सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 191, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंफल का स्थूल विचार : १७५
ये सम्बन्ध ३ प्रकार के होते हैं । कोई सम्बन्ध अच्छे होते हैं, कोई बुरे होते हैँ और कहीं अच्छे बुरे का मिश्रण होता है ये मिश्र कहलाते ë । अच्छे ग्रह--उच्च, मूलत्रिकोण या स्वगृही ग्रह, केन्द्र या त्रिकोण से शुभ सम्बन्ध रखने वाला ग्रह । शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट ग्रह । मित्र ग्रह युक्त या दृष्ट ग्रह । शुभ वगं में ग्रह शुभ ग्रहों के बीच ग्रह, शुभ ग्रह वक्री इत्यादि । बुरे ग्रह--नीच या दात्रुगृही ग्रह, ६-८-१२ भाव में ग्रह या इनके स्वामियों से सम्बन्ध रखनेवाले ग्रह, अशुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट ग्रह, शत्रु ग्रह से युक्त या दृष्ट ग्रह, अशुभ वर्ग में ग्रह, अस्तंगत ग्रह, दो पाप ग्रहों के:बीच ग्रह, पाप ग्रह वक्री इत्यादि । योग कारक
कई स्थानों में आता है कि अमुक परिस्थिति में ग्रह आने से योगकारक हो जाता है। मारक योग के विषय में पहिले बतला चुके हैं फिर भी यहाँ योग कारक के सम्बन्ध से बतलाते है ।
ग्रहों के सम्बन्ध से जो अच्छे योग बनते हैँ Q योग कारक हैँ ग्रहों के सम्बन्ध से त्रिकोण, केन्द्र, निषडाय, षडष्टक, alas आदि अनेक प्रकार के अच्छे और बुरे योग बनते हैं इनमें शुभयोग कारक इस प्रकार हो सकते हैँ ।
(१) केन्द्रेश त्रिकोण में और त्रिकोणेश केन्द्र में हो या दोनों एक साथ केन्द्र या घ्रिकोण हों में तो योगकारक हुआ । `
(२) पंचमेश और नवमेश इनमें से किसी का दशमेश से सम्बन्ध हो जाना अच्छा योग होता है ।
(३) यह सम्बन्ध केन्द्र स्वामियो में से किसका सबसे उत्तम होता है वह इस प्रकार हुँ--चदुर्थेंश से अधिक बली सप्तमेश और सप्तमेश से दशमेश सबसे अधिक बली है और त्रिकोण में लग्नेश से पंचमेश अधिक बली है पंचमेश से नवमेश अधिक बली है ।
(३) एक ही कोई ग्रह यदि कोण और केन्द्र दोनों का स्वामी हो तब भी योगकारक हो जाता है। इस पर यदि उसका दूसरे त्रिकोण से मी सम्बन्ध हो जाय तो अत्यन्त श्रेष्ठ है ।
(५) यदि केन्द्रेश और पंचमेश भी हो तो योगकारक हो जाता है यदि नवमेदा से
भी सम्बन्ध हो जाय तो श्रेष्ठ योगकारक हो जाता है 1
. (६) यदि केन्द्र में राहु-केतु भी हों और त्रिकोण से सम्बन्ध हो जाये या त्रिकोण में
होकर केन्द्र से सम्बन्ध हो जाये तो शुभयोग कारक हो जाता है ।
(७) त्रिषडाय आदि अशुभ स्थान के स्वामी होने से सम्बन्ध भंग हो जाता है ।
परन्तु केन्द्रेश और त्रिकोणेश यदि त्रिषडाय आदि स्थान के स्वामी भी होने से सम्बन्ध हो जाय उस परिस्थिति में यदि वे उच्चस्थान में हों या अन्य शुभयोग भी हों तो यह योग भंग नहीं होता ।
(८) यदि अष्टमेश नवमेश भी हो या लामेश दशमेश भी हो तो इनके सम्बन्ध मात्र