भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३२९

पागळ फी तरह घुमे, दूसरों को हानि पहुँचावे, क्रोधी, बुरे आचरण, कलह कारक (खान०) 1 नीच जाति या रजस्वला का संग (वृ० पा०) 1 अहंकारी, रोगवान्‌, व्यभिचारियों में शिरोमणि (जा० पारि०) 1 घन खर्चे करने वाळी स्त्री, अनेक विविध भोग प्राप्त, नपुंसक स्वभाव वाली श्याम वर्ण की स्त्री हो 1 हसमैं स्त्रो का योग नहीं होता, यदि स्त्री प्राप्त हो तो मृत्यु को प्राप्त हो (जा० सं०) । विष का प्रयोग करगे वाली दुष्ट स्त्रो हो (प्रा० यो०) । ९-सप्तम में केतु का फल

मागं चलने की अधिक चिन्ता, या जाना बन्द हो जाय तो अपने घन का नाश हो या जल से भय हो, वृश्चिक का हो--सदा लाम, स्त्री पुत्र आदि को पीड़ा कारक अधिक खर्च तथा व्यग्रता हो (मान०) ।

अपमान सहे, बुरी स्त्रियों को संगति करे, अंत्र रोगी, पापयुक्त, स्त्री की हानि, घातु (शक्ति) हानि (फल०) 1 राहु के समान फल (खान०) । मार्ग की चिन्ता में चित्त को वृत्ति रखने वाला, शत्रुओं से सदा घन नाश । वृश्चिक 'का--सदा छाम करने वाला, कलत्रादि को पीड़ा ओर चित्त को विकार होता है (जा० भ०) ।

Rigs= स्त्रो बाला या स्त्री भोग रहित हो, शीर रहित, निद्रालु, दोन वचन बोलने Ter, सदा भ्रमण शील, मूखों में अग्रगण्य (जा० पारि०) 1

राहु सम फल (प्रा० यो०) ।

८-अप्ट्म भाव में ग्रहों का फल

१--अष्टम में सूये का फल

अति चंचल, त्यागी, निश्‍चय बुद्धिमान्‌ मनुष्यों की सेवा करने वाला, भाग्यहीन, शीलहीन, रति की अधिकता से मलिन वस्त्र पहिरने वाळा, नीचों की सेवा करने वाला, सदा परदेश सें रहने वाला (मान०) ।

घन हानि, मित्र हानि, अल्पायु, दोषपूर्ण दृष्टि (फल०) ।

दुबेल, उद्यम रहित, विदेश में वृत्ति (खान०) 1

दुबंल नेत्र, मंद दृष्टि, छात्र वृद्धि, भ्रष्ट, बड़ा क्रोधी, थोड़े घन याला, विशेष करफे चुबंल देह (जा० भ०) ।

कृतघ्न, हीन मनुष्य, शत्रुओं से डराया हुआ, वृया | चलने वाला, बन्धुहीन

{छ० चं०) 1 संतान थोड़ी, नेत्र चंचल (go हि ]

ब सुन्दर, में चतुर (जा० पारि०) 1

sss k: देवा है, अन्य राशि का-दुःख पूर्वक मरण, काष्ठ से कष्ट

देवा है । बली पापयुक्त या दुष्ट--उसे यमदूत होकर नाश करता ç ।

संतति थोड़ी हो, मन विकल हो, अंतर्दाह या अग्नि से मृत्यु, स्वक्षेत्र या उच्च का

सौल्य देता है, अन्य राखि का दुःख देता है । शत्र क्षेत्र हो तो बिजली या सर्प से मृत्यु, गुम राशि का हो तो तीर्थादि में मृत्यु (प्राश यो०) 1