भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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फलित मैं ग्रहो के फल का विचार : ३६१

चन्द्र--जलाशय, स्त्री, हाथ, घोडे की वृद्धि युक्त हो पूर्ण चंद्र में यह फल हो।

क्षीण चंद्र हो तो विपरीत फल हो, घन आदि का इनके द्वारा नाश हो, पूर्ण चन्द्र में इनके

दवारा घन लाभ हो ।

मंगल--उत्तमोत्तम आभूषण, मणि सुवणं प्राप्ति, विचित्र यात्रा करने वाला, बडा

साहसी, नाना कलाओं से युक्त, कोमल बुद्धि या अग्नि शस्त्र आदि सम्बन्ध से घन लाम

हो परन्तु कुछ कष्ट से लाभ हो ।

बुघ--अनेक कविता करने से, बहुत कलाओं के जानने से, कारोगरो के कामों से,

लिखने के काम से, उत्तम साहस से, अनेक उद्यमो से, वणिकजनों की मित्रता द्वारा और

कवि मनुष्यों से घन प्राप्त हो या घोड़ों के व्यापार से घन लाभ हो ।

गुरु--यज्ञ क्रिया करने वाळा, साघुजनों का संग करने वाला, राजा का कृपापात्र

होने से उसके आश्रय में रहने वाला, सुवर्ण प्रधान घन से युक्त ।

शुक्र--वेश्या जनों के द्वारा या परदेश आने-जाने से सोना, चाँदी, मोती आदि

की खुब प्राप्ति होती है 1

शनि--नीले रंग की वस्तु, लौह भैंस, हाथी आदि द्वारा लाम हो ओर ग्राम नगर

के मनुष्यों के बोच पुणं बड़प्पन पाता है । शुम ग्रह से-सब प्रकार का लाम होता हे ।

१२--नवम भाव के ग्रह के अनुसार भी छाम का विचार होता है यह विचार

नवम आव में दे चुके हूँ ।

१२-—द्वादश व्यय भाव का फल

१--इससे सब प्रकार का खर्च, कैद, गुप्त शत्रु, गुप्त विद्या, अध्यात्म विद्या ओर

सोक्ष आदि का फल जाना जाता ë ।

२--किसमें खर्च-च्ययेश आर व्ययस्थ ग्रहों में जो बली हो और भाव कारक हो

इन सबका विचार करने से प्रगट होगा कि किस भाव में या किस ब्यापार में घन व्यय

होगा ।

व्यय भावेश के साथ जिस प्रकार शुभ या अशुभ ग्रह हो या वह जैसे स्थान का स्वामी

हो उसके अनुसार शुभ या अशुभ मागे से व्यय होगा । इसमें स्वगृही उच्च मित्रक्षेत्री

आदि ग्रह का फल पुष्ट होगा नोच, अस्त शत्रु गृ हो आदि ग्रह हो तो तुच्छ फल होगा ।

३--दुष्ट कार्य में खर्चे-व्ययेशा नीचगृहो, क्रर या शत्र ग्रहों से युक्त हो या स्वयं

क्र ग्रह हो तो जातक दुष्ट स्थान में दुष्ट कार्य में व्यय करता है । वह तिदित दरिद्र

ओर दुःखी भी होता है ।

मिउव्ययी सुखो- व्ययेश शुभ ग्रह हो, शुम स्थान गत हो, व्यय में शुभ ग्रह हो

ओर नवम दशम स्थान से भी सम्बन्ध हो तो जातक मितव्यय करता है और सुखी

रहता है । 4

कृषकघर्मी नेत्र रोगी-व्यय में शुभग्रह हो तो त्यागी, कृषक और धर्मात्मा हो । व्यय

में पापग्रह हो तो विवादो, बात व्याधि के कारण नेत्र रोगों चपल ओर घूमने वाला हो।