भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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१७२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय-फलित खण्डं

बलवान्‌ हो तो राशि युक्त पुर्ण फल देता है । इनमें २ बलवान्‌ हों तो मध्यमफल, केवल

१ बलवान्‌ हो तो हीनफर । इसी प्रकार सूर्यादि ग्रहों के सम्बन्ध भी विचारना ।

९--शनि जहाँ हो उस भाव की वृद्धि करता है जिसे देखता है उसकी हानि

करता है ।

१०-- गुरु अपने स्थान की हानि करता है उसकी दृष्टि शुभ है ।

शनि अपने स्थान का पालन करता है उसकी दृष्टि परम भयकारक है ।

अन्य मत--गुरु केन्द्र को छोड़कर अन्य स्थानों में हो तो हानि करता है । `

दानि केन्द्र को छोड़कर अन्य स्थान में हो तो वृद्धि करता है ।

११--गुरु और शुक्र सदा शुभग्नह हैं चाहे वे नीच के क्यों न हों या श्रेष्ठों के साथ

हों परन्तु उनकी भलाई करने की शक्ति कम हो जातो है ।

१२--शुक्र अस्त न हो, पाप युक्त भो न हो और स्वगृही या उच्च में होकर

१०-११-१२ भाव में हो तो अच्छा ë !

१३--बुध-शुक्र कन्या राशि में हों ओर मकर लग्न हो तो शुभ फल देगा ।

यद्यपि कन्या का शुक्र नीच का होता है परन्तु उसका मित्र बुध का साथ होने से नीच

भंग और राजयोग कारक हो जाने से शुभ फर देगा

१४--शनि दीघं जीवन, मृत्यु और साधारण उपजीविका का जरिया बतावा ë ।

१५--म्रह जो शुभग्रह से ( चाहे वह नेसगिक या परिस्थितिवश शुभ हो ) सम्बन्ध

रखता है तो वह भी शुभ हो जाता ë । १५--मंगल उच्च का हो या १०-११ भाव में हो तो अच्छा है । मंगल ९ भाव में

भी बली होता है । हे

१७--हीन बल ग्रह अशुभ होते हैं ।

१८--चन्द्र नवम से द्वितीय भाव में भी पूर्वोवत भाव के तुल्य बली होता है इसमें

द्वितीय से नवम स्थान विशेष बली हैं ।

१९-- इन भावों से ग्रह शुभ फल देते हैं--

ग्रह सूर्यं चन्द्र गुरु शुक्र शनि सवंग्रह

भाव ६ ४ त्रिकोण लग्न तृतीय लाभ में

परन्तु इन भावों में कुछ क्लेश उत्पन्न करते है--

ग्रह सूर्ये चंद्र गुरु शुक्र शनि मंगल

भाव ९ ६ ५ ७ ८ ८

  • ग्रहों के सम्बन्ध पर विचार

. कई स्थानों में लिखा मिलता है कि अमुक का पाप या शुभ ग्रह से सम्बन्ध हो । तब

यह सम्बन्ध किस प्रकार से होता है इस पर यहाँ विचार करते हुँ

ग्रहों पर सम्बन्ध निम्नलिखित प्रकार से ही साधारणत: विचार किया जाता ë —

(१) सहवास का सम्बन्ध- अर्थात्‌ एक से दुसरा केन्द्र, त्रिकोण, त्रिक, षडष्टक,