भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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३०८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित छण्ड

९.--लग्न में केतु का फल

बांघवों को कष्ट देने वाला, दुजंन से भय, मन में व्याकुलता, स्त्री पुत्र आदि के विषय

में चिता, सब कार्य में घबडाहट, शरीर में पीड़ा, वात रोग ( मान० ) ।

राहु के समान फल ( खान० ) ।

mas, दुःखी, चुगुल खोर, जाति च्युत, स्थान च्युत, विकल देह ( अंग में दोष )

दुष्ट की संगति ( फल दीप ) ।

रोगादि से युक्त, भय से व्यग्र चित्त, उद्वेग युक्त, स्त्रियों को चिता, वात विकार

युक्त शरीर ( जात० भरण ) ।

रोगी, लोभी, यदि शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो राजा समान भोगी । लग्न में शनि फे

गृह में केतु स्थिर घन पुत्र दायक है ( जा० पारि० ) ।

स्त्री नष्ट हो जावे, भुजा में रोग शरीर में व्याधि ( जा० सं० ) ।

२-धन भाव सें ग्रहों फल

१-धन भाव में सूर्यं का फल

पुत्र तथा स्त्री से हीन, दुबंलांग, अत्यन्त हीन, रक्त नेत्र, बुरे केश, ताम्वे के व्यापार

से घनवान्‌, दुःखों को भोगने वाला, गृहस्थ सुख कभी नहीं पाता है ( मान० ) ।

विद्या रहित, विनय व घन रहित, तोतली वाचा ( फल० ) 1

क्रोधी, बुद्धि होन, कृपण, द्रव्यहोन, रोगी ( खान० ) ।

घन ओर पुत्र व अच्छे वाहन से रहित, बुद्धि नष्ट, मित्रता हीन, पराये घर में बास

( जा० भ० ) |

घनी, राजा का घन हरे, मुख में रोग ( qo जा० ) ।

विवाद, बहुत शत्रु, निधन, ईर्ष्यायुक्त, पर का अपकार करनेवाला, कृतघ्न (ल. च.) 1

दानी, धातु द्रव्य वाला, इष्ट शत्रु वाला, वाचाळ ( जा० पारि० ) ।

घन में सूयं हो या सूर्य की दृष्टि हो--चोर हो, घर का घन राजा द्वारा हरण कर

लिया जावे ( जा० सं० ) । :

सदा घन को नाश करता है निर्धन करता है ताम्रघन को देता है। घन में सूय हो शनि

की दृष्टि न हो तो अतीव घन देता है, शनि को दृष्टि हो तो निर्धनता लाता है 1 अन्य

ग्रहों की दृष्टि हो तो शुभ है ( जा० संग्रह ) ।

बहुत घन मिळे परन्तु राजा उसका वन हरण करे, मुख रोग हो ( प्रा यो०1) । २-धन भाव में चन्द्र का फल

बड़ा त्यागी, बुद्धिमान्‌, घन से पूर्ण कोष, चंचल मन, अति दुष्ट, कोतिमान्‌, सुन्दर भोगी, यशस्वी, सहनशील, कमल सा मुख ( मान० ) । घनी अति विद्वान्‌, विषय सुखमान्‌, कोई अंग दोष पूर्ण ( फल० ) 1 = कामी, तेजस्वरूप, सुन्दर वचन, बुद्धिमान्‌, विद्याशील, घनवान्‌ ( जा० पारि०,) 1 ओ। घनवान्‌, मिष्ट भाषी, नीच का हो तो विपरीत फल ( खान० )1