सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 30, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंtv: ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय-फलित खण्ड
(३) सहज--सहोत्य, दुश्चिक्य, गछ, उरस, दक्षिण कर्ण, सेना, धैर्य, साहस,
विक्रम, आतृ, पराक्रम, आपोक्लिम, उपचय, बाहु, तृतीय ।
(४) सुहृद- शौयं, कर्ण, सुख, अम्बु, रसातल, गेह, क्षेत्र, मातुल, भागिनेय, बन्धु,
मित्र, राज्य, गौ, महिष, सुगन्ध, वस्त्र, भूषण, हिबुक, सेतु, नदी, गृह, यान
केन्द्र, कंटक, चतुष्टय, चतुर्थ ।
(५) सुत--बुद्धि, प्रमाव, आत्मज, मंत्र, विवेक, शक्ति, उदर, राजांक, सचिव, कर,
आत्मन, घी, असु, जठर, श्रुति, स्मृति, प्रवेश, पुत्र, प्रतिमा, विद्या, तनय,
पाक स्थान, तनुज, प्रतिष्ठा, त्रिकोण, पणफर, पंचम ।
( ६ ) रिपु--रोग, क्षत, अरि, व्यसन, चोर-स्थान, विध्न, ऋण, अस्त्र, शत्रु, ज्ञाति,
आजि, दुष्कृत्य, अघ, भोति, अवज्ञा, द्वेष, वैरि, आपोव्लिम, उपचय,
त्रिक, षष्ठ ।
(७) जाया--चित्तोत्य, काम, मदन, कलत्र, दधि, सूप, यामिश, जामित्र, मद, अस्त,
दुन, अध्वन, लोक, मागं, भार्या, पति, स्मर, भर्ता, स्त्री, पत्नी, यून,
केन्द्र, कंटक, चतुष्टय, सप्तम ।
(८) मुत्पु-क्षीर, गुण, मूत्रकच्छ, गुह्य, <s, मांगल्य, मलिन, आधि, पराभव,
आयुष्य, क्लेश, अपवाद, मरण, अशुचि, विघ्न, दास, अंतक, आयु, छिद्र,
याम्य, निधन, ल्यस्थान, पणफर, त्रिक, अष्टम ।
{ ९ ) घर्म-दया, भाग्य, गुरु आचार्य, दैवत, पितु, शुभ पूर्णभाग्य, पैतृक, qq, mw,
मार्ग, आपोक्लिम, त्रिकोण, नवम । si
(१०) कर्म- आज्ञा, मान, आस्पद, ख, व्यापार, जय, सत, कीति, क्रतु, जीवन, ..
व्योम, आचार, गुण, प्रवृत्ति, गमन, मेषूरण, क्म्य, तात, नभ, गगन,
अम्बर, मध्य, राजा, राजपद, मानकमं, केन्द्र, कंटक, चतुष्टय, उपचय,
राज्य, दशम ।
(११) आप--छाम, आगमन, आप्ति, सिद्धि, विभव, प्राप्ति, भव, इलाघ्यता, ज्येष्ठ
आता या बहिन, वामकं, सरस, संतोषमाकर्णम, आगम, सर्वतोभद्र,
पणफर, उपचय, लब्धि, एकादश ।
(१२) व्यय _अंत्य, रिऽ, विनाश, लग्नांत, खंड, दुःख, अंध्रि, वामनयन, क्षय, सूचक,
दारिद्रध, पाप, शयन, रिःफ, बंध, रिष्फ, प्रान्त्य, अंतिम, आपोक्लिम,
त्रिक, द्वादश ।
केन्द्र आदि संज्ञा
लग्न से केन्द्र पपफर आपोक्लिम आदि गिनी जाती ë 1
( १ ) केन्द्र, कंटक, चतुष्टय या भव्र--१, ४, ७, १० भाव ।
{ २) उपचय या चय--३, ६, १०, ११, भाव ।
गे कहते हैं कि उपचय में से किसी भाव पर पापग्रह या शत्रु ग्रह को दृष्टि हो
तो उपचय संज्ञा नही रहती । वाराह मिहिर इसे नहों मानते 1