सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें7२३८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(३३) विकारी -मिथ्या हठ करनेवाला, कला में प्रवीण, चंचल बुडि, qq बहुत
"बोल्ने वाला, रवत विकार युक्त, पित्त प्रकृति, रक्तनेत्र, दरिद्री, वनवासी, डरपोक ।
(३४) शबंरी--व्यापार के काम में -चतुर, विलासी, मित्रों का विरोधो, अनेक
विद्याओं का प्रेमी, वेद शास्त्र प्रेमी, देव ब्राह्मण भक्त, मिष्ठान्न रस भोजी, आचारवान
घनवान ।
(३५) प्लव--कामी, धनवान, सेवा से आदर पाने वाला, चञ्चल स्वभाव, निद्रालु,
भोगी, लोक पूजित, शांत, उदार, पराक्रमी, दयालु घर्मात्मा व्यवसाय करनेवाला ।
(३६) शुभकृत--सोभाग्य, विद्या नम्रता युक्त, पुण्यवान, दीर्घायु, पुत्र और घन
से सुखी, शुभ कर्म कर्ता, यशस्वी, घर्मशीक, प्रतापी, प्रजापालक, पंडित, स्त्रीजनों
से वंचित ।
(३७) शोमन--ऊँचा शरीर, गुणी, दयावान, श्रेष्ठ कर्म, नम्र, प्रवीण, श्रेष्ठ नेत्र
शांत चित्त, श्रवोर दानी, ज्ञानी, विद्या का प्रेमी ।
(३८) क्रोधी--क्रूर दृष्टि, दुष्ट, अति अभिमानी, स्त्री को प्रिय, परकार्य को
बिगाइने वाला, क्रोधी, शरवोर, विज्ञान और औषधियों का संग्रह करने वाला या इनका
ज्ञाता, पर स्त्रो से प्रेम, राठ बुद्धि ।
(३९) विश्वावसु या विश्व--पुत्र और स्त्रो युक्त; उदार, भाचारवान, धयंवान
मिष्ठान्न प्रिय, गुणी, मनुष्यों में प्रधान, हास्य रस प्रिय, माननीय ।
(४) पराभव-_कठोर वचन, कितना ही संग्रह करे परन्तु घन धान्य रहित, धूर्त,
आचार विचार हीन, भय युक्त, शीत से भय, डरपोक, अधर्मी जीव, हिंसक, कुल
नाशक, दृष्ट आचरण ।
(४१) प्लवंग-चंचल चित्त, घृतं, आचार विचार रहित, कूर, चोर, योगा म्यासो
पृथ्वी पालक, कामो, मंद बुद्धि, श्रेष्ठ कायं में प्रवृत्ति नहीं करे ।
(४२) कीलक--प्रिय वाणी, दयाछु, जळ को बारम्बार इच्छा, स्थूल और श्रेष्ठ,
स्थिर, बलवान्, चित्रकार, अभिमानी, मातु पितृ भक्त, ब्राह्मण प्रिय, पराक्रमी, सुखी ।
(४३) सौम्य--पंडित, धनवान, भोगो, देव और अतिथि का प्रेमो, पवित्र, सात्विक
स्वभाव, दुर्बळ देह, शीलयुक्त, चतुर, प्रतापी, इन्द्रिय जित, शांत स्वभाव, सर्वं जन
प्रिय, धैयंवान । ` °
ओ- (४४) साधारण--क्रोधी,£ विवेकी, दृढ विश्वासी, अल्प संतोष, धमं कर्म में तत्पर,
मंत्र शास्त्र ज्ञाता, विफल बुद्धि, लेखन क्रिया में कुशल, इधर उघर घूमने वाला 1
(४५) विरोधीकृत--क्रोधी, विरोधी, पिता की आज्ञा का विरोधी, वांधवों से
विरोध, देव आराघन में तत्पर, क्षण में.सोम्य क्षण में होन. भ्रमण शील, दरिद्र, आशा
पर रहने वाला ।
(४६) परिघावी- विद्वान, शीलवान, कला में कुशल, श्रेष्ठ बुद्धि, राजा से मान्य,