भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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राशि एवं नक्षत्र-गुणधम : १७

आदि सै प्रवास, कंठ, स्वर, वीयं, अस्थि, गला, कर्णे, वस्त्र का विचार । इसका

प्रभाव हाथ, बाहु, कंचा, हृदय और कर्ण-विशेष कर दक्षिण कगं पर होता है ।

(४) Seq भाव--इष्ट मित्र, sq वर्ग (भाई विरादर) आत्मबंधु, स्नेह बंधु, जाति,

बंश, माता से प्राप्त दुःख सुख, माता का स्वभाव और आयुष्य, मातृ पक्ष का विचार

माता का वक्षःस्थल, माता-पिता का विचार, ससुर, नानी, विविघ मित्र, घरेलू स्त्री

का सुख, दासियाँ, पिता की सम्पत्ति (पितृ सम्बंघी धन), निधि (भूमि गत द्रव्य),

आयुष्य के अन्त के दिनों के सुख-दुख का विचार, स्थावर सम्पत्ति, ग्राम, घर, गो,

चौपाया, वाहन, बावड़ी, तालाब, कुंआ, वृक्ष, क्षेत्र, बगीचा, महौषधि, धरती का

उद्यम, औषधि, रसायन शास्त्र के विषय, पाताल कमे, भूमि शोधन, भू विद्या, खेती

आदि भूमि कर्म, सुख, आनंद शयन सुख, समस्त छात्र , भोज्य पदार्थ, अपनी वृद्धि,

सदाचार तथा धर्माचार, हृदय का साहस, हृदय का कापट्य, शिक्षा, विद्या, यण,

वेभव, ज्ञान, मायावाद, पराजय, मनोगुण, मानसिक बातें, स्वतः का दुःख सुख,

राज्य, राज्य-अनुग्रह, हस्त कौशल, वस्त्र, सुगन्ध, किताब, उद्यम, वित्त, विवर

आदि प्रवेश, हृदय स्थान, कन्धा 1 इसका प्रभाव छाती, पेट पर पड़ता है।

(५) सुत भाव--बारह प्रकार के संतान का विचार, गर्भ की स्थिति, पिता का ज्ञान,

विद्या, वुद्धि, यांत्रिक ज्ञान, बुद्धि का विस्तार, घारणा शक्ति (स्मरण शक्ति), बुद्धि

की तीक्ष्णता, विवेचन शक्ति, नीति, विनय, व्यवस्था, प्रवंध, सलाह, गुप्त मंत्रणा,

रक्षा, गोपनीयता, शील स्वभाव, चतुरता, ज्ञान, मेघा, शक्ति, तुष्टि, माहात्म्य,

आत्मविद्या, बड़प्पन, पठन (अध्ययन), मन की प्रसन्नता, हर्ष, पांडित्य, श्रम, वाणी

वंश वृद्धि, कला, आतिथ्य, देव भक्ति, यंत्र, मंत्र की सिद्धि, पुण्य कर्म, राज अनुग्रह

घन उपाय, उद्योग, छाटरी सट्टे आदि में यक्ष अपयश का विचार, अन्नदान भोजन,

बाजा, शिल्पादि का भी विचार, उदर कमं, उदर प्रवेश । यह उदर स्थान है । हृदय

और उदर के बीच का भी प्रदेश है । हृदय का भो विचार होता है । इसका प्रभाव

हृदय और पीठ पर भी होता है ।

(६) रिपु भाव--शत्रुओं का समूह, होने वाली व्याधि (रोग), अरिष्ट, हानि, द्रव्यादि

नाश, निराशा, दुःख व शोक, क्लेश, विघ्न हेष, मानसिक चिता ओर दुःख, शंका,

क्रूर कर्म (अशुभ कर्म), व्यसन, व्रण, विस्फोटक चोट आदि, व इनके चिह्न, संग्राम

भय, चोर भय, बल सुख, भूमि, मोसिया और मोसी का शुभाणुभ, सौतेली माँ,

स्वजातीय, पर आश्रय, गाय भैंस ऊंट गघा आदि चौपाया, षट्‌ रस भोजन का

मघर आदि स्वाद, चटनी, नौकर, अपने नीचे काम करने वाछों का विचार, ऋण

(कजे) रुकावट, पापकम, नाभि ओर उदर माग का भी विचार । यह पेट है ।

इसका प्रभाव अंतड़ी, नाभि और पेट पर होता है ।

(७) जाया- स्त्री या स्त्री का पति, विवाह, स्त्री का आचार, स्त्रीसुख, स्त्री के शरीर

का विचार इससे लग्न-वत्‌ करे, मैथुन, काम-क्रीडा, र्ट ज्ञार, व्यभिचार, स्त्रोसोमाग्य

घरू आनंद उपभोग, स्त्री कलह, पुत्र सुख, जो पहिले पुत्र के दुःख-सुल का विचार