सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 185, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंफल का स्थूल विचार : १६९
( २) अशुभ स्थान=र, ७ घर में अशुभग्रह हों तो मणुम ।
६, ८, १२ घर सदा अशुभ ।
७, घर भी साधारण अशुभ हे !
(३) सम स्थान=३ घर ( न शुभ है न अशुभ है) ।
२-७ घर में शुभ ग्रह हों तो सम है ।
(४) ग्रह १, ४, ७, १०, ५; ९, ११ स्थानों में अधिक बली होकर शुभ फल
देते हैं । ये भाव शुभ हैं ।
(५) पंचमेश की अपेक्षा नवमेश बली है।
( ६ ) तृतीयेश सामान्य बली है ।
(७) तृतीयेश से षष्ठेश बलो है, षष्ठेश से एकादशेश बली है ।
( ८) द्वितीयेश से द्वादशेश तथा द्वादशेश से अष्टमेश बली है ।
( ९ ) चतुर्थेश से सप्तमेश बलो है, सग्रह से अधिक बलवाला ग्रह बलवान् माना
जाता है । बल को समता में चर, स्थिर, द्विस्वभाव के क्रम से राशि बलवान् होती है 1
ग्रह का शुभाशुभत्व
ग्रह ३ प्रकार के होते हैं--(१) शुभग्रह, (२) पाप ( अशुभ ) ग्रह और (३)
मिश्रग्रह । इनमें भी २ प्रकार के स्वभाव के ग्रह है--
(१) नैसर्गिक अर्थात् स्वाभाविक, (२) तात्कालिक अर्थात् कृत्रिम ।
(१) नैसगिक--शुभग्रह अशुभग्र ह
गुरु, शुक्र, पूर्णचन्द्र । शनि, मंगल, सूर्य ओर क्षीण चन्द्र ।
(२) तात्कालिक--शुभ अशुभ
( क ) बुध--जब शुभग्रहों से युक्त हो जब पापम्रहों से युक्त हो 1
(ख ) राहु-केतु--शुमग्नह युक्त या पापग्रह युक्त या पापग्रह की राशि में ।
शुभग्रह की राशि में
( ग ) सूर्य-चंद्र--जब ये अष्टमेश हों छोषग्र ह-म॑. बु. T. शु. श. जब ये अष्टवो शुभ हैं मेण हों और लग्नेण न हों तो अशुभ हैं ।
( च ) अष्ठमेश--जब लग्नेश भी हो तो x x
शुभ है ।
(च) द्वितीयेश व्ययेश-जब शुभग्रह युक्त जब अकेले ही अणुभ स्थान में हों या
या शुभ राशि में हो तो घुम है पापग्रह युक्त हों तो अशुम हैं ।
(छ ) त्रिकोणेश-पापग्रह युक्त शुभ और x x"
शुभग्रह युक्त विशेष शुभ ह।
(ज) 'ारों केन्द्रेश-पापग्रह हों तो शुभ शुभग्रह हों तो अशुभ ।
(झ ) उक्त छुभग्रहों से अच्छा सम्बन्ध पापग्रहों से सम्बन्ध रखनेवाला ग्रह
रखनेवाला ग्रह शुभग्रह है । अशुभ ।