भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 418 में से

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१६८ : ज्योतिष-शिक्षा, सुतोय फलित खण्ड

( १६) केन्द्र या त्रिकोण में ६-८-१२ भाव के स्वामी हों तो अशुभ है ।

(१७) पंचम या नवम भाव में सूर्य, चंद्र, शनि या अष्टमेश या द्वादशेश हों तो

अशुभ फल होता है ।

(१८) कोई ग्रह अच्छे घर में ५ या ९ भाव या दोनों भावों से सम्वन्ध रखता हो

या उसका स्वामी हो तो वह ग्रह शुभ समझा जाता ë!

( १९ ) केन्द्रेश ओर त्रिकोणेण ये दोनों परस्पर स्थान में हों या दोनों मिलकर

किसी एक स्थान में हों या कोई एक दूसरे के स्थान में हों अर्थात्‌ केन्द्रेश त्रिकोण में

श्लकोणेश केन्द्र में हो या दोनों में परस्पर पूर्णदृष्टि हो तो योगकारक होते हैं जिससे वह

राजा के समान या विद्वान्‌ या शूर-वीर होता है 1

( २० ) एक ही ग्रह केन्द्रपति और त्रिकोणपति भी हो तथा केन्द्र या त्रिकोण में a

तो विशेष योग कारक होता है ! š

( २१ ) केन्द्रेश ओर त्रिकोणेषा यदि ३-६ आदि पाप भाव फे भी स्वामी हों तो

उन दोनों की केवळ परस्पर स्थिति और सम्बन्ध से ही योगफल नहीं होता अर्धात्‌ ऐसी

स्थिति में अन्य उच्च स्थानादि स्थिति भी हो तभी योग समझना ।

(२२ ) केन्द्रेश पापग्रह होने से उसका पापत्व नष्ट हो जाता है; परन्तु वह पापग्रह

न्रिकोणेश भो हो तो शुभत्व आ जाता है।

( २३ ) केष्द्रेश और न्रिकोणेश में किसी प्रकार परस्पर सम्बन्ध हो परन्तु दूसरे

स्थान से जो इनसे भिन्न हो सम्बन्ध न हो तो शुभ फल दायक होते हैं ।

(२४) केन्द्रेश ओर त्रिकोणेश स्वयं दोषयुक्त हों अर्थात्‌ नीच, अस्तंगत, शन्रुगृही

आदि होंतब भी सम्बन्ध भाव से विशेष फलदायक होते हैं । सम्बन्ध भी कई प्रकार का

होता है किसी प्रकार का सम्बन्ध हो परन्तु दुष्ट स्थान के स्वामी से सम्बन्ध न हो तो

योग भंग नहीं होता ë ।

(२५) पंचम-नवम भाव घन कहलाते हैं। सप्तम और दशम भाव विशेष सुख

कहलाते हैँ। राशि बल

१--जिस राशि का स्वामी बळी हो वह राशि पूरा फल देती है!

२--जिस राशि का स्वामी उच्च नीच या अस्त हो उस विचार से उसका फल

अधिक या कम होता है । जैसे उच्च में श्रेष्ठ फल, नीच में बुरा फल, बीच का फल

अनुपात से जानता ।

३--शीर्षोदय राशि आरम्भ में अच्छा फल देती ë 1

उभयोदय राशि बीच में अच्छा फल देती है ।

पृष्ठोदय राशि अन्त में अच्छा फल देती ë!

भाव

( १) घुम स्पान=१, ४,१०, ५, ९, ११ स्थान l

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