ओर मिश्र ग्रह मिश्रित फल करते हैं. परन्तु यहाँ बिपरीत फल होता है -
इससे त्रिक में शुभग्रह अनिष्ट कारक बताया है ।
२--जिस भाव का स्वामी त्रिक में हो उस भाव के अच्छे फल को बुरा
करता है और बुरे फल को अच्छा करता है । ग्रह बलहीन हो तो बहुत हानि करता
है बली हो तो अल्प हानि करता है ।
३--जिस भाव का स्वामी त्रिक में हो या त्रिकेश जिस भाव में हो उप्त भाव का
फल नाश करता है परन्तु उसे शुभ ग्रह देखता हो तो शुभ हो जाता है ।
४--नीच ग्रह अशुभ ग्रह के साथ त्रिक में हो तो महादुःखदाई होता है ।
५---ब्रिक में उच्च के ग्रह का अच्छा फल नहीं होता ।
६--सब भावों से गिनने पर ६-८-१२ भाव में पापग्रह अशुभफल देते हैं । परम्तु
शुभग्रह शुभफल महीं देते । परन्तु इन भावों में शुभग्रह अशुभ फल भी नहीं होने देते ।
इस प्रकार प्रत्येक भाव से विचारना ।
७--लग्न से ६-८-१२ भाव में अच्छे ग्रह हों या इनके स्वामी हों तो बहुत अच्छा
फल नहीं देते ।
८--भावेश जिस भाव में हो उस भाव का स्वामी fs में हो तो उस भाव को
निबेल बना देता है परन्तु ग्रह उच्च का, मिंत्रगृही या स्वगृही हो तो वह भाव कुछ
बलवान् हो जाता है ।
९--भावेद पापयुक्त होकर त्रिक स्थान, शाच्रुस्थान या नीच में हो तो उस भाव की
हानि होती है 1
१०--६-८-१२ के भावेशों को छोड़कर अन्य भाव के स्वामी छरन से केन्द्र या
त्रिकोण में हों तो शुभ होता है ।
११--त्रिकेश केन्द्र या त्रिकोण में हों तो भी अच्छा फल नहीं देते ।
फल का स्थल विचार : १६३
१२--इसी प्रकार दूसरे भावों का फल ग्रह के समान त्रिकोण केन्द्र आदि का विचार
ह और यह देखकर कहना चाहिये कि उस भाव का स्वामी वहाँ से त्रिक में तो
š!
१३--कोई ग्रह अपने स्वस्थान में हो और उसका दूसरा भी स्थान हो जो दुष्टमाव
में पड़ता होतो यह.दुष्ट स्थान का भी स्वामी कहलायेगा । परन्तु दुष्ट स्थान का फल न
देगा अपने ही स्थान का फल देगा जहाँ पर कि वह है । जैसे पंचम में मकर का शनि
स्वस्थानी है यही छठे कुंभ का स्वामी होने से षष्ठ स्थान का हामि कारक फल न देगा ।
१४--त्रिकेश त्रिक में हो तो देह सुख न होगा | षष्ठेश षष्ठ में हो तो रोग या
दात्रु से रहित होकर सुखी होगा परन्तु कृपण होगा । अष्टमेश अष्टम में हो तो बहुत
व्याधि रहित तो होगा परन्तु वह परिश्रमी न होकर फरदी होगा ।
१५--लग्न को देखने वाला, लग्नेश और लरनस्थ ग्रह में तोनों त्रिक स्थान के
स्वामी हों, शत्रगृही हों या निर्बल हों तो ये ग्रह अपनी दशा में लग्न के फल को नहीं
देते हैं ।
८-१२ भाव
१--८-१२ भाव से सब तरह के पाप व क्लेश का विचार होता है ।
२--किसी भाव से ८ या १२ घर के स्वामी की राशि या नवांश में जब शनि
गोचर में पहुँचता है तब उसका फल बिलकुल नाश हो जाता है ।
३००इन तीनों स्वामियों के त्रिकोण में जो राशि हो उस राशि में जब शनि गोचर
में जावे तब यह फल होता है ।
नवम भाव
१--नवम भाव से भाग्य का विचार होता है 1
२--नवम की राणि या वर्ग में जैसे शुभाशुभ बली या निबॅल ग्रह हों या नवांश
जैसा शुभस्थान में बली या निर्बल हो वैसा भारथ शुभ मध्यम या भाग्यहानि समझना ।
दशम भाव
१--दशमेश का सम्बन्ध नवम पंचम घर से हो तो राजयोग होता है ।
२--दशमेश, नवमेश स्वगृही हो तो शुभ है ओर राजयोग कारक हो जाता है ।
(३) दशमेश या किसी त्रिकोणेश में शुभ सम्बन्ध अच्छा होता हैं ।
( ४ ) दशमेश नवम में नवमेश दशम में हो तो बहुत शुभ होता है ।
एकादशभाव
(१ ) लाभभाव से सब वस्तुओं के मिलने का विचार होता है
( २ ) एकादशमाव में प्रायः सभी ग्रह शुभ फळदायक हैं, अच्छे या बुरे ग्रह सब
लाभभाव में अच्छा फल देते हैं ।
(३) सूर्य इस भाव में बलवान होता है सब भय दुर करता है |
१६४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
व्ययभाव
( १ ) बारहवें भाव में अशुभग्रह हो तो उस ग्रह की दशा अशुभ होती है ।
( २) व्ययेश व्यय में हो तो यवनाचार्य के मत से शुभ होता है 1
(३) अधिक व्यय करने वालों के साथ भले या दुष्ट पुरुष लग जाते हैं और स्थान
एवं वंश के अनुसार खचे कराते हैं इसी प्रकार व्ययेश के साथ शुभ या अशुभग्रह जिस
प्रकार रहते हैं या जिसके अनुसार स्थान का स्वामी होकर जैसे स्थान में हो उसी के
अनुसार शुभ या अशुभ कार्य में खर्च कराते हैं 1
किसी भी भाव से उसके व्ययभाव की स्थिति
( १ ) लग्नेश यह द्वितीय ( घन ) भाव का व्ययेश होने से यदि शरीर रक्षा के
निमित्त घन खर्च करता है तो लग्नेश शुभ ही हुआ ।
( २) द्वितीयेश यह सहजभाव का व्ययेश हुआ । इस भाव से पराक्रम तथा आयु
का विचार होने से इनका व्ययकारक द्वितीयेश होने से अशुभ हुआ 1 यह आयुक्षीण करने
के कारण मारकेश कहलाया ।
( ३ ) तृतीयेश् यह सुखभाव का व्ययेश हुआ । सुख का व्यय करने के कारण
तृ तीये अशुभ हुआ ।
( ४ ) चतुर्थेश यह विद्या या पुत्र स्थान का व्ययेश हुआ । यदि अच्छा पुरुष अर्थात्
शुभ होकर विद्या का नाश करता है तो अति अनुचित है । यदि पापी होकर अपने स्वभाव के अनुसार विद्या का नाश करता है तो दुष्ट के विचार से उसका कायं उचित ही
Ë 1 इस कारण शुभग्रह चतुर्थश हो जाय तो अशुभ है चतुर्थेश पापग्रह हो तो अपने
स्वभाव के अनुसार उचित करता है । इससे चतुर्थेश पापग्रह शुभ होता है 1
( ५ ) पंचमेश रिपुभाव का व्ययेश है अत. शत्रु या रोग का नाशक होने से अच्छा
हुआ। `
(६) षष्ठेश यह जायाभाव का व्ययेश है अतः स्त्री का नाशक होने से अशुभ
हुआ ।
( ७ ) सप्तमेश यह आयु भाव का व्ययकारक है अतः आयु का नाशक हुआ इससे
सप्तमेश मारकेश कहलाया ।
( ८ ) अष्टमेश यह धमं या भाग्य भाव का व्ययेश होने के कारण अशुभ हुआ ।
4 ९ ) नवमेश यह कर्मभाव का व्ययकारक होने से शुभ हुआ क्योंकि कर्म अर्थात्
सांसारिक बन्धनों का वह मारक हुआ ।
(१०) दशमेश यह लाभ का व्ययेश होने के कारण अशुभ हुआ क्योंकि लाम की
हानि अनुचित है । दशमेश पापग्रह हो तो इच्छित पापफल की प्राप्ति का नष्ट करने
वाला हुआ इससे अपने कतंव्य के अनुसार शुभ माना जाता है ।
(११) लामेश यह व्यय स्थान का व्ययेश है । खर्च न होने देने से आवश्यक सामग्री
प्राप्त करना कठिन होगा इससे यह अशुभ माना जाता है 1
`
फल का स्थूल विचार : १६५
इन सबको संक्षेप में विचारने से प्रकट होगा कि त्रिषडाय के स्वामी पापकारक है केन्द्रेश शुभ हो तो अशुभ और अशुम हो तो शुभ होते हैं ओर २-८-१२ के स्वामी अपने साथी भोर स्थान के अनु सार फल देते हैं ।
३-६-८ भाव
(१) ग्रह ३-६-८ के भावेश हों तो पापफल देते हैं ।
(२) शुभग्रह भी दो अशुभ स्थान के स्वामी हो जावें तो अशुभफळ देते है--जैसे तुला लग्न हो तो गुरु ३-६ घर का स्वामी हुआ या मेष लग्न में बुध ३-६ घर का
स्वामी हुआ या मीन लग्न में तुतीयेश शुक्र हुआ तो ये अशुभफल देंगे ।
इसी प्रकार पापग्रह भी अशुभ फल देंगे-जैसे कन्या लग्न में तृतीयेश मंगल हुआ । यदि
वृश्चिक लर्न में मंगल है तो वह लग्न और षष्ठ भाव का स्वामी हुआ या वृष लगन में
शुक्र हो तो लग्न और षष्ठभाव का स्वामी हुआ । यद्यपि मंगल या शुक्र लग्नेश हँ परन्तु
अशुभभाव ६ के स्वामी होने से अशुभ हुए ।
च्रिषडाय ३-६-११ भाव
(१) ३-६-११ के भावेश शुभ मो हों तो अच्छे नहों होते ।
(२ ) ३-६-११ भाव में पाप ग्रह हों तो शुभफल देते हैं जीवन तत्त्व बढ़ाते हैं ।
पापत्व में तीसरे भाव से छठा ओर छठे से ग्यारहवां स्थान बली है ।
( ३ ) कहा है जिन्हें विशेष पराक्रम हो, शत्र, हों, और सदा लाभ ही हो वे अच्छो
प्रकृति के रहने पर भी उनमें कुछ क्रूरता आ जाती हे । इससे इन ग्रहों के स्वामी शुभग्रह होने पर भी क्रूरता आ जाने से वे अशुभ स्थान माने गये Q ।
(४) ३-६-११ भाव के स्वामी होने पर सभी ग्रह पापफल देते हैं ।
( ५) साधारण प्रकार से ३-६-११, ८, १२ के भावेश जिसके साथ हों बुरा फल
करते हैं । इनके योग से जो भाव बने उसका नाश हो जाता है !
(६ ) इसके लिये इन सब भावों का भाव स्पष्ट लेकर सबका योग करना, राशि
का योग १२ से अधिक हो तो १२ से भाग देना या १२ राशि घटा देना । जो शेष बचे
वह राशि अंशादि भाव कुण्डली में जिस भाव में पड़े उस भाव की निश्चय हानि जानो ।
२-८-१२ भाव
(१) २-८-१२ भाव के स्वामी साहचयं ( साथी ) के अनुसार फल देते हैं तथा
अपने द्वितीय स्थान के अनुसार फल देते हँ। १२ से २ स्थान बली है २ से ८ स्थान
बली है ।
Í २) इन स्थानों में प्रबळ स्थान का स्वामी अपने से निर्बल स्थान के स्वामी के
फल का बाघक होकर अपना फल देता हैं ।
(३) १, ३, १२ थे चारों स्थान अल्पबली हैं अतः इनमें एक-एक गुण माने गये
हैं । यदि एक ग्रह को २ स्थानों का आधिपत्य हो जाय तो अधिक गुण वाले स्थान का
_ फल होगा ।
१६६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड
केन्द्र विचार
( ९ ) केन्द्र में केवल ४, ७, १० स्थान ग्रहण करना नयोँकि करन त्रिकोण में आ
गई है । या लग्न पृथक है ।
( २) १, ४, ७, १०, स्यान क्रम से उत्तरोत्तर बली है । जैसे :--पापग्रह १, ४ |
भाव का स्वामी हो जाय तो लग्न की अपेक्षा चतुर्थेश शुभ फल देने में अधिक बली होगा ।
( ३ ) केन्द्र ४-७-१० के स्वामी शुभ या पापग्रह हों तो अपने स्वभाव के अनुसार
शुभ या पापफल नहीं देते । केन्द्रेश शुभ हो तो अशुभफल देते Q । अशुभ हो तो बुभफल
देते हैं । शुभग्रह केन्द्रेश हो तो उसकी अशुभयह समझना ।
( ४) केन्द्र में पापग्रह अशुभफछ देते हैँ आयु कम करते हैं ।
( ५) किसी भाव का स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हो तो अच्छा ë ।
( ६ ) केन्द्र या त्रिकोण में शुभग्र ह बहुत शुभ है यदि वह केन्द्रेश न हो तो ।
(७) केन्द्र या त्रिकोण में शुभ या पापग्रह हो तो मिश्रफल होगा ।
(८) केन्द्र या त्रिकोण के स्वामी अच्छा फल देते हैं परन्तु घनभाव और व्ययभाव
में पापग्रह युक्त हों तो फल नहीं देते ।
(९ ) शुभग्रह गुरु शुक्र केन्द्रे हों तो बुरे हैं परन्तु बुध केन्द्रेश हो तो शुक्र की
अपेक्षा कम बुराई करेगा । चन्द्र केन्द्रेश हो तो बुघ से कम बुराई करेगा अर्थात् चन्द्र बुध
शुक्र गुरु उत्तरोत्तर बुराई में बुरे हैं ।
(१०) qaq में गुरु, शुक्र बली हैं, इससे शुभग्रहों में मारकत्व ( २-७ भाव के
स्वामी ) होने पर भी गुरु शुक्र की अपेक्षा विशेष मारकत्व दोष उत्पन्न करता है । केन्द्रेश |
होकर मारक स्थान में रहने से विशेष दोष कारक गुरु है उससे कम शुक्र । दोनों में से
अल्प दोष और मारकत्व बुष में है बुध से न्युन चन्द्र में है। क्योंकि बुध कभी पाप ग्रह
को संगति में पापग्रह हो जाता है 1 चन्द्र क्षीण होने पर पापग्रह बन जाता है ।
( ११ ) राहु केतु ये त्रिकोण के स्वामी हों अथवा केन्द्र या त्रिकोण के स्वामी में से
किसी से इनका सम्बन्ध हो जावे तो अच्छा फल देंगे । š
( १२ ) स्वाभाविक पापग्रह यदि केन्द्रेश होकर त्रिषडाय ( ३-६-११ ) पति भी
हो जायें तो पाप कारक हो जाते हैं ।
( १३ ) पापग्रहों के केनद्रेश होने में इतना ही शुभत्व आ जाता है कि वह अपने
पापफल को नहीं देता 1 यदि वह उस समय न्रिकोणेश भी हो जावे तो उसे छुभफल देने
में बळ आ जाता है । :
` (९४) केन्द्रेश अपने स्वभाव को भूल जाते हैं और जैसे स्वभाव वाले qg से
सम्बन्ध हो वैसा फल देते हैं । त्रिकोणेश से सम्बन्ध होने पर विशेष शुभ हो जाता है ।
यदि किसी दुसरे पापस्थानेश ( ३,६ भाव के स्वामी ) से भी संबन्ध हो जाये तो सामान्य
रूप से फल देगा ।
(१५) शुभग्रह केन्द्र के स्वामी न हों तो शुभ है भोर पापग्रह केन्द्र के स्वामी न हों
फल का स्थूल[विचार : १६७
तो और भी भणुम हो जाते हैं । स्वामाविक शुभग्रह केन्द्रेश होने पर शुभफल नहीं देते और
स्वाभाविक पापग्रह केन्द्रेश होने पर पापफल नहीं देते । ये सब पाप और शुभग्रह त्रिकोणेश
होने पर शुभफल देते है ।
- (६) लग केन्द्र और त्रिकोण दोनों कहलाता है इससे वह शुभ स्थान होने से
उसका स्वामी शुभ है ।
(७ ) केन्द्र में ग्रहों का साधारण फल
सूर्य हो «राजा की सेवा करने वाला । गुरु = दिव्य बुद्धि, अपने अनुष्ठान में तत्पर ।
चन्द्र हो = बैश्य की सेवा करने वाला । शुक्र = विद्या और घन से युक्त ।
मंगल हो--वस्त्र का व्यापारी आदि 1 शनिन्तीच की सेवा करने वाला ।
बुघ होम्अध्यापक ।
त्रिकोणेश
(१) त्रिक्रोग में लग्न भो गिनो जाती है केवळ ५-९ भाव नहीं ।
(२) १-५-९ भाव क्रम से उत्तरोत्तर बली हैं । पंचमेश अधिक फल देता ë |
(३) त्रिकोण के ५-९ भाव का स्वामी शुभ या पाप ग्रह जो भी हो सदा णुभ
होता है ।
(४) त्रिकोण में उच्च ग्रह हों तो घनवान् होगा, नीच का प्रह हो तो बुरा
फल देगा ।
(५ ) ४-१० भाव विशेष शुभदायक हैं ५-९ भाव विशेष धन दायक हैँ ।
( ३ ) ५-९ भाव के स्वामी के साथ शुभ योग होने पर आकस्मिक घन जैसे लाटरी
आदि प्राप्त होती है ।
( ७ ) त्रिकोण के स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हों तो शुभ हैं एक दुसरे की सहायता
करेंगे ।
( ८) त्रिकोणेश केन्द्रेश के साथ हों तो अच्छा है यदि दुसरे त्रिकोण के स्वामी के
साथ मो केन्द्रेश का सम्बन्ध हो तो और भी अच्छा है ।
( ९) त्रिकोण का लग्नेश या चतुर्थेश से शुभ सम्बन्ध अच्छा होता है ।
( १० ) केन्द्रेश का शुभफल परिश्रम से होता है परन्तु त्रिकोणेश का शुभफल बिना
परिश्रम के होता ë 1:
( ११ ) त्रिकोणेश या केन्द्रेश ६-८-१२ घर में हों तो अपने सम्बन्ध वाले स्थान
में अशुभ प्रभाव डालते हैं ।
( १२ ) ६-८-१२ के भावेश को छोड़कर अन्य भावेश लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में
हों तो उस भाव के लिए शुभ है ।
( १३ ) कोई भावेद् अपने भाव से त्रिकोण या केन्द्र में पड़े तो शुभ है ।
( १७४ ) पंचमेश नवमेश में शुभ सम्बन्ध हो तो प्रताप को वृद्धि हो, भाग्योदय हो ।
( १५ ) केन्द्र या त्रिकोण के स्वामी से शुभ सम्बन्ध रखनेवाला ग्रह शुभ होता है।
१६८ : ज्योतिष-शिक्षा, सुतोय फलित खण्ड
( १६) केन्द्र या त्रिकोण में ६-८-१२ भाव के स्वामी हों तो अशुभ है ।
(१७) पंचम या नवम भाव में सूर्य, चंद्र, शनि या अष्टमेश या द्वादशेश हों तो
अशुभ फल होता है ।
(१८) कोई ग्रह अच्छे घर में ५ या ९ भाव या दोनों भावों से सम्वन्ध रखता हो
या उसका स्वामी हो तो वह ग्रह शुभ समझा जाता ë!
( १९ ) केन्द्रेश ओर त्रिकोणेण ये दोनों परस्पर स्थान में हों या दोनों मिलकर
किसी एक स्थान में हों या कोई एक दूसरे के स्थान में हों अर्थात् केन्द्रेश त्रिकोण में
श्लकोणेश केन्द्र में हो या दोनों में परस्पर पूर्णदृष्टि हो तो योगकारक होते हैं जिससे वह
राजा के समान या विद्वान् या शूर-वीर होता है 1
( २० ) एक ही ग्रह केन्द्रपति और त्रिकोणपति भी हो तथा केन्द्र या त्रिकोण में a
तो विशेष योग कारक होता है ! š
( २१ ) केन्द्रेश ओर त्रिकोणेषा यदि ३-६ आदि पाप भाव फे भी स्वामी हों तो
उन दोनों की केवळ परस्पर स्थिति और सम्बन्ध से ही योगफल नहीं होता अर्धात् ऐसी
स्थिति में अन्य उच्च स्थानादि स्थिति भी हो तभी योग समझना ।
(२२ ) केन्द्रेश पापग्रह होने से उसका पापत्व नष्ट हो जाता है; परन्तु वह पापग्रह
न्रिकोणेश भो हो तो शुभत्व आ जाता है।
( २३ ) केष्द्रेश और न्रिकोणेश में किसी प्रकार परस्पर सम्बन्ध हो परन्तु दूसरे
स्थान से जो इनसे भिन्न हो सम्बन्ध न हो तो शुभ फल दायक होते हैं ।
(२४) केन्द्रेश ओर त्रिकोणेश स्वयं दोषयुक्त हों अर्थात् नीच, अस्तंगत, शन्रुगृही
आदि होंतब भी सम्बन्ध भाव से विशेष फलदायक होते हैं । सम्बन्ध भी कई प्रकार का
होता है किसी प्रकार का सम्बन्ध हो परन्तु दुष्ट स्थान के स्वामी से सम्बन्ध न हो तो
योग भंग नहीं होता ë ।
(२५) पंचम-नवम भाव घन कहलाते हैं। सप्तम और दशम भाव विशेष सुख
कहलाते हैँ। राशि बल
१--जिस राशि का स्वामी बळी हो वह राशि पूरा फल देती है!
२--जिस राशि का स्वामी उच्च नीच या अस्त हो उस विचार से उसका फल
अधिक या कम होता है । जैसे उच्च में श्रेष्ठ फल, नीच में बुरा फल, बीच का फल
अनुपात से जानता ।
३--शीर्षोदय राशि आरम्भ में अच्छा फल देती ë 1
उभयोदय राशि बीच में अच्छा फल देती है ।
पृष्ठोदय राशि अन्त में अच्छा फल देती ë!
भाव
( १) घुम स्पान=१, ४,१०, ५, ९, ११ स्थान l
फल का स्थूल विचार : १६९
( २) अशुभ स्थान=र, ७ घर में अशुभग्रह हों तो मणुम ।
६, ८, १२ घर सदा अशुभ ।
७, घर भी साधारण अशुभ हे !
(३) सम स्थान=३ घर ( न शुभ है न अशुभ है) ।
२-७ घर में शुभ ग्रह हों तो सम है ।
(४) ग्रह १, ४, ७, १०, ५; ९, ११ स्थानों में अधिक बली होकर शुभ फल
देते हैं । ये भाव शुभ हैं ।
(५) पंचमेश की अपेक्षा नवमेश बली है।
( ६ ) तृतीयेश सामान्य बली है ।
(७) तृतीयेश से षष्ठेश बलो है, षष्ठेश से एकादशेश बली है ।
( ८) द्वितीयेश से द्वादशेश तथा द्वादशेश से अष्टमेश बली है ।
( ९ ) चतुर्थेश से सप्तमेश बलो है, सग्रह से अधिक बलवाला ग्रह बलवान् माना
जाता है । बल को समता में चर, स्थिर, द्विस्वभाव के क्रम से राशि बलवान् होती है 1
ग्रह का शुभाशुभत्व
ग्रह ३ प्रकार के होते हैं--(१) शुभग्रह, (२) पाप ( अशुभ ) ग्रह और (३)
मिश्रग्रह । इनमें भी २ प्रकार के स्वभाव के ग्रह है--
(१) नैसर्गिक अर्थात् स्वाभाविक, (२) तात्कालिक अर्थात् कृत्रिम ।
(१) नैसगिक--शुभग्रह अशुभग्र ह
गुरु, शुक्र, पूर्णचन्द्र । शनि, मंगल, सूर्य ओर क्षीण चन्द्र ।
(२) तात्कालिक--शुभ अशुभ
( क ) बुध--जब शुभग्रहों से युक्त हो जब पापम्रहों से युक्त हो 1
(ख ) राहु-केतु--शुमग्नह युक्त या पापग्रह युक्त या पापग्रह की राशि में ।
शुभग्रह की राशि में
( ग ) सूर्य-चंद्र--जब ये अष्टमेश हों छोषग्र ह-म॑. बु. T. शु. श. जब ये अष्टवो शुभ हैं मेण हों और लग्नेण न हों तो अशुभ हैं ।
( च ) अष्ठमेश--जब लग्नेश भी हो तो x x
शुभ है ।
(च) द्वितीयेश व्ययेश-जब शुभग्रह युक्त जब अकेले ही अणुभ स्थान में हों या
या शुभ राशि में हो तो घुम है पापग्रह युक्त हों तो अशुम हैं ।
(छ ) त्रिकोणेश-पापग्रह युक्त शुभ और x x"
शुभग्रह युक्त विशेष शुभ ह।
(ज) 'ारों केन्द्रेश-पापग्रह हों तो शुभ शुभग्रह हों तो अशुभ ।
(झ ) उक्त छुभग्रहों से अच्छा सम्बन्ध पापग्रहों से सम्बन्ध रखनेवाला ग्रह
रखनेवाला ग्रह शुभग्रह है । अशुभ ।
“१७० ; ज्पोतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड
_ (३ ) स्वाभाविक शुभग्रह मी त्रिषडाय पति हो तो = पापफल ।
स्वाभाविक पापग्रह भी त्रिषडाय पति हो तो = भति पापफल ।
(४ ) नैसगिक और तात्कालिक शुभ-अशुभ ग्रहों के मेल से इस प्रकार ग्रह होंगे-
शुभ + शुभ=अति छुभग्रह पाप + पाप=अति पापग्रह
शुभ + पाप=समग्रह पाप + शुभ=समग्रह
शुभ + समच्समग्रह पाप + सम-्मापग्नह
( ५ ) पूर्णं चंद्र शुभ है क्षीण चंद्र अशुभ है, इस पर विचार
क्षीण चंद्र-कृष्णपक्ष की अष्टमी के उपरान्त शुक्लअष्टमी तक ।
पूर्ण चंद्र-कृष्णपक्ष को अष्टमी के उपरान्त शुक्छअष्टमी तक ।
पूर्ण चंद्र--इसके उपरान्त ( भन्यमत ) ।
चंद्र--कृष्ण १० से शुक्ल ५ तक =१० दिन क्षीण=निबंरू ।
शुक्ल ५ से पुर्णिमा तक=१० दिनऱ्यूर्ण ।
कृष्ण १ से कृष्ण १० तक =१० दिन = मध्यम ।
राहु-केतु का विचार
१--राहु-केतु प्रबल होने पर भी जिस भाव में और जिस-जिस भाव के स्वामियों के
. साथ हों उसी के अनुसार शुभ या अशुभ फल देते हैं ।
इनके बिम्ब ( आकार) का अभाव होने के कारण स्पष्टतः अपने स्वभाव के
अनुसार फल नहीं दे सकते । जिस राशि या जिस भावेश के साथ रहते हैं उनके अनुसार
शुभमशुभ फल देते Ë । ये सूर्यं और चन्द्र को पीड़ा देनेवाले कहे जाते है इस कारण क्रूर
ग्रह माने गये हैं। ये सूर्य चंद्र का मार्ग जहाँ आपस में एक दूसरे से दो स्थानों में काटते š
उनमें से एक को राहु दूसरे को केतु कहते हँ । इनमें सदा ६ राशि का अन्तर रहता ë ।
२--राहु-केतु तमोगुणी हँ ये केन्द्र त्रिकोण में हों या इनसे केन्द्र त्रिकोण के स्वा-
मियों से योग दृष्टि आदि द्वारा सम्बन्ध हो तो शुभ हो जाते हैं ।
३--राहु-केतु शुभ के घर में हों और किसी शुभग्रह से सम्बन्ध हो तो शुभ है ।
४--राहु-केतु जिस स्थान में हों या जिस भावेश के साथ हों उस भाव की वृद्धि
करते हैं ।
५--राहु दुष्ट फल दता है परन्तु मित्रगृही हो तो अशुभ फल कुछ कम हो जाता है |
६--राहु का फल लग्न आदि भावों में शनि के समान ही है ।
७--राहु कन्या और मिथुन राशि में कुछ शुभ फल भी देता है 1
८--१-२-३ या ४ राशि का राहु लग्न में हो तो शुभ हैं ।
९--मेष का राहु किसी शुभ ग्रह के साथ हो तो अति शुभ ।
१०-सभी ग्रह राहु और केतु से घिरे हों या जिस स्थान में राहु या केतु हो उस
स्थान के अन्तर्गत हों तो कालसर्प योग हो जाता है जिससे घन-हानि होकर दरिद्रता
होती है जीवन कम होता है ।
~
फल 'का स्थूल विचार : १७१
११--राहु-कैतु ४, ६ ८ १२ घर को छोड़कर द्विस्वभाव पर अर्थात् ३-९ घर में
हों तो लाभदायक होते हैं ।
१२--राहु के साथ जो ग्रह हो उसका अच्छा या बुरा गुण राहु ग्रहण कर लेता है।
परन्तु राहु के साथ रहनेवाला शुभग्रह भी अपनी दशा अन्तदेशा में बुरा फल देता है ।
१३--दशम में राहु हो तो अपनी दशा में तीर्थ कराता है ।
१४ - राहु, केतु सां बुध २-१२ घर के स्वामी होकर दिस्वभाव के होते हैं । वे
जिस ग्रह के साथ रहते हैं वैसे ही हो जाते हैं अर्थात् गुरु, शुक्र चन्द्र के साथ शुभ और
मंगल शनि के साथ अशुभ फल देते हैं ।
१५--राहु-केतु जब कहो अकेले हों तो राहु की अन्तिम दशा निषिद्ध होती है,
प्रथम दशा शुभ होतो है । केतु की प्रारम्भिक दशा निकृष्ट और अन्तिम दशा उत्तम
होती है। `
१६--राहु-केतु में से कोई ४-१० घर में हो और त्रिकोण के स्वामी से सम्बन्ध हो
तो शुभफल होता है।
१७--राहु-केतु के भीतर केन्द्र स्वामी या त्रिकोणेश का अन्तर होने पर शुभफळ
होता है । :
१८--राहु-केतु त्रिकोण में हों और किसी केन्द्रेश से सम्बन्ध हो तो अच्छा है।
१९--राजयोग हो तो राहु-केतु की महादशा में तथा राजयोग कारक प्रह की
अन्तर्दशा में या उस ग्रह की अन्तर्दशा में जिसके घर में राहु, केतु हों उसका फळ होता
है। परन्तु राहु-केतु १-४-१० या ५-९ घर में हों।
अन्य ग्रह
१--सुयं-चंद्र स्वगृही या च्च में हों तो राजा सरोखा ऐश्वर्य देते ë
२---सूर्य-चंद्र मकर आदि ६ राशियों में बलयुक्त हों तो पूरा फल देते हैँ 1
३--सूय से सप्तम में जो ग्रह हों पूर्ण फल देते हैँ ।
ग्रह अपने दीप्तांश के भीतर फल देते हैं दीप्तांश के बाहर पहुँच जाने पर फ में
अन्तर पड़ जाता है । अर्थात् शुभ प्रह की योगदृष्टि में इतने अंश के भीतर शुभ ë!
पापग्रह की योग दृष्टि में इतने अंश के भीतर अशुभ है । अंशो से अधिक अन्तर पड़
जाने पर शुभता या अशुभता घट जाती ë!
ग्रह सूर्य चन्द्र मंगल बुघ गुरु शुक्र शनि
दीप्तांश १५ १२ ८ ७ q ७ ९
५--पापग्रह ३-६-११ घर में अच्छा फल देते हैं, १-८-१२ भाव में अनिष्ट
करते हैं ।
६--क्षीण चन्द्र १-६-८-१२ में अशुभ है 1
७--सौम्यग्रह सब स्थानों में साघारणतः अच्छा कळ देते हैं । |
८--जिस राशि में चन्द्र हो वह राशि या उसका स्वामी बली हो और चन्द्र मी
१७२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय-फलित खण्डं
बलवान् हो तो राशि युक्त पुर्ण फल देता है । इनमें २ बलवान् हों तो मध्यमफल, केवल
१ बलवान् हो तो हीनफर । इसी प्रकार सूर्यादि ग्रहों के सम्बन्ध भी विचारना ।
९--शनि जहाँ हो उस भाव की वृद्धि करता है जिसे देखता है उसकी हानि
करता है ।
१०-- गुरु अपने स्थान की हानि करता है उसकी दृष्टि शुभ है ।
शनि अपने स्थान का पालन करता है उसकी दृष्टि परम भयकारक है ।
अन्य मत--गुरु केन्द्र को छोड़कर अन्य स्थानों में हो तो हानि करता है । `
दानि केन्द्र को छोड़कर अन्य स्थान में हो तो वृद्धि करता है ।
११--गुरु और शुक्र सदा शुभग्नह हैं चाहे वे नीच के क्यों न हों या श्रेष्ठों के साथ
हों परन्तु उनकी भलाई करने की शक्ति कम हो जातो है ।
१२--शुक्र अस्त न हो, पाप युक्त भो न हो और स्वगृही या उच्च में होकर
१०-११-१२ भाव में हो तो अच्छा ë !
१३--बुध-शुक्र कन्या राशि में हों ओर मकर लग्न हो तो शुभ फल देगा ।
यद्यपि कन्या का शुक्र नीच का होता है परन्तु उसका मित्र बुध का साथ होने से नीच
भंग और राजयोग कारक हो जाने से शुभ फर देगा
१४--शनि दीघं जीवन, मृत्यु और साधारण उपजीविका का जरिया बतावा ë ।
१५--म्रह जो शुभग्रह से ( चाहे वह नेसगिक या परिस्थितिवश शुभ हो ) सम्बन्ध
रखता है तो वह भी शुभ हो जाता ë । १५--मंगल उच्च का हो या १०-११ भाव में हो तो अच्छा है । मंगल ९ भाव में
भी बली होता है । हे
१७--हीन बल ग्रह अशुभ होते हैं ।
१८--चन्द्र नवम से द्वितीय भाव में भी पूर्वोवत भाव के तुल्य बली होता है इसमें
द्वितीय से नवम स्थान विशेष बली हैं ।
१९-- इन भावों से ग्रह शुभ फल देते हैं--
ग्रह सूर्यं चन्द्र गुरु शुक्र शनि सवंग्रह
भाव ६ ४ त्रिकोण लग्न तृतीय लाभ में
परन्तु इन भावों में कुछ क्लेश उत्पन्न करते है--
ग्रह सूर्ये चंद्र गुरु शुक्र शनि मंगल
भाव ९ ६ ५ ७ ८ ८
- ग्रहों के सम्बन्ध पर विचार
. कई स्थानों में लिखा मिलता है कि अमुक का पाप या शुभ ग्रह से सम्बन्ध हो । तब
यह सम्बन्ध किस प्रकार से होता है इस पर यहाँ विचार करते हुँ
ग्रहों पर सम्बन्ध निम्नलिखित प्रकार से ही साधारणत: विचार किया जाता ë —
(१) सहवास का सम्बन्ध- अर्थात् एक से दुसरा केन्द्र, त्रिकोण, त्रिक, षडष्टक,
फल का स्थूल विचार : १७३
दिद्वादश आदि अनेक प्रकार के स्थान के विचार से सम्बन्ध होते हँ । ये भी दो प्रकार
के है:--(१) परस्पर सम्बन्ध (२) एक दूसरे का तो सम्बन्ध हो पर दुसरा किसी विशेष स्थान में हो जिससे परस्पर सम्बन्ध न होता हो ।
(३) मैत्रो का सम्बन्ब--किसी विशेष ग्रह से मित्र, शत्रु, सम, अधिमित्र, अधिशत्र,, नैसर्गिक या पंचधा मैत्री के विचार से जैसी मैत्री प्रगट हो, उस प्रकांर की मैत्री सम्बन्ध
का विचार होता ë 1
(४) दृष्टि का सम्बन्ध--एक ग्रह की दूसरे ग्रह के भाव पर जैसी दृष्टि पड़ती है, वैसा सम्बन्ध दृष्टि से विचार होता है ।
यहाँ भो दृष्टि सम्बन्ध २ प्रकार का होता है (१) परस्पर ग्रहों की दृष्टि हो (२) एक ग्रह की दृष्टि दूसरे ग्रह पर हो परन्तु दूसरे की दृष्टि हो ।
इन सबको उदाहरण देकर नीचे समझाया है
( १ ) सहवारा--यहाँ लनन में राहु गुरु के साथ है ओर शुभ ग्रह के साथ रहने
से शुभ है । सप्तमें केतु मंगल के साथ `
है । पाप ग्रह के साथ केतु का सम्बन्ध
होने से वह भी पाप फल देगा ।
(२) स्थान--छग्नेश सूयं और
पंचमेश गुरु का परिवतंन योग है अर्थात
एक दूसरे के स्थान में हैँ । यहाँ लग्नेश
सूर्यं और त्रिकोणेश गुरु है। इनका
सम्बन्ध अच्छा हूँ ।
इसी भ्रकार सप्तमेश शनि और नवमेश मंगळ का परिवर्तन योग है ( एक दूसरे के
स्थान में हूँ ) यद्यपि यह परिवर्तन अशुभ ग्रहों का अच्छा नहीं होता परन्तु त्रिकोणेश
और केन्द्रेश का परिवर्तन होने से अच्छा है 1 ये परस्पर स्थान के सम्बन्ध हुए ।
दूसरा प्रकार--जब एक से सम्बन्ध हो दूसरे से सम्बन्ध न हो । जैसे चतुर्थेश मंगल
केन्द्र ( सप्तम ) में है, सप्तमेश शनि नवम में है। परन्तु सप्तमेश शनि या सप्तमस्थ
ग्रह मंगल का चतुर्थ स्थित ग्रह बुध से कोई सम्बन्ध नहीं 1 यहाँ केन्द्र-स्वामी मंगल
पाप ग्रह होने से अच्छा है वह केन्द्र (सप्तम) में हो हैं 1
यहाँ चतुर्थेश सप्तम सप्तमेश नवम है । इसी प्रकार एक दुसरे से स्थान के बिचार
से और भी परस्पर सम्बन्ध हो सकते हैं जैसे घनेश नवम भाव में हो नवमेश लाभभाव में
हो और लाभेश धन भाव में हो तो माळा योग हो जाता है । यह एक प्रकार का राजयोग है 1 इसमें एक दूसरे भाव से परस्पर सम्बन्ध स्थापित हो गया ।
इस स्थान का सम्बन्ध वर्षे कुंडली के विचार से भी होता है जिससे ग्रह के प्रभाव
में अन्तर पड़ जाता है। जैसे कोई उच्च का ग्रह नीच नवांश में या नीच का ग्रह
उच्च नवांश के विचार से फल में अन्तर पड़ जायगा ।
१७४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
नवांश के विचार से भाव स्वामियो के सम्बन्ध की कड़ी स्थापित होती हैं जैसे लग्न
चर हो उसका नवांश स्वामी भी चर हो तो राजयोग हो जाता है । और लग्नेश की
राशि का नवांशेश जो हो उसकी राशि का नवांशेशबली हो तो राजयोग हो जाता है,
इसी प्रकार के अनेक योगों का विचार आगे मिलेगा ।
(३) क्षेत्र अर्थात् मैत्री द्वारा सम्बन्ध--लग्न में गुरु अपने मित्र सूर्यं के क्षेत्र में है,
अपने समक्षेत्री राहु से युक्त है। लग्नेश सूर्य अपने मित्र गुरु के क्षेत्र में है और यह पंचमेश गुरु लग्न में है । गुरु पर सप्तम स्थानीय मंगल को पूर्ण दृष्टि है, जो उसका मित्र
है । इसो प्रकार साथी या दूसरा ग्रह या उस भाव के स्वामी से भाव स्थित ग्रह की मैत्री
नैसगिक एवं पंचधा मैत्री से भी विचारना पड़ता है, यह मैत्री सम्बन्ध नवांश आदि वर्ग
कु.डलियों में भी विचार किया जाता हैं 1
(४) दृष्टि द्वारा सम्बन्ध-यहां छग्न सिंह एवं वहाँ स्थित गुरु पर मंगल की पूर्ण
दृष्टि हे ओर गुरुको मंगल पर पूर्ण दृष्टि है, यहाँ परस्पर दृष्टि का सम्बन्ध हुआ 1 इसी
प्रकार ददामस्थ चंद्र और चतुर्थ बुध की भी परस्पर दृष्टि है। शनि और शुक्र की भी
परस्पर दृष्टि है इस प्रकार परस्पर दृष्टि का सम्बन्ध है ।
सँगेल की चंद्र पर पुर्ण दृष्टि है परन्तु चंद्र की दृष्टि मंगल पर नहीं है । गुरु की सूर्य
पर पूर्ण दृष्टि है परन्तु सूर्य को दृष्टि गुरुपर नहीं है। इस प्रकार एक ओर दृष्टि
सम्बन्ध हुआ । इस प्रकार विचारना कि एक ओर दृष्टि सम्बन्ध या परस्पर दृष्टि का
सम्बन्ध है ।
ग्रहों का सम्बन्ध उपरोक्त प्रकार से विचार कर देखें।
(१) विचारणोय ग्रह जहाँ हों उससे सम्बन्ध करने वाले कहाँ-कहाँ पर हैं जैसे लग्न
में गुरु है तो गुरु से सम्बन्ध करने वाले ग्रह कहाँ-कहाँ हैं उपरोक्त चारों प्रकार से उसका
सम्बन्ध विचारना ।
(२) यह ग्रह किस-किस भाव का स्वामी है उस-उस भाव से सम्बन्ध रखने वाले
ग्रह-किस-किस भाव में हूँ । जैसे गुर का विचार करना है । यह पंचम और अष्टम भाव
का स्वामी है जहाँ उसका स्वगृह ९ और १२ राशि है। अब वहाँ देखना है कि पंचम
झौर अष्टम भाव से सम्बन्ध रखनेवाले ग्रह किस भाव के स्वामी हैं और किन ग्रहों का
सम्बन्ध इन भावों से है ।
- (३) वह ग्रह जहाँ है उस राशि का स्वामी ग्रह किस राशि में है उस ग्रह और उस
` राशि से किस-किस ग्रह का सम्वन्ध है। जैपे गुरु सिह में हैं उसका स्वामी सूर्य है जो
पंचम स्थान (त्रिकोण) में घन राशि का है । अब यहाँ देखना है कि घन राशि से सम्वन्ध
रखनेबाले ग्रह, राशि स्वामी आदि कहाँ पर हैं । उनका कैसा सम्बन्ध है। एवं सूर्य से
सम्बन्ध रखनेवाले ग्रह कहाँ-कहाँ पर हैं । 4
इस प्रकार उपरोक्त बताये चारों प्रकार से सब प्रकार से सम्बन्ध का फळ कुण्डली,
चन्द्र कुंडली, नवांश कुंडली आदि में जैसी आवदयकता हो पुरा विचार आवश्यक है ।
फल का स्थूल विचार : १७५
ये सम्बन्ध ३ प्रकार के होते हैं । कोई सम्बन्ध अच्छे होते हैं, कोई बुरे होते हैँ और कहीं अच्छे बुरे का मिश्रण होता है ये मिश्र कहलाते ë । अच्छे ग्रह--उच्च, मूलत्रिकोण या स्वगृही ग्रह, केन्द्र या त्रिकोण से शुभ सम्बन्ध रखने वाला ग्रह । शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट ग्रह । मित्र ग्रह युक्त या दृष्ट ग्रह । शुभ वगं में ग्रह शुभ ग्रहों के बीच ग्रह, शुभ ग्रह वक्री इत्यादि । बुरे ग्रह--नीच या दात्रुगृही ग्रह, ६-८-१२ भाव में ग्रह या इनके स्वामियों से सम्बन्ध रखनेवाले ग्रह, अशुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट ग्रह, शत्रु ग्रह से युक्त या दृष्ट ग्रह, अशुभ वर्ग में ग्रह, अस्तंगत ग्रह, दो पाप ग्रहों के:बीच ग्रह, पाप ग्रह वक्री इत्यादि । योग कारक
कई स्थानों में आता है कि अमुक परिस्थिति में ग्रह आने से योगकारक हो जाता है। मारक योग के विषय में पहिले बतला चुके हैं फिर भी यहाँ योग कारक के सम्बन्ध से बतलाते है ।
ग्रहों के सम्बन्ध से जो अच्छे योग बनते हैँ Q योग कारक हैँ ग्रहों के सम्बन्ध से त्रिकोण, केन्द्र, निषडाय, षडष्टक, alas आदि अनेक प्रकार के अच्छे और बुरे योग बनते हैं इनमें शुभयोग कारक इस प्रकार हो सकते हैँ ।
(१) केन्द्रेश त्रिकोण में और त्रिकोणेश केन्द्र में हो या दोनों एक साथ केन्द्र या घ्रिकोण हों में तो योगकारक हुआ । `
(२) पंचमेश और नवमेश इनमें से किसी का दशमेश से सम्बन्ध हो जाना अच्छा योग होता है ।
(३) यह सम्बन्ध केन्द्र स्वामियो में से किसका सबसे उत्तम होता है वह इस प्रकार हुँ--चदुर्थेंश से अधिक बली सप्तमेश और सप्तमेश से दशमेश सबसे अधिक बली है और त्रिकोण में लग्नेश से पंचमेश अधिक बली है पंचमेश से नवमेश अधिक बली है ।
(३) एक ही कोई ग्रह यदि कोण और केन्द्र दोनों का स्वामी हो तब भी योगकारक हो जाता है। इस पर यदि उसका दूसरे त्रिकोण से मी सम्बन्ध हो जाय तो अत्यन्त श्रेष्ठ है ।
(५) यदि केन्द्रेश और पंचमेश भी हो तो योगकारक हो जाता है यदि नवमेदा से
भी सम्बन्ध हो जाय तो श्रेष्ठ योगकारक हो जाता है 1
. (६) यदि केन्द्र में राहु-केतु भी हों और त्रिकोण से सम्बन्ध हो जाये या त्रिकोण में
होकर केन्द्र से सम्बन्ध हो जाये तो शुभयोग कारक हो जाता है ।
(७) त्रिषडाय आदि अशुभ स्थान के स्वामी होने से सम्बन्ध भंग हो जाता है ।
परन्तु केन्द्रेश और त्रिकोणेश यदि त्रिषडाय आदि स्थान के स्वामी भी होने से सम्बन्ध हो जाय उस परिस्थिति में यदि वे उच्चस्थान में हों या अन्य शुभयोग भी हों तो यह योग भंग नहीं होता ।
(८) यदि अष्टमेश नवमेश भी हो या लामेश दशमेश भी हो तो इनके सम्बन्ध मात्र
१७६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
से शुभयोग का लाभ प्राप्त नहों हो सकता । अर्थात् केन्द्रेश और योगेश का सम्बन्ध नीच आदि स्थानगत दोष युक्त होने पर भी सम्बन्ध मात्र से योगकारक कहा है परन्तु लाभजनक नहीं है ।
(९) योग के लाभ और भंग में उसके स्थान की प्रबलता के विचार से योग की
अल्पता या प्रबलता पर विचार करना ।
(१०) राजयोग कारक ग्रह शुभ या अशुभ दोनों प्रकार के स्थान के स्वामी हों निकेश न हों और न त्रिकभाव से कोई सम्बन्ध हो तो अशुभ घर के अनिष्ट फल को दबा देता है l
फल विचारते समय इन बातों पर भी ध्यान देना (१) समाज. स्थिति और आयु के अनुसार फल कहना । (२) देश काल और वतंमान एवं पात्र पर भी ध्यान देते हुए फल कहना ।
(३) कुण्डली का शुभाशुभ फल जानने में इस प्रकार विचारें कि वह ग्रह शुभ या पाप फल किस प्रमाण में देगा ।
प्रहका उच्च मूलत्रिकोण स्वगृही भित्रगृही शात्रगृही अस्त और नीच शुभफल पूर्ण ३ š š ४ से कम ( कुछ नहों ) ग्रह का अस्तंगत या नीच शत्रुगृही मित्रगृही स्वगृही त्रिकोण उच्च में पापफल पूणं पापफल=१ दै ई ` ॐ ४ से कम (कुछ नही) (४ ) ग्रह के रूप स्वभाव आदि भाव सम्बन्ध से दिचारना । ग्रह का गुण धर्म आदि पर भो पूरा विचार करना ।
भावफल देखने को भाव चक्र बनाकर लग्न से १२ राशि तक में दक्षिण बाम अंग का विचार करना जैसा कि राशिचक्र के.२ भाग करने से प्रकट होगा । भावचक्र में ग्रह स्थापित कर फिर शुभाशुभ फल का विचार करना कालपुरुष के अंग में लग्न से ६ भाव तक दाहिना अंग, ७ से १२ भाव तक बाँयां अंग ë! प्रत्येक भाव में भी दाहिने बाँये अंग का विचार होता है। १ से १५० तक्र दाहिना अंग पश्चात् बायां अंग समझना |
( ६) लर्न राशि भावेश, भावकारक आदि का विचार कर ग्रह का स्थान दृष्टि आदि द्वारा सम्बन्ध और बल आदि पर पूर्ण विचार कर नाना प्रकार की वर्ग कुण्डलिग्राँ, अष्टक वर्ग आदि के चक्र पर से भी विचार कर फल कहना । (७ ) इनके अतिरिक्त ग्रह-मैत्री, ग्रहों की दीप्तादि अवस्था, ग्रह की बाल-वृद्धादि, आयु, ग्रहों की १० अवस्था, ग्रहों का घर आदि तथा ग्रह रश्मि पर भी विचार कर फल कहना । साथ ही साथ गुलिक एवं अप्रकाश आदि ग्रहों की स्थिति पर भी विचार करना । (८ ) लर्न कुण्डली, चन्द्र कुण्डली, सूर्य कुण्डली से भी विचार कर कारक ग्रह से भी विचारना ।
( ९ ) ग्रह फल कैसे देता है, उसे फळ देने का कौन साधन है, उसे अधिकार कौन