भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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२९६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

११-घन में कुम्भ--फूळ फल से तथा जल से अधिक घन हो । किसी धनिक से प्राप्त

घन को साघु सेवा और परोपकार में लगावे ।

१२-धन भाव में मीन--नियम उपवास करने से, विद्या के प्रभाव से, किसी जगह

खजाने के मिल जाने से ओर माता-पिता के संचित घन के प्राप्त होने से बड़ा

घनवान्‌ हो ।

तृतीय भाव में राशि फल

१-तृतीय भाव में मेष--ब्नाह्मणों का मित्र, परोपकारी, कथा श्रवण में पवित्र,

विद्वान्‌, राजपुज्य ।

२-तृतोय में वृष--राजा का मित्र, प्रतापी, अतिथि को घन देने वाळा, यशस्वी,

विद्वान्‌, कवि, विप्र अनुरागो, अच्छे घन वाला, भूमि पशु खजाने वाला ।

३-तृतीय में सिथुन--श्रेष्ठ वाहन, स्त्रियों को प्रिय, सत्यवक्ता, उदार चित्त, कुलोन

राजपुज्य ।

४- तृतीय में कर्के वैश्य के घर मित्र लाम करे, कृषक, धर्म कथा अनुरागी,

र शील, अहंकारो ।

५-तृतीय में सिह--श्रवोर, दुष्ट मित्र, श्रेष्ठ घन का लोभो, प्राणियों के मारने की

चेष्टा करने वाला, पाप चर्चा करने वाला, प्रचंड वाक्य भाषो, गवे रहित ।

६-तृतीय में कन्या--शास्त्र विद्या अनुरागो, सुशील, मित्रों से स्तुति प्राप्त, विन्न

प्रिय, अति क्रोधी, देव गुरु भकत ।

७-तृतीय में तुला-पापी मित्र, चंचळ स्वभाव, चपळता की बातें करने वाला,

अनेक मनुष्य युक्त, अल्प सन्तान ।

८-तृतोय में वृश्चिक--इसकी मित्रता पापी से, दरिद्री से, कृतघ्न से, कलही से, अकारण झगडा करने वालों से, बिरुद्ध आचरण करने वालों से होती है । ९-तुतीय में घनु--राजा का मन्त्रो, श्रवोर, राजा का सेवक, धर्मात्मा, प्रसन्न मूति, जित चित्त, दयालु, युद्ध कोविद, मनुष्यों से घन प्राप्त करने वाला 1

=s ०-तुतीय में मकर- शांत प्रकृति, अनेक पुत्र, देव गुरु मित्र का प्रेमी, धनो ' पंडित l

११-तृतीय में कुम्म--ब्रती, कीति युक्त, क्षमाशील, सत्यवक्ता, सुशील, गीत प्रिय, ग्राम का अधिकारी और खल होता हैं ।

१२-तृतीय में मीन--बड़ा घनी, अनेक पुत्र, पुण्य और घन सम्पन्न, अतिथि प्रिय सबको आनन्द दाता ।

र चतुथे भाव में राशि फल

; (१) चतुर्थ में मेष---चतुष्पदों से, दो स्त्रो जनों से, विचित्र भोगों से, अन्नपान आदि से अपने परुषार्थ से उपाजित घन ने सोस्य प्राप्त, नोकरों से सुख प्राप्त हो ।