भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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१७६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

से शुभयोग का लाभ प्राप्त नहों हो सकता । अर्थात्‌ केन्द्रेश और योगेश का सम्बन्ध नीच आदि स्थानगत दोष युक्त होने पर भी सम्बन्ध मात्र से योगकारक कहा है परन्तु लाभ￾जनक नहीं है ।

(९) योग के लाभ और भंग में उसके स्थान की प्रबलता के विचार से योग की

अल्पता या प्रबलता पर विचार करना ।

(१०) राजयोग कारक ग्रह शुभ या अशुभ दोनों प्रकार के स्थान के स्वामी हों निकेश न हों और न त्रिकभाव से कोई सम्बन्ध हो तो अशुभ घर के अनिष्ट फल को दबा देता है l

फल विचारते समय इन बातों पर भी ध्यान देना (१) समाज. स्थिति और आयु के अनुसार फल कहना । (२) देश काल और वतंमान एवं पात्र पर भी ध्यान देते हुए फल कहना ।

(३) कुण्डली का शुभाशुभ फल जानने में इस प्रकार विचारें कि वह ग्रह शुभ या पाप फल किस प्रमाण में देगा ।

प्रहका उच्च मूलत्रिकोण स्वगृही भित्रगृही शात्रगृही अस्त और नीच शुभफल पूर्ण ३ š š ४ से कम ( कुछ नहों ) ग्रह का अस्तंगत या नीच शत्रुगृही मित्रगृही स्वगृही त्रिकोण उच्च में पापफल पूणं पापफल=१ दै ई ` ॐ ४ से कम (कुछ नही) (४ ) ग्रह के रूप स्वभाव आदि भाव सम्बन्ध से दिचारना । ग्रह का गुण धर्म आदि पर भो पूरा विचार करना ।

भावफल देखने को भाव चक्र बनाकर लग्न से १२ राशि तक में दक्षिण बाम अंग का विचार करना जैसा कि राशिचक्र के.२ भाग करने से प्रकट होगा । भावचक्र में ग्रह स्थापित कर फिर शुभाशुभ फल का विचार करना कालपुरुष के अंग में लग्न से ६ भाव तक दाहिना अंग, ७ से १२ भाव तक बाँयां अंग ë! प्रत्येक भाव में भी दाहिने बाँये अंग का विचार होता है। १ से १५० तक्र दाहिना अंग पश्चात्‌ बायां अंग समझना |

( ६) लर्न राशि भावेश, भावकारक आदि का विचार कर ग्रह का स्थान दृष्टि आदि द्वारा सम्बन्ध और बल आदि पर पूर्ण विचार कर नाना प्रकार की वर्ग कुण्डलिग्राँ, अष्टक वर्ग आदि के चक्र पर से भी विचार कर फल कहना । (७ ) इनके अतिरिक्त ग्रह-मैत्री, ग्रहों की दीप्तादि अवस्था, ग्रह की बाल-वृद्धादि, आयु, ग्रहों की १० अवस्था, ग्रहों का घर आदि तथा ग्रह रश्मि पर भी विचार कर फल कहना । साथ ही साथ गुलिक एवं अप्रकाश आदि ग्रहों की स्थिति पर भी विचार करना । (८ ) लर्न कुण्डली, चन्द्र कुण्डली, सूर्य कुण्डली से भी विचार कर कारक ग्रह से भी विचारना ।

( ९ ) ग्रह फल कैसे देता है, उसे फळ देने का कौन साधन है, उसे अधिकार कौन