भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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१७४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

नवांश के विचार से भाव स्वामियो के सम्बन्ध की कड़ी स्थापित होती हैं जैसे लग्न

चर हो उसका नवांश स्वामी भी चर हो तो राजयोग हो जाता है । और लग्नेश की

राशि का नवांशेश जो हो उसकी राशि का नवांशेशबली हो तो राजयोग हो जाता है,

इसी प्रकार के अनेक योगों का विचार आगे मिलेगा ।

(३) क्षेत्र अर्थात्‌ मैत्री द्वारा सम्बन्ध--लग्न में गुरु अपने मित्र सूर्यं के क्षेत्र में है,

अपने समक्षेत्री राहु से युक्त है। लग्नेश सूर्य अपने मित्र गुरु के क्षेत्र में है और यह पंच￾मेश गुरु लग्न में है । गुरु पर सप्तम स्थानीय मंगल को पूर्ण दृष्टि है, जो उसका मित्र

है । इसो प्रकार साथी या दूसरा ग्रह या उस भाव के स्वामी से भाव स्थित ग्रह की मैत्री

नैसगिक एवं पंचधा मैत्री से भी विचारना पड़ता है, यह मैत्री सम्बन्ध नवांश आदि वर्ग

कु.डलियों में भी विचार किया जाता हैं 1

(४) दृष्टि द्वारा सम्बन्ध-यहां छग्न सिंह एवं वहाँ स्थित गुरु पर मंगल की पूर्ण

दृष्टि हे ओर गुरुको मंगल पर पूर्ण दृष्टि है, यहाँ परस्पर दृष्टि का सम्बन्ध हुआ 1 इसी

प्रकार ददामस्थ चंद्र और चतुर्थ बुध की भी परस्पर दृष्टि है। शनि और शुक्र की भी

परस्पर दृष्टि है इस प्रकार परस्पर दृष्टि का सम्बन्ध है ।

सँगेल की चंद्र पर पुर्ण दृष्टि है परन्तु चंद्र की दृष्टि मंगल पर नहीं है । गुरु की सूर्य

पर पूर्ण दृष्टि है परन्तु सूर्य को दृष्टि गुरुपर नहीं है। इस प्रकार एक ओर दृष्टि

सम्बन्ध हुआ । इस प्रकार विचारना कि एक ओर दृष्टि सम्बन्ध या परस्पर दृष्टि का

सम्बन्ध है ।

ग्रहों का सम्बन्ध उपरोक्त प्रकार से विचार कर देखें।

(१) विचारणोय ग्रह जहाँ हों उससे सम्बन्ध करने वाले कहाँ-कहाँ पर हैं जैसे लग्न

में गुरु है तो गुरु से सम्बन्ध करने वाले ग्रह कहाँ-कहाँ हैं उपरोक्त चारों प्रकार से उसका

सम्बन्ध विचारना ।

(२) यह ग्रह किस-किस भाव का स्वामी है उस-उस भाव से सम्बन्ध रखने वाले

ग्रह-किस-किस भाव में हूँ । जैसे गुर का विचार करना है । यह पंचम और अष्टम भाव

का स्वामी है जहाँ उसका स्वगृह ९ और १२ राशि है। अब वहाँ देखना है कि पंचम

झौर अष्टम भाव से सम्बन्ध रखनेवाले ग्रह किस भाव के स्वामी हैं और किन ग्रहों का

सम्बन्ध इन भावों से है ।

  • (३) वह ग्रह जहाँ है उस राशि का स्वामी ग्रह किस राशि में है उस ग्रह और उस

` राशि से किस-किस ग्रह का सम्वन्ध है। जैपे गुरु सिह में हैं उसका स्वामी सूर्य है जो

पंचम स्थान (त्रिकोण) में घन राशि का है । अब यहाँ देखना है कि घन राशि से सम्वन्ध

रखनेबाले ग्रह, राशि स्वामी आदि कहाँ पर हैं । उनका कैसा सम्बन्ध है। एवं सूर्य से

सम्बन्ध रखनेवाले ग्रह कहाँ-कहाँ पर हैं । 4

इस प्रकार उपरोक्त बताये चारों प्रकार से सब प्रकार से सम्बन्ध का फळ कुण्डली,

चन्द्र कुंडली, नवांश कुंडली आदि में जैसी आवदयकता हो पुरा विचार आवश्यक है ।