सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 168, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ें१५२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
५--भाव में मिश्चित ग्रह=मिश्रफल ( अच्छा और बुरा मिला हुआ फल /।
६--पापग्रह यदि मित्रराशि में या उच्च मेंच्शुभ फल ।
७--शुभग्रह यदि शत्रु राशि में, नोचराशि में या अस्त gl=m< फल
s: डी ग्रह नीच या शत्रु गृही पाप युवत या अस्त हो-्हानिकारक है, वुरा फल
1 है ।
९--कोई ग्रह दृष्ट स्थान में. हो था शत्रू गृही या नीच नवांशक में होम्त्अयुभ फल ।
१०--पापग्रह भी मूलत्रिकोण उच्च या मित्रगृही हो तो-भाव शुभ फल देता है,
उस भाव की वृद्धि करता है ।
११--पापग्रह भो जब केन्द्र, त्रिकोण जैसे अच्छे घर में होंच्ञच्छा फल देते हैं ।
१२--पापग्रह भी योगकारक ग्रह (उन्नति करनेवाले ग्रह) से सम्बन्ध हों तो अच्छा
फल देते हैं ।
१३--अच्छे या बुरे भाव किसी ग्रह से युक्त या दृष्ट न हों तो मध्यम फल देते हैं ।
१४--जो भाव शुभग्रह से युक्त या दुष्ट हों या पापग्रह युषत या दुष्ट न हो तो
शुभ फल देते हैँ ।
१५--भाव में नीच या शत्र क्षेत्री या अस्त ग्रह हो तो भाव फल निष्फल ।
१६--मिन्रक्षेत्री स्त्रक्षेत्री या उच्च या मूलत्रिकोण का ग्र हर् # वृद्धि करता ë!
स्त्रक्षेत्री, मित्रक्षेत्री, अधिमित्रक्षेत्री या उच्च का ग्रहन्शुभ दायक है 1
१७--कोई ग्रह स्व या उच्च का हो और उसी समय मित्रग्रह से युक्त या दृष्ट हो
तो घन युक्त राजा सरीखा पद देता है ।
¿—q अपने उच्च या मित्र के नवांश या राशि में शुभग्रह से दृष्ट हो तो शुभ
फल देता है ।
१९--ग्रह उच्च का हो ती इष्टबल देता है, परन्तु परमोच्च हो तो उस भाव का
उत्तम फल देता है, मूलत्रिकोण का उससे मध्यम फल देता है ।
मूलच्रिकोण ग्रह उच्च से अधिकार में कम है परन्तु यह अपने अधिकार में उत्तम
फल देता है उच्च के बराबर ही बलवान् होता ë ।
२०--उच्च, मित्र या बली ग्रह से युक्त या दृष्टग्रहःशुभ होता ë |
२१--स्वक्षेत्री उच्च या शुभवर्ग का ग्रह भाव को पृष्ट करता है !
२२--ग्रह समक्षेत्री हो तो सम फल देता ë ।
२३--स्वक्षेत्री, उच्च, मित्रक्षेत्री ग्रह पडबल में बलवान भी हो तो भी यदि
संधि में हो तो भाव का पूर्ण फल नहीं देता ।
२४--सुयं से उदय ग्रह यदि वक्री होकर निमंल कान्ति हो तो अच्छा फल देता ë ।
जळ तारा ( मंगल, बुघ, गुरु, शुक्र, शनि) यदि वक्री हो तो साधारण
अशुभ
२६--जिन ग्रहों के २ स्वस्थान ë उनमें जो उसका मूलत्रिकोण हो उसका प्रभाव
रहेगा उसी का फल जान पड़ेगा ।