सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 186, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ें“१७० ; ज्पोतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड
_ (३ ) स्वाभाविक शुभग्रह मी त्रिषडाय पति हो तो = पापफल ।
स्वाभाविक पापग्रह भी त्रिषडाय पति हो तो = भति पापफल ।
(४ ) नैसगिक और तात्कालिक शुभ-अशुभ ग्रहों के मेल से इस प्रकार ग्रह होंगे-
शुभ + शुभ=अति छुभग्रह पाप + पाप=अति पापग्रह
शुभ + पाप=समग्रह पाप + शुभ=समग्रह
शुभ + समच्समग्रह पाप + सम-्मापग्नह
( ५ ) पूर्णं चंद्र शुभ है क्षीण चंद्र अशुभ है, इस पर विचार
क्षीण चंद्र-कृष्णपक्ष की अष्टमी के उपरान्त शुक्लअष्टमी तक ।
पूर्ण चंद्र-कृष्णपक्ष को अष्टमी के उपरान्त शुक्छअष्टमी तक ।
पूर्ण चंद्र--इसके उपरान्त ( भन्यमत ) ।
चंद्र--कृष्ण १० से शुक्ल ५ तक =१० दिन क्षीण=निबंरू ।
शुक्ल ५ से पुर्णिमा तक=१० दिनऱ्यूर्ण ।
कृष्ण १ से कृष्ण १० तक =१० दिन = मध्यम ।
राहु-केतु का विचार
१--राहु-केतु प्रबल होने पर भी जिस भाव में और जिस-जिस भाव के स्वामियों के
. साथ हों उसी के अनुसार शुभ या अशुभ फल देते हैं ।
इनके बिम्ब ( आकार) का अभाव होने के कारण स्पष्टतः अपने स्वभाव के
अनुसार फल नहीं दे सकते । जिस राशि या जिस भावेश के साथ रहते हैं उनके अनुसार
शुभमशुभ फल देते Ë । ये सूर्यं और चन्द्र को पीड़ा देनेवाले कहे जाते है इस कारण क्रूर
ग्रह माने गये हैं। ये सूर्य चंद्र का मार्ग जहाँ आपस में एक दूसरे से दो स्थानों में काटते š
उनमें से एक को राहु दूसरे को केतु कहते हँ । इनमें सदा ६ राशि का अन्तर रहता ë ।
२--राहु-केतु तमोगुणी हँ ये केन्द्र त्रिकोण में हों या इनसे केन्द्र त्रिकोण के स्वा-
मियों से योग दृष्टि आदि द्वारा सम्बन्ध हो तो शुभ हो जाते हैं ।
३--राहु-केतु शुभ के घर में हों और किसी शुभग्रह से सम्बन्ध हो तो शुभ है ।
४--राहु-केतु जिस स्थान में हों या जिस भावेश के साथ हों उस भाव की वृद्धि
करते हैं ।
५--राहु दुष्ट फल दता है परन्तु मित्रगृही हो तो अशुभ फल कुछ कम हो जाता है |
६--राहु का फल लग्न आदि भावों में शनि के समान ही है ।
७--राहु कन्या और मिथुन राशि में कुछ शुभ फल भी देता है 1
८--१-२-३ या ४ राशि का राहु लग्न में हो तो शुभ हैं ।
९--मेष का राहु किसी शुभ ग्रह के साथ हो तो अति शुभ ।
१०-सभी ग्रह राहु और केतु से घिरे हों या जिस स्थान में राहु या केतु हो उस
स्थान के अन्तर्गत हों तो कालसर्प योग हो जाता है जिससे घन-हानि होकर दरिद्रता
होती है जीवन कम होता है ।
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