सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 189, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंफल का स्थूल विचार : १७३
दिद्वादश आदि अनेक प्रकार के स्थान के विचार से सम्बन्ध होते हँ । ये भी दो प्रकार
के है:--(१) परस्पर सम्बन्ध (२) एक दूसरे का तो सम्बन्ध हो पर दुसरा किसी विशेष स्थान में हो जिससे परस्पर सम्बन्ध न होता हो ।
(३) मैत्रो का सम्बन्ब--किसी विशेष ग्रह से मित्र, शत्रु, सम, अधिमित्र, अधिशत्र,, नैसर्गिक या पंचधा मैत्री के विचार से जैसी मैत्री प्रगट हो, उस प्रकांर की मैत्री सम्बन्ध
का विचार होता ë 1
(४) दृष्टि का सम्बन्ध--एक ग्रह की दूसरे ग्रह के भाव पर जैसी दृष्टि पड़ती है, वैसा सम्बन्ध दृष्टि से विचार होता है ।
यहाँ भो दृष्टि सम्बन्ध २ प्रकार का होता है (१) परस्पर ग्रहों की दृष्टि हो (२) एक ग्रह की दृष्टि दूसरे ग्रह पर हो परन्तु दूसरे की दृष्टि हो ।
इन सबको उदाहरण देकर नीचे समझाया है
( १ ) सहवारा--यहाँ लनन में राहु गुरु के साथ है ओर शुभ ग्रह के साथ रहने
से शुभ है । सप्तमें केतु मंगल के साथ `
है । पाप ग्रह के साथ केतु का सम्बन्ध
होने से वह भी पाप फल देगा ।
(२) स्थान--छग्नेश सूयं और
पंचमेश गुरु का परिवतंन योग है अर्थात
एक दूसरे के स्थान में हैँ । यहाँ लग्नेश
सूर्यं और त्रिकोणेश गुरु है। इनका
सम्बन्ध अच्छा हूँ ।
इसी भ्रकार सप्तमेश शनि और नवमेश मंगळ का परिवर्तन योग है ( एक दूसरे के
स्थान में हूँ ) यद्यपि यह परिवर्तन अशुभ ग्रहों का अच्छा नहीं होता परन्तु त्रिकोणेश
और केन्द्रेश का परिवर्तन होने से अच्छा है 1 ये परस्पर स्थान के सम्बन्ध हुए ।
दूसरा प्रकार--जब एक से सम्बन्ध हो दूसरे से सम्बन्ध न हो । जैसे चतुर्थेश मंगल
केन्द्र ( सप्तम ) में है, सप्तमेश शनि नवम में है। परन्तु सप्तमेश शनि या सप्तमस्थ
ग्रह मंगल का चतुर्थ स्थित ग्रह बुध से कोई सम्बन्ध नहीं 1 यहाँ केन्द्र-स्वामी मंगल
पाप ग्रह होने से अच्छा है वह केन्द्र (सप्तम) में हो हैं 1
यहाँ चतुर्थेश सप्तम सप्तमेश नवम है । इसी प्रकार एक दुसरे से स्थान के बिचार
से और भी परस्पर सम्बन्ध हो सकते हैं जैसे घनेश नवम भाव में हो नवमेश लाभभाव में
हो और लाभेश धन भाव में हो तो माळा योग हो जाता है । यह एक प्रकार का राजयोग है 1 इसमें एक दूसरे भाव से परस्पर सम्बन्ध स्थापित हो गया ।
इस स्थान का सम्बन्ध वर्षे कुंडली के विचार से भी होता है जिससे ग्रह के प्रभाव
में अन्तर पड़ जाता है। जैसे कोई उच्च का ग्रह नीच नवांश में या नीच का ग्रह
उच्च नवांश के विचार से फल में अन्तर पड़ जायगा ।