सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 391, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंभावेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल : ३७५
१०--दशम में घनेश-राजाओं का मान्य, राजा से लक्ष्मी प्राप्त । शुभग्रह हो तो
माता पिता का पालन कर्ता (मान०) राजाओं का मान्य तथा राजा हो । शुभग्रह हो-
न पिता का पालक, कामी, मानी, पंडित, बहुत स्त्री और घन से युक्त किंतु पुत्र सुख
से होन ।
११--लाभ में घनेश-ग्रहों का जानने वाला, पक्षियों के व्यौहार में प्रसिद्ध, लक्ष्मी
का स्वामी, लोक समूह के पालन करने में सदा तत्पर या नामवर, (मा०) । व्यौहार
में निपुण, लक्ष्मी का पति, विख्यात, बहुतों का पालक, लोक में विख्यात (जा० सं०) ।
सब प्रकार लाभ करने वाला, सदा उद्योगी, मानी, यशस्वी (qo पा०) ।
१२--व्यय में घनेश-क्रूर हो तो महा कृपण, घन होन । शुभ हो तो कभी हानि
कभी लाभ (मान०) । अष्टकपाली, परदेश में समृद्धि वाला । पापग्रह हो-- बुरे कर्म
करने वाला, शुभग्रह हो -तो संग्रह कर्ता (जा० सं०) साहसी, घन होन, दुसरे के
आश्रित जीवन, उसकी ज्येष्ठ संतति नहीं जीती । (ao पा०) ।
(र) द्वितीयेश का विशेष फल
१--गुणी घनी आदि-द्वितीयेश छनन में हो और शुभ ग्रह दूसरे में हो तो-गुणी,
उन्नतिशोल, कुटुम्बी हो, घनी, दूरदर्शी और सुमुख हो ।
२--द्वितीयेश सूयं से संबंधित हो तो जनता को अधिक सहायता पहुँचाने वाला हो
ज्ञान और घन प्राप्त करे।
शनि से हो तो--उसकी विद्या अल्प हो वह क्षुद्र हो ।
गुरु से हो तो--वैदिक घर्म शास्त्र में निपुण हो ।
बुघ से हो तो--अथं शास्त्र में चतुर ।
शुक्र से हो तो--एगार सम्बन्धी कार्य में चतुर ।
चंद्र से हो तो--काल के सम्बन्ध में कुछ ज्ञान हो ।
मंगल से हो तो--५र कला ओर पिशुनता ( चुगल खोरी ) में निपुण ।
राहु से हो तो--अस्पष्ट भाषी अर्थात् शुद्ध शब्द न बोल सके ।
केतु से हो तो--असावधानी से चलने वाला, झूठ बोलने वाला ( फल दो०)।
३--धनेश चन्द्र हो घन में हो-घन सम्बन्धी सूत्र प्रयोग व योग करने को विद्या
आवे, गणित भी अच्छा आवे, लाल नेत्र, केश भूरे, चपल हो ( qe यो० )।
४--घनेश का नवांद-घनेश कहीं हो केवल जिस भाव के नवांश में वह हो वही
अपने अधिकार प्रमाण से घन भाव में सब बातें देता है। या घन भाव में जो ग्रह हो
चे फल देते हैं ( प्रा० यो० ) ।
५- घन वृद्धि-घनेश घन भाव या त्रिकोण में हो तो घन वृद्धि हो, ६-८१२ माव
में हो तो घन हानि हो (ao पा० ) ।
६ -पूर्ण घन छाम-घनेश केन्द्र में हो उससे त्रिकोण में लामेश हो या गुरु शुक्र से
युक्त हो तो पूर्ण लाभ द्वोता है । ( वृ० पा० ) 1