सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 326, कुल 418 में से
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३१० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अपने श्रम से घन प्राप्त करे, कवि हो, अपने भाषण में सच्चा, मिष्ठान्न भोषता
(फल०) ।
मिष्ट भाषी, बुद्धिमान्, घनी, प्रीतियुक्त, नीतिज्ञ, नम्न ( खान खाना० ) !
निर्मल शील, बड़ों का प्यारा, बड़े सुख को प्राप्त, बड़ी शोभा से उन्नति प्राप्त
( जा० भ० ) ।
चनधान्य से युक्त, शुभ कमं करने वाला, सदा सुखी, राजाओं में पुज्य (go चं०) t
चनवान् ( qo जा० ) ।
बुद्धि से उपाजित किया घन शील गुण हो, साधु हो ( जा० पारि० ) ।
घन में बुघ हो या बुघ की दृष्टि हो-धनवान्, राजा से सत्कार, चतुर भाषी, धळ
नष्ट होने पर फिर मिल जाता है ( जा० सं० ) ।
बहुत प्रकार से घन देता है ( गर्ग ) 1
इसपर चन्द्र की दृष्टि हो तो-समस्त घन का नाश करता है।
घन में बुघ--घनवान् हो, गणित ज्योतिष काळमान, श्रौत स्मार्त सकल मंत्र, गायन
वाद्य का ज्ञाता, अनुग्रह करने वाला हो, शिल्प कला का ज्ञाता हो, नाना प्रकार की विद्या
जाने, हास्य विनोद का भाषण करे, सात्विक, उत्तम नेत्र, मित्रों का प्रिय हो
( प्रा यो० ) ।
५--धन भाव में गुरु का फल
, सदा प्रसन्न, मनोहर स्त्री, अहंकारी, मोतियों आदि के व्यापार से घन प्राप्त हो,
जन्म काल में अति दुःखी पीछे सुखी होता है ( मान० ) 1 ः `
बातुनी, भोजन में अच्छा विज्ञान, सुमुख, घन विद्या qaq. ( फछ० ) 1
स्वभाव में बड़प्पन, घमं में मति, सिद्धि प्राप्त, सुवणं और पुत्र युवत, सुन्दर, घनी
( खान खाना ) ।
श्रेष्ठ रूप, विद्या यश गुण युक्त, वैर को छोड्ने वाला, त्यागी, शीलवान्, घन से पूर्ण
( जा० म० )।
घनी, कृतज्ञ, भाइयों से युक्त, हाथी घोड़ा ओर भैंसों वाला, कांति युवत (छ० च ०) ।
सुन्दर वाणी ( बु० जा० ) 1
वाचाल, भोजन सौख्य वाला, विशेष घनी, दानी ( जा० पारि० ) ]
लक्ष्मीवान् तथा सुन्दर, उत्साह रखने वाला ( गगं ) ।
गुरु की दृष्टि हो--घनघान्य का सुख हो, विद्या विनय युक्त, सबका मान्य हो
( जातक रत्न ) 1 घन में गुरु हो बुघ से दृष्टि हो--बहुत घन देता ë ( जा० सं० ) 1
घन में गुरु--धनी, विद्वान्, विशेष कर वैयाकरणी हो, बहुत कला जाने, सात्विक
वृत्ति हो, घमं सम्बन्धी पुराण आदि की कथा करे, मधुर पदार्थ प्रिय हो, उसके पास हृत सुबर्ण हो, अंग प्रिय हो ( प्रा० यो० ) ।