भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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युगसंवत्सरादिफलाध्याय : २३७०

(१८) तारण--धृतं, शूर वीर, ` चपल; कलाविद्‌, कठोर चित्त, निदित काम करनेवाला, घनो, लोकप्रिय, राजद्वार से घन पानेवाला, सब घर्म बहिष्कृत, विवेकी ।

(१९) पाथिव--स्वघम कर्म में तत्पर, कला और शास्त्रों का ज्ञाता, सुखी, विलासी,

धर्मात्मा, श्रीमान्‌ ।

(२०) व्यय-कामी, डरपोक, पापी, शील, घन गुणरहित, अनेक मित्र, भोगो,

'कजंमंद, खर्चीछा, अस्थिर चित्त, सब में प्रधान, निर्भय ।

(२१) सवंजित--वाचाल,; बलवान्‌, गुणी, -तत्ववेत्ता, शास्त्रों, पुण्य कर्मी, राजा

से वेभव प्राप्त, पवित्र मोटो देह, शत्रुजित, उत्सव्‌ युक्त ।

(२२) सरवंघारी--राजम्रिय, माता-पिता को प्रिय, गुरुभक्त, शूरवीर, शांत प्रकृति,

प्रतापो, धीर, गुगवान, योगी, मिष्ठान्न प्रिय, बहुत सेवक हों ।

(२३) विरोधी--बड़ा बोळनेवाला, परदेश भ्रमण, कुटुम्ब एवं सौख्य युक्त, धूर्त,

मित्र रहित, मांस मत्स्य भक्षक, लोक पूज्य, निजघमं में प्रोति, पाप कमं करने वाला,

दुष्ट, शोक युक्‍त ।

(२४) विकृति--धनहीन, अभिमानी, सुन्दर बुद्धि, मित्र .रहित, नृत्य गान में

चतुर, दाता, भोगी, विचित्र वचनमाषी, मायावी, कामातुर, तंत्र-मंत्र विद्या का ज्ञाता 1

(२५) खर--कामातुर, मलिन देह, असार वाणी, कठार, लज्जा रहित, बलेश

युक्त, दोघं, कुटुम्ब के वोझ को उठाने में उत्साह, निर्मोही, निर्गुण, पापो, दीन वचन ।

(२६) नन्दन--तालाव वावली कुआ भादि बनाने में प्रेम, अन्नदान में प्रीत, सब

में प्रीत, कल्याण कमं कर्ता, राज्य में प्रतिष्ठा प्राप्त, राजा का प्रिय, आनन्द प्राप्त,

मंत्र के मर्थं का ज्ञाता ।

(२७) विजय--युद्ध में धीर, श्रेष्ठ शरीर, राजा से मान्यता प्राप्त, दाता, दयालु

श्रेष्ठ बोली, शत्रु नाशक, शुभ कमं करने वाला, कीतिवान, आयु यश'ओर सुख से युक्त),

घामिक सम्पत्ति युक्त, ' सत्यवक्ता ।

(२८) जय--शास्त्रार्थ प्रेमी, माननीय, शत्र, नाशक, पराक्रमी, विषयी, युद्ध में

जय, व्यापार करने वाला, राजा के सदृश । .

(२९) मन्मथ--विशेष आभूषण युक्त, मीठी वाणी, विलासी, कलाविद, गीत नृत्य

प्रिय, भोगी, कामी, बुद्धिमान, लोभी, घनी, निष्ठुर, बली, श्रु जित 1

(३०) दुमुख--क्रूर, दुष्ट बुद्धि, छोभी, शीलहीन, विकृत अंग, गुगहीन, विवादों,

कुरूप स्त्रियों से प्रेम, चतुर, परोपकारी ।

(३१) हेबिलम्ब या हेमलम्ब--धन, रत्न, वाहन, सेना आदि से युवत, पुत्र और

स्त्री का सुख प्राप्त, कृपण, दान न देने वाला, दुष्ट, कृषि आदि कमं में प्रेम, परन्तु

सर्वत्र पूजित ।

(३२) विलम्ब या विलम्बि--बडा घृतं, लोभी, आलसी, कफ प्रकृति, बलहीन,

व्याघि से दुःखो, कुटम्ब पालक, श्रीमान, विप्र जन का आश्रित, प्रारब्ध कार्यों में सदा

प्रलाप करने वाला ।