भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 346

३३० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

२-अष्टम में चन्द्र का फल

पापगृही हो तो अल्पायु में मरण । स्वक्षेत्री या सोम्यगुदी गुरु या शुक्र के घर का

पूर्ण चन्द्र हो--श्वास आदि रोगों से अति दुःख हो (मान०) रोगी अल्पायु (फल०) L

रोगी, क्रोधी, निर्दय, विदेश भ्रमण । (खान०) ।

अनेक रोगों से दुर्बल देह, घन हीन, चोर, शत्रु तथा राजा से संताप, भन उद्वेग से व्याकुल (जा० भ०) ।

दुःखी, थोड़ी आयु, कष्ट सहित, प्रगल्भ, दु बल अंग, पाप बुद्धि (ल० so) बुद्धि- मान्‌ (qo जा०) ।

लडाई में उत्सुक, दान-प्रमोद और विद्याशील (जा० पारि०) 1

क्षीण चन्द्र--बाल्यावस्था में मृत्यु, त्रिदोष ज्वर और मृत्यु (जा० सं०) ।

चपळ बुद्धि व रोगो, जल में मृत्यु, पापग्रह की राशि का हो तो--श्वास त्रिदोष

ज्वर सूजन होकार मरे (प्रा० यो) । `

३-अष्टम में मंगल का फल

क्षीण या नीच का--जल में डूब कर मरे। घन मीन का सूर्य हो तो--नित्य भोग

करने वाला, नीचे हाथ पैर वाला, अनेक भोगों को भोगे (मान०) 1

कुरूप शरीर, गरीब हो, अल्प जीवन, जन निदित (फल०) ।

हितवादी, गुप्त रोग, स्त्री सुख नहीं, सदा चिता aq, जौहरी, शरीर में घाव,

बुद्धि हीन, दुबला, रुधिर विकार (खान०) 1

नेत्रों में विकलता, दुर्भगता को प्राप्त, रक्त विकार से पीड़ित, नीच फर्म में परवृत्ति,

बुद्धि का अंधा (जा० भ०) 1

कुष्ठी, अल्पायु, सत्रुओं से पीडित, थोड़े द्रव्य वाळा, रोग युक्त, निर्गुणी (ल० चं०) +

थोड़ी संतान (go जा०) ।

विनीत वेब, घनवान्‌, मुखिया (जा० पारि०)।

शस्त्र आदि से व छूता आदि से व गरिन से मृत्यु, कुष्ट रोग से नाश, स्त्री को पीड़ा

(जा० सं०) ।

शस्त्र से, अग्नि, कुष्ठ वर्ण, स्त्रियों से रोग होकर या शस्त्रचिकित्सा से मृत्यु, अल्फ

संतान, विफल मन (प्रा० यो०) ।

४-अष्टम बुध का फल

मूत प्रतों की कृपा से सम्पूर्ण सम्पत्तियों को प्राप्त, बहु विरोध करने वाला, अभि- मानो, यत्न ऐ अन्य कमं क्रिया को करने वाला (जा० भ०) ।

दीर्घायु, अभिमानी, राजा से लाभ, लोगों से š< (खान०) 1

विश्‍्वासघातो, कुबुद्धि, परश्त्रो से भोग, कायं से आतुर, सत्यवादी, निरोग (छ० चं०) । विख्यात गुणवान्‌ (वृ० जा०) ।

सत्य भाषी, सुन्दर मूर्ति, शत्रु हंता, अतिथि जनों का सत्कार करने वाळा । पाप युक्तः था शु गृहो-कामदेव के वेग में अप्रतिष्ठा पाने वाला (मान०) ।

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १) · पृष्ठ 346, कुल 418 में से · BharatKosha