भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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१८८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

रोग, अवनति, असफलता, विपत्ति, अरिष्ट, राजदण्ड, दुर्भाग्य आदि अनेक प्रकार के बुरे

फल ग्रह की स्थिति के अनुसार भाव सम्बन्ध से विचारना ।

(१७) दुष्य अदुद्य चक्र--आकाश में जो भाव दिखता है वह दृश्य चक्र या खंड

है । जो नहीं दिखता वह अदृश्य चक्र या खंड है । दिन रात में आधा ही आकाश दिखता

है । पूर्व से पश्चिम का सदा १८० अंश का भाग सदा दिखता ë 1

दृद्यचक्र--६ राशियां, लग्न, (२, ११, १०, ९, ८, ७, भाव लग्न के भोग्यांश

सप्तम के भुवतांदा तक का भाग ।

अदृश्यचक्र- ६ राथियाँ सप्तम के मोग्यांश से लेकर ६, ५, ४, ३, २, भाव और

लग्न के भुक्‍तांश तक ।

मानलो बृष लग्न के २१° मुक्त हो चुके हैं जो अदृश्य भाग में है इसके आगे दृश्य

के शेष ९ भोग्यांश दृष्य भाग में हैं इसके आगे १२, ११, १०, ९, और ८ भाव पुरे

और सप्तम भाव में वृष्चिक राशि के २१० हूँ वे पूरे २२ मुक्तांश दृश्य भाग में हुए ।

शेष अर्थात्‌ सप्तम के ९ भोग्यांश और ६, ५, ४, ३, और २ भाव पुरे और लग्न

वृष के २१ भुकतांश मिलाकर अदृश्य खण्ड हुआ ।

(१८) चक्र खंड--लग्न के ६ भाव तक पूर्वार्ड आगे ७ से १२ भाव तक (उत्तराद्ध)

पश्चिम भाग है।

झन्यमत--दशम के भोग्यांश से चतुर्थ के भुक्तांश तक = पूर्वादध है। चतुर्थं के

भोग्यांश से दशम के मुक्तांश तक = पदिचिमाद्ध' ë ।

(१९) चक्र संधि--इनकी सन्धि को एक-एक घड़ी-- एट

. मीन-मेष कर्के-सिह वृश्चिकघन (इन्हें ऋक्‌ सन्थिया छ

१ घड़ी १ घड़ी १ घडी सन्धि भी कहते हैं । )

भसन्धि (ऋक्‌ सन्धि) ४-८-१२ राशि की ।

(२०) गंडांत ३ प्रकार का ë!

(१) राशि संधि (२) लग्न संधि (३) नक्षत्र सन्धि ।

नक्षत्र संघि--इन नक्षत्रों के संधि की २-२ घडी ।

रेवती-अक्विनी आाइ्लेषा-मघा उयेष्ठा-मूल ।

३ घडी ३ घड़ी ३ घड़ी ।

(२१) परिवर्तन योग्य अन्योन्याश्रय योग--जब किसी एक भाव का स्वामी अन्य

माव नें हो और उस भाव का स्वामी पहिले बताये भाव में हो अर्थात्‌ रे के घर

में किसी भी भाव में हो । eR

(२२) मालाधय योग--जब एक भाव का भावेश दूसरे अन्य भाव में उसका भावेश

किसी और भाव में हों और उसका भावेश लग्न आदि पहिले भाव से सम्बन्धित हो तो

योग को माळा सी बन जाती है । जैसे लग्नेश चतुथं में हो, चतुर्थे पंचम में हो, पंच￾मेश नवम मे हो नवमेश दशम हो, दशमेश लाभ या लग्न में हो-ऐसे माला योग में

जन्मा मनुष्य बहुत भाग्यवान्‌ होता है ।