भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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२९८ t ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय खण्ड फलित

(६) पंचम में कन्या--पुत्र संतान से रहित, अपने पति को प्यारी, पुण्यवती, बड़ी ढीठ, शांत, पाप वाली, आभूषण की प्रेमी, अनेक कन्यायें हों ।

(७) पंचम में तुछा--अति सुशील, मनोहर, रूपवान्‌, क्रियावान्‌ और विशाल

नेत्र वाले पुत्र हों । (८) पंचम में वृशचिक- बड़े सुन्दर सुशील, अज्ञात दोष, स्वघमं स्नेही, पुत्र हों स्वयं घर्म में तत्पर हो ।

(९) पंचम में घन--अति विचित्र, घोड़ों से स्नेह रखने वाला, धनुविद्या का ज्ञाता,

शत्रु नाशक, गुरु सेवी, राजमान्य पुत्र हो ।

१०) पंचम में मकर--पाप में बुद्धि वाळे, कुरूप, नपुंसक, कुत्सित भाव युक्‍त

प्रमाद से रहित, अति निष्ठुर और प्रेम रहित पुत्र हों ।

(११) पंचम में कुभ--स्थिरता युक्त, गंभीर चेष्टा वाले, अति सत्य वक्ता, सर्वत्र

प्रसिद्ध, कष्टों के सहने वाले, बहुत प्रिय, यश से युक्त पुत्र हों । (१२) पंचम में मोन--ऐसे पुत्र हों जो स्त्री संग करने से ललित, गोरे रंग वाले, रोगी, कुरूप, हास्ययुक्त स्त्री सहित (सब पुत्रों के विवाह हो जावे) ऐसे पुत्र हों । षष्ठ भाव में राशि फल

(१) षष्ठ भाव में मेष राशि--मनुष्य शत्रु से वैर करने वाले ।

(२) षष्ठ में वृष--कुटुम्बी स्त्रियों से (पुत्र बघू आदि से) भोग करने के कारण

भाई बंदों से बैर।

(३) षष्ठ में मिथुन--अपनी स्त्री से वैर करने वाला, पापो, मनुष्यों से, बनिये से

आर नीच जनों से अनुराग रखने वाले मनुष्यों से वेर करने वाला । (४) षष्ठ में कर्क--पुत्र निमित्त से आतु र होने के कारण, ब्राह्मणों से, राजाओं से महाजनों से झगड़ा हो जाने से भय प्राप्त । यह सब दूसरों के अनुरोध से होता है ।

(५) षष्ठ में सिह--पुत्रों से, भाई वंदों से वैर, वेश्याओ से भोग करने के कारण सारा घन नष्ट ।

(६) षष्ठ में कन्या--कोई वरी न हो परन्तु दुष्टा व्यभिचारिणो, नीच जाति की और निराश्रित रहने वाली अनाथ विधवा तथा वेश्या के संग रहने के कारण कंगाली आ जावे ।

(७) षष्ठ में तुला--रखे घन के कारण पूर्ण धनी होता हुआ भी घर्म कार्य में साघु मनुष्यों से व अपने बंधु वर्ग से एवं अपने घरवार से भी वर होता है । (८) षष्ठ में वृशचिक--सर्पो से व चुगुलखोरों से, बिच्छ कनखजर आदि से, काळ गणों से, हरिणो से, चोर गणों से तथा घनिकों से ओर विलासी परुषों से वेर । (९) षष्ठ में घनु--राग में फेसे हुए, घनुष बाण घारण करने वाले परुषों से और हाथी घोड़ा आदि से और पुण्य करने वाले मनुष्य से एवं ठग से वेर हो जाता है।

(१०) षष्ठ में मकर--घन का सूद लेने के कारण वैर साघुजनो के सहायक