सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 232, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ें२१६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
मातृघाती--चन्द्र से त्रिकोण में शनि हो और रात्रिका जन्म हो तो माता का
बघ करे। सूर्य मंगल शनि राहु या केतु युक्त, नीच ग्रह से दुष्ट या युक्त हो तो माता
का वघ करे ।
माता को कष्ट--यदि ४-७ भाव में पापग्रह हो तो माता के कलह से कष्ट होवे ।
माता के दूध से ३ माह तक, पीछे पिता और भाई द्वारा पालित--जन्म समय सूर्य
ओर चन्द्र एक भाव में एक ही नवांश में हों ।
माता से त्यकत--शनि मंगल कहो एक राशि में हों उससे सप्तम या त्रिकोण में चन्द्र
हो तो बालक को माता त्याग देवे । सूर्यं मंगल एक राशि में हों उससे सप्तम पंचम या
नवम में चन्द्र हो तो बालक माता से अलग हो जाता ë ।
त्थवत बालक दीर्घजीवी--एऐसे योग में गुरु चन्द्र को देखे तो वह त्यक्त बालक दीर्घ
जीवी होता है ।
त्यक्त बालक मरे--उक्त योग में पापग्नहों से युत व दुष्ट हो तो त्यक्त बालक मरे |
लग्न में चन्द्र हो पापग्रह ( सूर्य शनि) देखे, सप्तम में मंगल हो । चन्द्र ऊर्न में हो
जिस पर सूयं की दृष्टि हो मंगल और शनि ११वें स्थान में हों। या शनि और मंगल
से १, ११, ७ भावों में किसी भाव. में पाप युक्त चन्द्र हो तो त्यवत वालक मरे ।
त्यक्त दूसरे के हाय लगे--यदि उक्त चन्द्र पर शुभग्रह को दृष्टि हो तो जिस ग्रह की
दृष्टि हो उसके समान जात वाले मनुष्य के हाथ में वह बालक जावे और वह दीर्घायु होवे ।
दूसरे के हाथ लगने पर भी मरे--उक्त चन्द्र पर शुभग्रह की और पाप;ह की भी
दृष्टि हो तो त्यक्त बालक दूसरे के हाथ लग जाने पर भी मर जावे । - अन्य मत से उक्त
चन्द्र पर पाप दृष्टि हो तब भो उपरोक्त फल हो ।
जारज योग ( अन्य से उत्पन्न )
१--षष्ठेश का नवांशेश चतुर्थेश युक्त पापदृष्ट हो ।
२--चतुथ भाव पापग्रहों के बीच, चतुर्थेश या मातृक्रारक चन्द्र पाप दृष्ट हो नवमेश से लग्नेश बलहीन हो ।
३--लग्न या चन्द्र पर गुरु की दृष्टि न हो या गुरु नवांश में ये न हों या सूर्य चन्द्र
साथ हो गुरु की दृष्टि न हो ।
४--सूयं चन्द्र पापग्रह युक्त हों या सूर्य या चन्द्र के साथ राहु केतु हों ।
५--नवम और चतुर्थ में पापग्रह हो लग्नेश पाप युक्त बलहोन हो चतुर्थ घर में
ओर कोई दूसरा नवांश हो या शत्रु का नवांश हो ।
६--६, १, ४, ९ के स्वामी एक साथ कहों मी हों ।
अन्यमत--१, ४, ९ के स्वामी एक भाव में, या १, ३, ४, ७ के भावेश एक साथ ।
७-जजतुर्थश षष्ठेश युक्त नवम में हों ।
चतुर्थ में चतुर्थश भाग्येश दोनों हों ।
९--छन में चन्द्र गुरु की दृष्टि या गुरु के राव्यादि वर्ग से रहित हो ।