भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३२३

३-छठे भाव में मंगल का फल i संग्राम में मृत्यु, नीच का या शत्रु दृष्ट हो--विकल मुति, निदित, me कमे करने चाळा, उच्च का--मित्र, घन से परिपूर्ण, सुखो, भोगी (मान०) । टॅ बलवान्‌ (वृ० जा०) ।

भयळ मदन युक्‍त, घनी, विख्यात, राजा हो, यद्ध में जय (फलछ०) 1 शत्रु नाणी, रूपवान्‌, ऐवो, घनयुक्त, गुणग्राही, कुल पुज्य, माता के पक्ष में कुठार के समान (खान०) ।

जठराग्नि अति प्रबळ, क्रोघ स्वरूप, शत्रुओं का नाशक, सतसंगी, सदा.काम कला में वृद्ध (जा० भ०) ।

प्र pn द्रव्यों से युक्त, स्त्री से लालसा प्राप्त करने बाळा, पृष्ट देह, शुद्ध

टा शनुनाशक, त्रनादा' प्रबल जठराग्नि, रि श्रीमान्‌, यक्ष बळ युक्त, रोग करने वाला

२४ वषं में पुत्र देता है । पापदृष्ट--शत्रु हो । नियम से शन्नु मय, शुम युक्‍त या ृष्ट--शत्रु कृत भय नहीं होता, शत्रु की मित्रता हो ।

शरीर में फोड़े होकर छेद पड़े, बडी व्याधि हो, लोगों से घिक्कारित (प्रा यो०) । रति विकार हो, परन्तु सबसे जय मिले (सोम सिद्धान्त) 1 “४-छठे भाव में बुध का फल

वक्री या शत्रु क्षेत्री--शत्रु से भय, शुभ गृही या णुम दृष्ट--शुमप्रद, शत्रु नाक है (मान०) 1 सदा दुःखी, आलसी, दुष्ट स्वभाव, धत्रुयुक्त (खान०) ।

झगडा करने में प्रीत, रोगी, कठोर हृदय, शत्रु से संतप्त चित्त, आलसी व्याकुल (जा० भ०) ।

नृशंस, भाइयों का विरोध, ईर्ष्यालु, काम में त र, विद्वान्‌ (ल० चं०) 1 शत्रु रहित (वृ० जा०) ।

विद्या विनोदो, कलह प्रिय, शील रहित, परिवार से उपकार होन (जा० पारि०) 1

चन्द्र के समान हजार दोष देता है (यवन) ।

३७ वर्ष में मृत्यु देता है (हिल्लाज) ।

चन्द्र के समान फल देता Š, मामा कन्या सन्तान वाला |

स्त्री व पुरुष के रोग, लोगों से कलह, सर्वकाल त्रास, बहुत घूमे (प्रा यो०) ।

५-षष्ठ भाव में गुरु का फल

हाथी-घोडा युक्‍त, दुबला अंग, शत्रु को जीतने वाला । वक्री-शत्रु से भय (मान०) ।

बहुत आकर्षण, अनादर प्राप्त, शत्रु दमनकर्त्ता, मन्त्राभिचार में चतुर (फल०)।

आसी, व्याधि युक्त, कटु वाक्य, मामा सुखहीन (खान०) ।

श्रेष्ठ गति और श्रेष्ठ विद्या से होन अर्थात्‌ दुष्ट ओर खोटो विद्या में तत्पर, यक्ष का अमी, शत्रुनाशक, प्रारब्ध कार्य में आलसी (जा० भ०) । :