सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभिन्न-भिन्न राशि में ग्रहो का फल : २९१
सें कुशल, प्रिय वचन भाषी, चतुर, घोडा आदि वाहन युक्त (मान०) (जा०भ०) । मणि,
युत्र, घन, स्त्री, ऐश्वर्य, बुद्धि, सुख इनसे युक्त (qo जा०) 1
५-गुरु सिह का--पहाड़ किला कोट का स्वामी, अपनी प्रभुता के कारण बन आदि
आप्त करने वाला, दृढ् शरीर, दानी, शत्रुओं के वेभव को हरने वाला, प्रिय वाणी (मान)
(जा० भ०) । सेना समूह में श्रेष्ठ या सेनापति । कक के गुरु में बताया फल भी होवे
(o जा०) ।
६-गुरु कन्या का--पुष्प गन्ध, उत्तम वस्त्रघारी, शुद्ध, धन ओर दान में बुद्धि, सुन्दर
स्वरूप, शत्रुओं को सदा तपा देने वाला (मान०) (जा० भ०) । मिथुन के गुरु समान
फल (qo जा०) 1
७-गुरु तुला का--उत्तम सत्पात्र, अनेक पुत्र, जप होम यज्ञादि में उत्सव मनाने वाला,
देव ब्राह्मण पूजक, दान करने में वृद्धि चतुर, शत्रु युक्त, घबड़ाहट युक्त, आतुर, अहित
करने वाला (मान०) (जा० भ०) 1 वृष के गुरु सदृश फल (qo जा०) 1
८-गुरु वृश्चिक का--घन नाश करने वाला, दोषों से उत्पन्न दुबे देह, वडा
'याखंडी, घर की ओर से और बाहर से भी सदा दुःखी (मान०) (जा० भ०)॥ मेष के
सदृश फल (qo जा०) 1
९-गुरु घन का--घन का दान करने का प्रेमी,नम्न, बहुत वैभव, घन वाहन युक्त,
तीव्र बुद्धि, श्रेष्ठ रुचि से सुन्दर आभूषण वाला (मान०) (जा० भ०)। स्वगृही (९-१२
राशि का) मांडलीय (कुछ गांवों का स्वामी) व प्रधान व सेनापति और धनवान्
(३० जा०) ।
१०-गुरु मकर का--भ्रष्ट बुद्धि, पराया काम करने वाला, कामदेव रहित, भय
"क्रोध युक्त, कमं मनोरथों वाला या परकार्य नष्ट कर अपना मनोरथ सिद्ध करने वाला
(मान०) (जा० भ०) । नीच कर्म करने वाला, अल्प घन, दुःखित (qo जा०) ।
११--गुरु कुम्भ का--सदा रोगी, अति कुबृद्धि, घन से रहित, अत्यन्त कृपण, पाप
युक्त, खराब भोजन, दाँत और उदर में पीड़ा, (मान०) (जा० भ०) । कर्क के गुरु
समान फल (वृ० जा०) ।
१२-गुरु मीन का--राजा की कृपा से धन प्राप्त, सुन्दर मुख, घर का साधन करने
चाला, दान में तत्पर, सत्पुरुषों का प्यारा, मित्रों को सोख्य देने वाला, अपने को पवित्र
मानने वाला, काम की उन्नति वाला, (जा० भ०) (मान०) । “घनु के गुरु के समान फल (ge जार) ।
६-- शुक्त का राशिफल
१--शुक मेष का--घर, वाहन समूह ओर नगर का स्वामी, परदेश जाने को मन,
कविजनों का साथी, शत्रुओं से रहित, आदर पाने वाळा, ( मान० ) ( जा० भ०)
सोम क्षेत्री शुक्र ( १-८ राशि का )-परस्त्रियों में आसवत, परस्त्रियो द्वारा उनका
'घन हरण करावे, कुल पर कलंक लगावे ( qo जा० ) ।