भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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| हा > युक्‍त गुणवान्‌ हो । (स० चि०) 1

३७२ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतोय फित खण्ड

३९--ऊग्नेश पारिजात में सुखी, वर्गोत्तम में निरोग, गौरपुर में-घन-घान्य पूणं,

(सहासन में-राजा हो, लग्नेश पारावत में-विद्वान्‌, लग्नेश देवलोक में-श्रोमान्‌, लग्नेशः

ऐरावत में-विख्यात और राजमान्य (qo पा० )।

४०--लर्नेश से १२ वें उसके उच्च स्थान या मित्र राशि हो, मित्र या उच्च

ग्रह से दृष्ट हो या लग्नेश का मित्र ग्रह उसको राशि में हो तो-उसकी स्थित जन्म भूमि

में हो (जा० पारि०) ।

४१--लस्नेश से १२ वें स्थान का स्वामी लग्नेश का शत्रु हो ओर यदि वह नीच में

हो या निबंछ हो ओर उस पर शुक्र की दृष्टि हो तो-बिदेश में जाय ।

४२--ऋम्नेश से १२ वें स्थान का स्वामी सूर्य से अस्त हो तो उसो जगह रहे और

छोटे ग्राम में निवास करे । यदि बलवान्‌ हो तो शहर में निवास करे (जा० पारि०) ।

४३--रमणीय भूमि में वास-ऊग्नेश से व्ययेश यदि लग्न से केन्द्र या कोण में हो

अपने उच्च या मित्र ग्रह में हो उसके दोनों ओर शुभ ग्रह हो तो रमणीय भूमि रें

वास हो ।

उदाहरण-यहाँ लग्नेश चंद्र लाभ में

है । छाम का व्ययेश यहाँ दशमेश मंगल है

जो लग्न से त्रिकोण नवम में अपने मित्र

गुरु के घर में है इसके दोनों ओर शुभ

ग्रह गुर और शुक्र हैं (जा० पारि०) ।

४४--जन्म भूमि में वास, तीथं आदि दिव्य स्थान प्राप्त-यदि उसके दूसरे या छठे

स्थान पर गुरु चंद्र या शुक्र की दृष्टि हो तो जन्म भूमि में वास करे और दिव्य स्थान

तीर्थ आदि प्राप्त हो (जां० पारि०) 1

४५--स्वदेश में भाग्य-लग्नेश स्थिर राशि में हो, लग्न स्थिर हो स्थिर ग्रह युक्त

हो तो अपने ही देश में भाग्योदय हो ( स० चि० )! !

४६--मूखं--लग्नेश होन बळ, नीच अस्तगत आदि हो ।

४७--सत्कीति युवत-लग्नेश दशम में उच्च का हो । लग्न में qq शुभ ग्रह

युक्त हो।

४८- दीर्घायु, घनी आदि-छग्नेश शुभ ग्रह युक्त उच्च का केन्द्र त्रिकोण में शुभ

ग्रहों से दुष्ट हो या दशमेश से युक्त हो तो उत्तम ऐइवयं उत्तम कोति दोर्घायु घन युबत

हो (go चि०)।

४९--दीर्घायु घनी गुणी-रूग्नेश अति बलवान्‌ हो, पाप ग्रह को दृष्टि न हो, केन्द्र

में हो, शुम ग्रह की दृष्टि हो तो मृत्यु को हटा कर दोर्घायु करता हूँ। श्रेष्ठ लक्ष्मी