भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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१८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

किया था सप्तम से भी विचार करना । पितामह, माता का ज्ञान, भाई का पुत्र

(भतोजा), संग्राम का मेदान, जय कष्ट, वाद विवाद, अदालती झगडे, कलह,

साझेदारी, प्रगट स्पर्धा तथा प्रगट शत्रु का विचार । मार्ग गमन-आगमन, यात्रा का

प्रमाण, मागंभ्रंश; संपूर्ण यात्रा, व्यापार, व्यौहार, वाणिज्य क्रिया, उत्कर्ष, पदप्राप्ति

उन्नति, इष्ट अर्थ का फळ, चोरी की वस्तु, खोई हुई वस्तु का विचार, विस्मृति

(मूल) का विचार, नष्ट घन की प्राप्ति या गुमा घन की प्राप्ति, तांबूल, पुष्प, गन्ध,

संगोत दुग्घ, दघि मिठास, गाय, नदी, दाल, क्षार, रेत, गुदा, गुह्य, मूत्रेन्द्रिय, मूत्र और नाभि । सप्तम वस्ति संज्ञक है इसका प्रभाव वस्ति-मुत्रपिड पर होता है । इसमें

सभी ग्रह अशुभ माने जाते हैं ।

(८) मृत्यु-आयु, मरण, व्याधि, रोग, रोगोत्पत्ति, मानसिक पीड़ा ( मनोव्यथा ), मरने

का हेतु ( कारण ), मृत्यु स्थान, मृत्यु के सम्बन्ध से सब प्रकार का विचार, मरने

के बाद गति, पूर्व जन्म और अग्निम जन्म का वृत्तांत, निर्याण, जीवन का समय,

अरिष्ट, दीर्घ जीवन, हानि ( बरबादी ), संकट, व्याधि की उन्नति में विचार,

वस्तु का नाश, कलि, पाप, वघ, व्याधि का उत्पन्न होना, पितृ ऋण, पूर्व संचित

द्रव्य, आकस्मिक लाभ, दहेज ( स्त्री द्वारा प्राप्त घन ), परवाद भय, शत्रू का भय, रण, युद्ध समय क्षण संग्राम, पराजय, किले को घेरना, दुर्ग स्थान, शस्त्र तैयार

करना, अत्यंत विषम मागं, अत्यंत भयंकर स्थान, -छिद्र का देखना, छिद्र मार्ग,

नौका, नदी पार करना, युद्ध काल को संख्या, बंधन, सजा, क्र रता, अपमान, जय￾पराजय, दुःख, व्यसन, टेढीबात, उच्चपद पतन ( पद हानि ), अपघात ( अचानक

घटना ), विपत्ति, भोजन का सुख, ज्येष्ठ बहिन का पुश्र । गुप्त अंग ( जननेन्द्रिय ), गुदा रोग, । इस का प्रभाव गृह्यन्द्रिय और प्रजा-उत्पादक इन्द्रिय पर होता है ।

(९) घमंभाव- ( प्रारब्ध ), भाग्योदय अर्थात भाग्य की वृद्धि, भाग्य की सिद्धि, वैभव,

ऐदवर्य, अदृश्य भाग्य । घर्म, अघमं श्रद्धा, ( धर्म के कार्यो में प्रीति या अप्रीति ), घर्मानुष्ठान ( घमं कृत्य ), मठ, देवगृह, वापी, कूप आदि समस्त धर्म क्रिया, तीथं-

यात्रा, पुराण, देव-भक्ति, दान, घन, दया, तप, बुद्धिमत्ता, ग्रन्थ कर्तव्य, तत्त्व￾ज्ञान, चित्त शुद्धि गुरुत्व, गुरु ( शिक्षक ) या आचायं, गुरु भक्ति, दीक्षा, देव￾भक्ति, योग साधन, मन, प्रकृति, स्वभाव, सहानुभूति, पाप पुण्य, ( शुभ कर्म या

पाप कर्म ), सुशीलता, निर्मल शीळ, नीति, नम्रता, स्नेह, ईश्वरीय ज्ञान, मन की

शांति, अनुग्रह, सत्पात्रों के लिए आदर, लम्बा और दूर का प्रवास, जल पर्यटन, मार्ग, शाला, नेतृत्व ( मुखियापन, चिता, स्वप्न, कानून , सम्पत्ति, लाभ, बृद्ध जन, पिता, पोता-पोती, नाती, स्त्री, मामा, कुटुम्ब, आदि, साथ में भोजन करने वाले । चाम पद और जंघा पर प्रभाव ! š (१०) कर्ममाव--उद्यम, उपजोविका, कर्म जो करेगा, घंघा नौकरी आदि का विचार

व्यापार, मुद्रा (पया), राज्य, राजा से आदर अधिकार मिलने का विचार, पदवी, महत्त्व के पद ( बड़े पद ) की प्राप्ति, नौकरों पर हुकूमत, प्रभुत्व, राज्य बृद्धि,

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