सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 170, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ें१५४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
४३--शुभ राशिवाले भाव के स्वामी उन भावों में हों और वे पापयुक्त या दृष्ट
न हों तो उस भाव की वृद्धि होती है ।
४४--कोई ws पापग्रह और शुभ ग्रह दोनों से युक्त या दृष्ट हो या उस भाव
में शुभ और पापग्रह दोनों हों या उनकी दृष्टि हो तो मिश्रफल होगा ।
४५--कोई भावेदा शुभग्रह युक्त या दृष्ट हो या वह भाव शुभयुक्त या दृष्ट होतो
उस भाव का शुभफल होता है ।
४६--किसी भाव में शुभग्रह हो या शुभस्थान के स्वामी से युक्त या दृष्ट यह भाव
हो यदि उस भाव में दुष्टग्रह या दुष्टमावेश युक्त या दृष्टि न हो तो वह भाव अच्छा फल
देता है । यदि वह भाव बुरा धर है तो भी अच्छे ग्रहों के प्रमाव से अच्छा हो जाता है ।
४७--शुभ ग्रह जैसे शुभ या अशुभ स्थान में हो उसके शुभ या अशुभ फल को
बढ़ाते हैं और अशुभ ग्रह अच्छे या बुरे दोनों प्रकार के फलों को घटाते हैँ । इसलिये
शुभग्रह शुभ स्थान मे अतिशुभ और अशुभ ग्रह अशुभ स्थान में हो तो अशुभ फछ को
कम करने के कारण अच्छे होते हैं तथा शुभ घर में बैठकर उसके शुभ प्रभाव को घटाने
के कारण हानिकारक हैं ।
४८--म्रह जिस भाव को देखता है उसके बल को बढ़ाता हुँ । विशेषकर जब किसी
भाव का स्वामी होकर उस भाव पर दृष्टि डाळे तो उत्तम हे ।
४९--कोई भावेश अपने मिन्रस्थान, स्वगृह, मूलत्रिकोण या उच्च में हो तो अच्छा
फल देता है । यदि शत्रु स्थान या नीचगृही हो तो बुरा फल देता ë!
५०--भावेश उच्च स्थान में हो और नवांश में नोच स्थान में भा जावे तो उस
भाव का फल लाभजनक नहीं होगा । यह शीघ्र नीच फल देता है ।
५१--किसी भाव का स्वामी नीच में हो परन्तु नवांश में उच्च का हो जाये तो
उस भाव का फल अच्छा होगा ।
५२--प्रह केन्द्र, त्रिकोण व लाभ में वली होकर शुभ फल देते हैं ।
५३--शुभ ग्रह केन्द्र, त्रिकोण और लग्न में आयु बढ़ाते हैं ।
५४-केन्द्र और त्रिकोण के स्वामियों से शुभ सम्बन्ध करने वाला ग्रह शुभ
होता है ।
५५--ग्रह जो ३, ६, ११, २, ७, ८ भाव के स्वामी न हों शुभ होते हैं 1
५६--प्रह जो १, ४, १०, ११ भाव में हो और जिसे हषंबल प्राप्त हुआ हो शुभ
होता है।
५७--भावेश अस्तंगत या नीच का हो तो केन्द्र, त्रिकोण में रहने पर भी शुभ फल
नहीं देता परन्तु अडचन और कष्ट के उपरांत फल देता है ।
५८--भावेश अनिष्टकारी होने पर भावस्थित ग्रह उतना उपकारी नहीं होता क्यों -
कि भावस्थित ग्रह तो उसका किरायेदार के समान है असलो उस भाव का मालिक तो
भावेश ही है । इससे भाव में वैसा शुभग्रह उस भाव को बाहरी चमक अवश्य देता है;