भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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भावेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल : ३७३

_ ९०--दौर्धायु सुखी निरोग-लग्नेश तथा गुर केन्द्र में हो । केन्द्र त्रिकोण ओर अष्टम म पाप ग्रह न हो-तो अनेक सुख भोग करे, पुण्यकर्मा हो निरोग रह कर १०० वर्ष की

आयु पावे (स० चि०) 1

2 ५१--अल्पायु आदि-लग्नेश से अष्टमेश अधिक बली हो, केन्द्र, अष्टम, छठे स्थान

सें पाप ग्रह हो तो अल्पायु या मध्यम आयु होवे, अनेक संकट भोगे ।

५२-३० वर्ष बाद सुंख-लग्नेश जिस नवांशक में है उसका स्वामी केन्द्र त्रिकोण या उच्च में हो वैसे ही लामेशसे भी युक्त हो तो ३० वषं के बाद सुख मिळे (go चि०)।

५३-२० वषं बाद सुख-छग्नेश या जिस अंशक में लग्नेश है उसका स्वामी दूसरे

भाव में हो या ऐसा ही लामेश भी हो तो २० वर्ष बाद सुख मिले (go चि०)।

५४-१६ वषं बाद सुख-लग्नेश शुभ ग्रह की राशि में हो उसे शुम प्रह देखे या

गोपुरां में हो तो १६ वषं के पश्चात्‌ सुखी हो (go feo) ।

५५--जीवन भर सुखो-लग्नेश वर्गोत्तमांश में या उच्चांशक में व मित्र द्रेष्काण

में शुभ ग्रह से युक्त या दुष्ट हो तो जीवन पयंन्त सुखी <ë (स० चि०) 1

५६--दुःख के बाद सुख- लग्नेश उत्तमांश में हो, लग्न में शुभ ग्रह हो, घन स्थान में

पाप ग्रह हो, केन्द्र में भो पाप ग्रह हो तो प्रथम दुःख पीछे सुख (ae चि०)।

५७-बाल्प्रावस्था में सुख-लग्नेश उत्तमांशमें हो लग्न में पाप ग्रह घन स्थान में

शुभ ग्रह तथा नवम स्थान में कोई शुभ ग्रह हो तो बाल्यावस्था में सुख मिले अन्यथा

नहीं मिले (qo चि०)।

५८--यशस्वी घनी-लग्नेश चर राशि में हो ओर शुम ग्रहों से दुष्ट हो तो-यशस्वी

चनी, भोगी ओर सुखी हो (qo पा०)।

५९--मुख में ब्रण-लग्नेश मंगल या वुध को राशि में किसी भाव में बुघ से युफ्त

q दुष्ट हो तो मुख में व्रण हो (qo पा०) 1

३०--लग्नेश और षष्ठेश-यदि चन्द्र के होरा द्रेष्काण नवांश व द्वादशांश में

हो-जळ में इबने का भय । यदि बुघ के होरा द्रेष्काण नवांश व द्वादशांश में हो-बात

व्याधि, कष्ट। यदि शनि के होरा द्रेष्काण नवांश व द्वादशांश में हो-सन्निपात

आदि व्याधि । यदि शुक्र के होरा द्रेष्काण नवांश व द्वादशांश में हो-वीर्य विकार

(त्रि० ज्यो०) ।

(२) भिन्न-भिन्न भावों में धनेश का फल

१--लग्न में घनेश-बड़ा कृपण, व्यवसाय करने वाला, सत्कर्मी, घनवान्‌, घनी

होने से प्रसिद्ध, अनेक भोगों का भोगने वाळा ( मान० ) (जा० सं० ) । पुत्रवान्‌,

छुटुम्वियो का विरोध, कामी, निठुर, परकार्यं कर्ता ( qo पा० ) 1

२--धन में घनेश-च्यवसाय करने वाळा, उत्तम लाम, उत्तम वस्तुओं का भोगी,

आसंगिक बातों को सत्य करने वाला, बड़ा नीच, सत्यवादी, प्रसिद्ध, बड़ा उद्वेगी (मान०) ।

घमं कर्म में तत्पर, घनी, लाभ से पूण, लोभी, दानी ( जा० सं० ) । शुभ युक्त या