सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 242, कुल 418 में से
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२२६ : ज्योतिष-शिक्षा, ततीय फित खण्ड
पुत्र का मुह देखना
पुत्र होने पर यदि मूल आदि का निषेध न हो तो पिता को शीघ्र ही बालक का मुख
देखना चाहिये । पुत्र का मुंह देखते ही पितरों के ऋण से छूट जाता है ।
गंडांत विचार
गंड--राशि चक्र में किसी राशि के अंत होने के साथ-साथ उसके अंतर्गत नक्षत्र के
चरण का भो अंत हो जाता है ऐसी संधि को गंड कहते हँ । जैसे-- i
( १ ) पहिला गंड--संघ्या गंड---मीन का अंत और मेष के आरम्भ की सन्धि ।
(२) दुसरा गंड--रात्रि गंड--कर्क राशि के इलेषा के अन्त पर और सिंह रादि
के,मघा नक्षत्र प्रारम्भ की सन्धि ।
(३) तीसरा गंड--दिवा गंड--वृश्चिक राशि के ज्येष्ठा नक्षत्र और धन राशि
के मूल नक्षत्र के आरम्भ होने की संधि ।
ये गंडांत ३ प्रकार के हैं जो अशुभ माने जाते हूँ
( १ ) राशि गंडांत। ( २) लग्न गंडांत। ( ३ ) नक्षत्र गंडांत ।
(१) लग्न गंडांत या ( २ ) राशि गंडांत--जैसा ऊपर .बताया है १-मीन-मेष
की संधि । २-कर्क-सिह की संधि। ३-वृश्चिक-घन की सन्धि 1
सन्धि के प्रत्येक लग्न की आवी-आघी घड़ी बालक को घातक है । अर्थात् मीन, ककं
च वृश्चिक लग्नो के अन्त को आधी घडी और मेष, सिंह व घन लग्तो के आदि की आघो-
आघी घड़ी घातक है ।
( ३) नक्षत्र गंडांत (मूल)--१-रेवती के अंत को २ घड़ी, अश्विनी के आदि की
२ घड़ी घातक है । २-इलेषा के अंत की २ घड़ी मघा के आदि की २ घड़ी घातक है ।
३-ज्येष्ठा के अंत की २ घड़ी मूल के आदि की २ घड़ी घातक है ।
अभृक्त मल-(१) ज्येष्ठा के अंत की १ घडी मूळ के आदि की १ घड़ी में होता है ।
अन्यमत से--२-२ घड़ी अर्थात् सन्धि की ४ घड़ी का अभुक्त मूल है 1
अन्यमत--मूल, मघा ओर अश्विनी की आदि को ३-३ घड़ी ज्येष्ठा, इलेषा और
रेवती के अंत की ५ घड़ी लेते हैं । इसमें पिता ८ वर्ष तक वाळक का मुख न. देखे
इसकी शान्ति करावे ।
(२) फल--मूछ में उत्पन्न बालक का फल आगे दिया है । कहा है अभुक्त मूल में
उत्पन्न पुत्र, कन्या, पशु, सेवक, कुल का नाश करते हैँ यदि जीवे तो वंश का कर्ता हो,
श्रीमान हो ।
(३), तिथि गंडांत--नंदा तिथि ( १-६-११) के आदि की एक-एक घडी ।
पूर्णा तिथि ( १५-५-१० ) के अंत की एक-एक घड़ी । अर्थात् पूणिमा के अन्त की और प्रतिपदा के आदि को संघि की १-१ घड़ी । 8 = पंचमो के अंत को और षष्ठी के आदि की संधि की १-१ घड़ो।
दशमी के अंत को थोर एकादशी के आदि की संधि की १-१ घड़ी। `