भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 360, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 360

३४४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

४ व्यय में बुध का फल

विकर शरीर (लूला लंगडा), दरिद्री, दूसरे के धन ओर स्त्री में बहुत मन, व्यसनों से अलग, सदा उपकारी (मान०) ।

दुःखो, विद्या रहित, अपमानित, क्रूर, अकर्मी (फल०) ।

अशुद्ध गुणवान्‌, नुकसान वाली बातें करे, किसी को बातों को न सहे; दया हीन, दुःखी, बेहूदा, घूमने वाला (खान०) ।

दयाहीन, स्वजन रहित, अपने काम में चतुर, अपने पक्ष को जीतने वाळा, निरंतर

घूर्त, मलिन (जा० भ०) ।

खर्चे करने वाला, रोगी, भाई से युक्त, पाप में रत, पराधीन, शत्रु का पक्ष करने

बाला (छ चं०) । सूर्यवत्‌, फल, पतित (बृ० जा०) ।

बन्धुओं से वर, घनी, बुद्धि रहित (जा० पारि०) ।

राज पीड़ा से संतप्त, निद्रा से मुक्त, m< (जा० सं०)

५-व्यय में गुरु का फल

बाल्यावस्था में हृदय रोग, उचित दान करने में बहिमुंख, कुल और घन ते युक्त ।

पापस्थानी हो तो--बड़ा दंभी, पाखण्डी (मान०) ।

दुसरे से घुणा करे, दुमुंखो, सन्तान हीन, पाप युक्त, आलसी, नीच (फळ० )! दरिद्री, कम बोलने वाला, मूर्ख, निर्लज्ज, बुरे वचन बोलने वाला, आलसी, बुरे कर्मों में खर्च (खान०) ।

अनेक प्रकार के चित्त के उद्योगों से क्रोध सहित, पापी, आलसी, लज्जाहीन, बुढि” हीन, मान रहित (जा० भ०) | 2 रोगी, परिश्रमी, पराये कर्म को करने वाला, बंधु बैरी, नोचों की सेवा, गुरु वैर (8० चं०) । दुर्जन (qe जा०) । चार्वाक मत, चञ्चल, घूमने वाला, खळ बुद्धि (जा० पारि”) 1 ऊँचा खर्चे करने वाला, सेवा करने में पण्डित, बड़ा क्रोधी, आरधी, लोक में विग्रह करने वाला (जा० सं०) ।

६- व्यय में शुक्र का फल

प्रथम रोग से मुक्त, पीछे कपट में तत्पर चित्त, हीन बल, सदा मलीन (मान०) । योगी, घनी और द्युतियुक्त (फल०) । बड़ा खर्चीला, वदकार, दुष्ट बुद्धि, क्रोधी (खान०) । श्रेष्ठ क्रमं के मार्ग को त्यागने वाळा, कामदेव में चित्त, दया और सत्य रहित (जा० qo) व्यय से युक्त, मित्र और गुरु का विरोघो, भाइयों में झूठ बोलने वाला, गुण होन (छ० चं०) । दुर्जन (qo जा०) । बंधु नाशक, व्यभिचार बुद्धि, दरिद्र (जा० पारि०) । अढाहीन, दयाहीन, रोगा, स्थूल देह (जा० सं०) 1