भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 418 में से

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३७६ :.ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

तात गुरु हो घन भाव में हो या मंगल के साथ हो तो धन￾वान्‌ हो ।

८- घनवान्‌-घनेश लाभ में या लामेश धन में हो या वे दोनों केन्द्र त्रिकोण मे हों

तो घनवान्‌ हो ( qo पा० ) ।

९--निर्घन-धनेश और लामेश षष्ठ भाव में हो तथा घन भाव और लाभ भाव

पाप युक्त हो तो निर्घन हो । (qo पा०)

१०--घन हीन-घनेश लामेश दोनों अस्त या पाप युक्त हों तो जन्म से हो घन

हीन हो (qe पा० ) ।

११--राज दंड से घन नाश-धनेश छामेश दोनों ६-८-१२ भाव में हों, ११ में

मंगल २ में राहु हो तो राज दंड से घन नाश हो ( qo पा० ) ।

१२--घमे कायं में व्यय--घनेश शुभग्रह युक्त हो, लाम में गुर, घन भाव में शुक्र

हो, व्यय में शुभग्रह हो तो घमं कार्य में व्यय हो ।

१३--परोपकारो विख्यात--धनेश् यदि स्वगृही या उच्च में हो तो परिवार पालक,

परोपकारी और विख्यात हो (qo पा०) ।

१४--सम्पत्ति प्राप्त-षनेश पारावतांश्ादि शुभव्ग में हो या शुभग्रह युक्त हो तो

उसके घर में विना प्रयत्न के ही सब सम्पत्ति का आगमन हो (qo पा०)।

१५--सुलोचन-घनेश (नेत्र भाव पति) वली और शुभ युक्त हो तो सुलोसन हो।

१६-नेत्ररोगी-धनेश ६-८-१२ में हो तो नेत्र रोगी हो (qo पा.) `

१७--रोगी असत्यवक्ता-धनेश या धन भाव यदि पापग्रह युक्त हो तो वह चुगुल￾खोर रसत्यत्क्ता ओर वात रोगी हो (qe पा०) ।

१८- नेत्र रोगी-घनेश शुक्र से युक्त या शुक्र के घर में या त्रिक स्थान में हो चाहे

इनसे कोई संबंध हो तो नेत्रों से विपरीत भाव होता है, अपने उच्च या स्वगृही ग्रह हो

तो यह दोष नहीं होता, ६-८-१२ स्थानों को छोड़कर अत्यन्त शुभ होता है ।

(३) तुतोयेश का प्रत्येक भाव में फल

१-छग्न में तुतीयेश-बातचीत करने में प्रत्येक से झगड़ा करने वाला (मान०) ।

वचनविवादी, लम्पट, स्वजनों का भेदन कर्ता, सेवाकर्ता, बुरे मित्र, क्रूर (जा० सं०) ।

स्वयं घन उपार्जन करने वाळा, सेवा जानने वाळा, साहसी, विना पढ़ा लिखा भी बुद्धि-

मान्‌ होता है । (go पा०)।

२--घन में तृतीयेश-पापग्रह हो-भीख मांगने वाला, दरिद्र, अल्प जीवन, स्वकु- टुम्बियो से विरोध करने वाला । शुभग्रह हो तो घनाळ्य (मान०) । यदि पापग्रह हो भिक्षुक, निधन, अल्पायु, बंधु विरोध कर्ता । शुभग्रह हो तो qg बली तथा शक्तिशाली

हो (जा० सं०) । स्थूल देह, बलहीन, थोड़ा कार्य आरम्म करने वाला, सुखहीन, पर- स्त्रीगामी (qo पा०) ।

३-तृतीय में तृतीयेश--सतगुणो, अच्छे मित्र, श्रेष्ठ कुटुम्बी, देवगुरु जनों का सेवक

राजा से लाम करने वाला (मान०) । पुरुषों के समान पराक्रम, सबका मित्र, देवगुर

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