भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 418 में से

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१८२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

प्रकार से सब भावों का शुभ सम्बन्ध होने का फल उस शुभग्रह की दशा में प्रगट होगा ।

४--इसी प्रकार अशुभ ग्रह अपनी दशा में अनिष्ट फल देते हुँ ।

५--२, ७ भाव के स्वामी मारकेश होते ë । उनकी दशा अन्तर्दशा में अल्पायु,

दीर्घायु आदि के विचार से उस समय के आने पर मृत्यु होती है । यदि मृत्युभंग योग हो

तो मृत्यु नहीं होती परन्तु मृत्यु तुल्य कष्ट होगा । किसी ग्रह के कारण कुछ जीवन प्राप्त

हो जाता है तो मरने नहीं पाता परन्तु नई प्रकार के क्लेश घनहानि आदि होते हैं ।

६--मा रकेश का अनिष्ट फल महादशा में होता है । अन्य अशुभग्रह का बुरा प्रभाव

अन्तर्दशा में होता है ।

७--मारकेश या किसी अशुभग्रह फी दशा हो उसमें केन्द्र या त्रिकोण के स्वामी का

अन्तर हो परन्तु किसी भी ग्रह से दृष्टि स्थान आदि के विचार से शुभ सम्बन्ध न हो तो

अनिष्ट फल होता है ।

८--यदि केन्द्र या त्रिकोण के किसी स्वामी की दशा हो उसमें मारकेश का अन्तर

हो तो बहुत अशुभफल होता है ।

९--मारकेश की महादशा में शुभग्रह का अन्तर हो तो मरण तो नहीं होता परन्तु

संकट टल कर मरण तुल्य कष्ट होता है।

१०--मारकेश की महादशा में किसी अंशुभग्रह का अन्तर हो तो शुभग्रह सम्बन्ध

होने पर भी मृत्यु होती है 1

११--मारकेश या किसी अन्य अशुभग्रह की महादशा हो उसमें राजयोग कारक

ग्रह का अंतर हो ओर उनके बीच सम्बन्ध न हो तो अशुभ परिणाम होता है छाम के

बदले हानि होती है ।

१२--केन्द्र के स्वामी की दशा में त्रिकोण के स्वामी का अंतर हो और उसमें कोई

शुभ सम्बन्ध हो तो शुभफल होता है । शुभ सम्बन्ध न होने से अशुभ फल होता है ।

१३--ये ग्रह अपनी दशा में किसी भाव के फल को नष्ट कर देते हैं :--

(भ) किसी भाव से गिनने पर अष्टम स्थान का स्वामी ।

(ब) किसी भाव से गिनने पर २२ वें द्रेष्काण ( खर द्रेष्काण ) का स्वामी ।

(स) किसो भाव से गिनने पर ६, ७, ८ घर में, ३, ४ या ५ ग्रह वलहोन हों ।

१४--उस भाव से गिनने पर त्रिकोण में शुभग्रह हों ३, ६ ११ घर में पापग्रह हों

ओर जो उस भावेश के मित्र ग्रह हों, यदि वे बलवान हो तो अपनी दक्षा में सफलता

लाते हैं ।

१५- शुक्र शनि परस्पर मित्र हूँ इससे शुक्र में शनि का अंतर शुभ है शुक्र के

सदृश फल देगा।

`= शनि में शुक्र का अंतर हो तो शुक्र अपना अंतर छोड़कर शनि का प्रभाव ग्रहण कर

Të ।

१६- राजयोग कारक शुभग्रह का फल विशोत्तरीदशा में होता है ।

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