सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 266, कुल 418 में से
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२५० : ज्योतिश-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
योनिफल
(१) अच्व- स्वेच्छाचारी, उत्तम गुण, शूरवीर, स्वामि भवत, घर-घर रवर वाला ।
(२) गज--राजमान्य, बलवान्, भोगी, उत्साही, राज का आभूषण ।
(३) पशु--स्त्रियों का प्रिय, सदा उत्साही, अल्पायु, बहु वाक्य विशारद ।
(४) सर्प-क्रोधी, सदा क्रूर, कृतघ्न, चपल, जीभ छोलुप (सब वस्तु पर
मन चले) ।
(५) इवान-उद्यमी, उत्साही, शूरवीर, माता-पिता का भक्त, स्वजाति से बिगाड़ ।
(६) मार्जार--स्वकाये में शूरवीर, चतुर, मिष्ठान्नभोजी, निर्दय, दुष्टो से प्रेम ।
(७) मेष--पराक्रमी, सवंकार्य में समर्थ, विभवशाली, परोपकारी ।
(८) मूषक--बु छिमानू, धन सम्पन्न, स्वकाय में सदा उद्यत, सदा सावधान, सबक,
विश्वास करने वाला, युद्ध करने वाला |
(९) सिह--अपने घमं में सच्चा, आचारवान्, उत्तमक्रिया, उत्तम गुण, कुरुस्व
उद्धारक ।
(१०) महिष--संग्राम विजयी, योद्धा, कामी, अनेक सन्तान, वात प्रकृति. मंदा
I
(११) व्याघ्-स्वेच्छाचारी, धन के उद्यम में विरत, उपदेशों का ग्रहणकर्ता,
दीक्षायुक्त, सदा समर्थ, आत्म स्तुति करने में तत्पर ।
(१२) मृग--स्वतन्त्रता पूवंक रहना, शांत प्रकृति, उत्तम बर्ताव, सत्यवक्ता, स्वजन
प्रेमी, धर्माचरण करने वाला, युद्ध में शुरवीर ।
(१३) वानर--चपछ, सिष्ठ पदार्थ भोजी, घन का लोभी, कलहप्रिय, शूरवीर,
कामी, अच्छी सन्तान ।
(१३) नकुल--परोपकार करने में प्रवीण घनियों में प्रधान, वड़ा चतुर, मातृ-
पितृ प्रेमी
जन्म लग्न फल
१. मेष--तेज मिजाज, अभिमानी, घनवान्, शुभाचरण, पराक्रमी, क्रोधी, सर्वभक्षी
गोल आँख, अशक्त घुटने, जल से डरे, सदा अपन पैर पर खड़ा, अल्पाहारी, मिथ्यावादी
अंग में चोट, मित्रों स॑ विरोध, अन्य से प्रेम, अल्पबुद्धि, शन्रुगणों से जीता हुआ, पित्त
प्रकृति, विलक्षण बुद्धि, बंधुओं का द्वेषी, भ्रमणशील, अस्थिर घन, विवाद प्रिय, अगम्या गमन की ओर झुकाव ।
बनचर है, ह्रस्व, लाल वर्ण, लाल नेत्र, भोजन में उष्ण पदार्थं प्रिय, शीघ्र प्रसन्न
हो, स्त्री प्रिय, दूसरे की नोकरी करे, बुरे नख, मस्तक पर बहुत फोड़े, हाथ में चिल्ल,
मति चंचळ ।
यह पृष्ठोदय है रात्रि में बलवान्, दिन को निर्बछ, क्रूर, पुरुष, चर, तेजस्वी, इसकी
पुर्वं दिशा हैं, स्वामी मंगल, दक्षिण दिशा तर्फ दुःख, यह लग्न दशम भाव में हो तो
केवल पूर्वाद्ध मे बहुत बलवान् होता Š ।