भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 333, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 333

भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३१७

माता के साथ रहे, मित्र, दास, पुत्र, स्त्रो, अन्न आदि युक्त, सुखी (फल०) 1 थोड़ा घन, जरी वाले वस्त्र, रथ हाथो से युक्त, राजप्रिय, सम्पूर्ण सुख युक्त

(खान०) । सुखी (qo जा०) (प्रा० यो०) ।

सम्मान सहित, अनेक घन वाहन आदि युक्त, अनेक आनन्द प्राप्त, राज कृपा से सम्पदा प्राप्त (जा० भ०) ।

संसार में सुखी, सौभाग्य युक्त, राजाओं में पूज्य, शत्रुओं को जोतने वाला, कुल में

भुख्य, गुरु का भक्त, (ल० चं०) ।

वाचाल, घनो, सुख यश रूप वाला, शठ स्वभाव (जा० पारि०) ।

बाल मित्र हों, दिव्य माला वस्त्र क्रीडा तथा अनेक वाहन युक्त (जा० सं०) 1

घर बहुत रत्नों से युक्त (यवन) ।

६-चतुथ में शुक्र का फल

बहु स्त्री पतर युक्त, अति सुन्दर, राजमहल के समान घर में रमण करने वाला, वस्त्र तथा खाने पीने के विलास से युक्त (मान०) ।

अच्छे वाहन, अच्छा घर, भूषण, वस्त्र, गंध जादि प्राप्त (फछ०) ।

विलापी, प्रियमाषी, घनाढ्य, पंडित, अच्छा स्वभाव (खान०) À

मित्र स्थान, ग्राम और वाहनों का अनेक सुख प्राप्त, देवताओं का पुजक, सदा

आनन्द को प्राप्त (जा० भ०) |

सुखी, जानने वाला, बहुत स्त्री वाला, बहुत घनी, स्त्रियों का स्वामी, यशी और विवेकी (ल० चं०) । सुखी (qo जा०) ।

स्त्री से पराजित, सुख यश घन विद्यायुत और वाचाल (जा० पारि०)। :

दूसरों का मित्र, विचित्र कमं करने वाला, ग्राम वासी, विठास कर्ता, बहुत प्रकार से

भोगी, राज पूज्य, दीर्घायु वाला, सुन्दर स्त्री हो, सदा पराक्रम वाला (जा० सं०) । विशेष कर मोती रहते है । (यवन)

७-चतुर्थं में शनि का फल -

बंधुनाशक, स्वयं सदा रोगी हो, वक्री हो तो स्त्री पुत्र भूत्यो से अनादर व ग्रामान्वर

में दुःख देने वाला होता हे (मान०) । ८

दुःखी, गृहविहीन, वाहन रहित, मातृ रहित, आरम्भ जोवन में रोगी (फळ०) ।

पित्तवात से क्षोण बझ, दुष्ट शोलवानू, आलसो, झगडाळू, दुर्बल देह, दरिद्री

(जा० भ०) ।

सुखहीन, भाइयों ने जिसका द्रव्य छीन लिया हो, गुणो, कुसंगी, दुर्जनो से युक्त

ओर मूर्ख (ल० चं०) । सुख रहित, पीड़ित (qo जा०) 1

चिता युक्त, बेहोश, परितप्त, बंलहीन (खान०) ।

आचारहीन, कपटी, मातृक्लेश युक्त (जा० पारि०)।

टूटे हुए आसन और गृह वाला, विफल, दुःख से संतप्त, स्थाननाश (जा० सं०) ।