भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

भावेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल : ३७५

१०--दशम में घनेश-राजाओं का मान्य, राजा से लक्ष्मी प्राप्त । शुभग्रह हो तो

माता पिता का पालन कर्ता (मान०) राजाओं का मान्य तथा राजा हो । शुभग्रह हो-

न पिता का पालक, कामी, मानी, पंडित, बहुत स्त्री और घन से युक्त किंतु पुत्र सुख

से होन ।

११--लाभ में घनेश-ग्रहों का जानने वाला, पक्षियों के व्यौहार में प्रसिद्ध, लक्ष्मी

का स्वामी, लोक समूह के पालन करने में सदा तत्पर या नामवर, (मा०) । व्यौहार

में निपुण, लक्ष्मी का पति, विख्यात, बहुतों का पालक, लोक में विख्यात (जा० सं०) ।

सब प्रकार लाभ करने वाला, सदा उद्योगी, मानी, यशस्वी (qo पा०) ।

१२--व्यय में घनेश-क्रूर हो तो महा कृपण, घन होन । शुभ हो तो कभी हानि

कभी लाभ (मान०) । अष्टकपाली, परदेश में समृद्धि वाला । पापग्रह हो-- बुरे कर्म

करने वाला, शुभग्रह हो -तो संग्रह कर्ता (जा० सं०) साहसी, घन होन, दुसरे के

आश्रित जीवन, उसकी ज्येष्ठ संतति नहीं जीती । (ao पा०) ।

(र) द्वितीयेश का विशेष फल

१--गुणी घनी आदि-द्वितीयेश छनन में हो और शुभ ग्रह दूसरे में हो तो-गुणी,

उन्नतिशोल, कुटुम्बी हो, घनी, दूरदर्शी और सुमुख हो ।

२--द्वितीयेश सूयं से संबंधित हो तो जनता को अधिक सहायता पहुँचाने वाला हो

ज्ञान और घन प्राप्त करे।

शनि से हो तो--उसकी विद्या अल्प हो वह क्षुद्र हो ।

गुरु से हो तो--वैदिक घर्म शास्त्र में निपुण हो ।

बुघ से हो तो--अथं शास्त्र में चतुर ।

शुक्र से हो तो--एगार सम्बन्धी कार्य में चतुर ।

चंद्र से हो तो--काल के सम्बन्ध में कुछ ज्ञान हो ।

मंगल से हो तो--५र कला ओर पिशुनता ( चुगल खोरी ) में निपुण ।

राहु से हो तो--अस्पष्ट भाषी अर्थात्‌ शुद्ध शब्द न बोल सके ।

केतु से हो तो--असावधानी से चलने वाला, झूठ बोलने वाला ( फल दो०)।

३--धनेश चन्द्र हो घन में हो-घन सम्बन्धी सूत्र प्रयोग व योग करने को विद्या

आवे, गणित भी अच्छा आवे, लाल नेत्र, केश भूरे, चपल हो ( qe यो० )।

४--घनेश का नवांद-घनेश कहीं हो केवल जिस भाव के नवांश में वह हो वही

अपने अधिकार प्रमाण से घन भाव में सब बातें देता है। या घन भाव में जो ग्रह हो

चे फल देते हैं ( प्रा० यो० ) ।

५- घन वृद्धि-घनेश घन भाव या त्रिकोण में हो तो घन वृद्धि हो, ६-८१२ माव

में हो तो घन हानि हो (ao पा० ) ।

६ -पूर्ण घन छाम-घनेश केन्द्र में हो उससे त्रिकोण में लामेश हो या गुरु शुक्र से

युक्त हो तो पूर्ण लाभ द्वोता है । ( वृ० पा० ) 1

३७६ :.ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

तात गुरु हो घन भाव में हो या मंगल के साथ हो तो धन￾वान्‌ हो ।

८- घनवान्‌-घनेश लाभ में या लामेश धन में हो या वे दोनों केन्द्र त्रिकोण मे हों

तो घनवान्‌ हो ( qo पा० ) ।

९--निर्घन-धनेश और लामेश षष्ठ भाव में हो तथा घन भाव और लाभ भाव

पाप युक्त हो तो निर्घन हो । (qo पा०)

१०--घन हीन-घनेश लामेश दोनों अस्त या पाप युक्त हों तो जन्म से हो घन

हीन हो (qe पा० ) ।

११--राज दंड से घन नाश-धनेश छामेश दोनों ६-८-१२ भाव में हों, ११ में

मंगल २ में राहु हो तो राज दंड से घन नाश हो ( qo पा० ) ।

१२--घमे कायं में व्यय--घनेश शुभग्रह युक्त हो, लाम में गुर, घन भाव में शुक्र

हो, व्यय में शुभग्रह हो तो घमं कार्य में व्यय हो ।

१३--परोपकारो विख्यात--धनेश् यदि स्वगृही या उच्च में हो तो परिवार पालक,

परोपकारी और विख्यात हो (qo पा०) ।

१४--सम्पत्ति प्राप्त-षनेश पारावतांश्ादि शुभव्ग में हो या शुभग्रह युक्त हो तो

उसके घर में विना प्रयत्न के ही सब सम्पत्ति का आगमन हो (qo पा०)।

१५--सुलोचन-घनेश (नेत्र भाव पति) वली और शुभ युक्त हो तो सुलोसन हो।

१६-नेत्ररोगी-धनेश ६-८-१२ में हो तो नेत्र रोगी हो (qo पा.) `

१७--रोगी असत्यवक्ता-धनेश या धन भाव यदि पापग्रह युक्त हो तो वह चुगुल￾खोर रसत्यत्क्ता ओर वात रोगी हो (qe पा०) ।

१८- नेत्र रोगी-घनेश शुक्र से युक्त या शुक्र के घर में या त्रिक स्थान में हो चाहे

इनसे कोई संबंध हो तो नेत्रों से विपरीत भाव होता है, अपने उच्च या स्वगृही ग्रह हो

तो यह दोष नहीं होता, ६-८-१२ स्थानों को छोड़कर अत्यन्त शुभ होता है ।

(३) तुतोयेश का प्रत्येक भाव में फल

१-छग्न में तुतीयेश-बातचीत करने में प्रत्येक से झगड़ा करने वाला (मान०) ।

वचनविवादी, लम्पट, स्वजनों का भेदन कर्ता, सेवाकर्ता, बुरे मित्र, क्रूर (जा० सं०) ।

स्वयं घन उपार्जन करने वाळा, सेवा जानने वाळा, साहसी, विना पढ़ा लिखा भी बुद्धि-

मान्‌ होता है । (go पा०)।

२--घन में तृतीयेश-पापग्रह हो-भीख मांगने वाला, दरिद्र, अल्प जीवन, स्वकु- टुम्बियो से विरोध करने वाला । शुभग्रह हो तो घनाळ्य (मान०) । यदि पापग्रह हो भिक्षुक, निधन, अल्पायु, बंधु विरोध कर्ता । शुभग्रह हो तो qg बली तथा शक्तिशाली

हो (जा० सं०) । स्थूल देह, बलहीन, थोड़ा कार्य आरम्म करने वाला, सुखहीन, पर- स्त्रीगामी (qo पा०) ।

३-तृतीय में तृतीयेश--सतगुणो, अच्छे मित्र, श्रेष्ठ कुटुम्बी, देवगुरु जनों का सेवक

राजा से लाम करने वाला (मान०) । पुरुषों के समान पराक्रम, सबका मित्र, देवगुर

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nition

भावेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल : ३७७

जनों का पूजक, शुभाचार, राजा से लाम (जा० सं०) 1 सहोदर से सुखी, घन पुत्र से

युक्त, अधिक सुख भोगी (qo पा०) ।

४चुर्थ में तृतोयेश-पिता तथा भाई बंदों के साय सुख भोगने वाला, माता के

साथ वेर करने वाला, पिता के घन का नाशक (मान०) । पिता को आनन्द और सुख￾कर्ता । माता पिता का उदय कर्ता। माता के साथ वर, पिता का बन भक्षण करने वाला (जा० सं०) । सुखी घनी, बुद्धिमान्‌, दुष्ट स्त्री का पति (वृ० पा०) 1

५--पंचम में तृतोयेश-पुत्र, भाई बंदों के पुत्र ओर सहोदार द्वारा पालन करने

लायक, दीर्घायु, परोपकार में बुद्धि (मान०) । अच्छे बांववों बाला, सहोदर त्राताओ

से पाला जाने वाला, बड़ी आयु वालः, पर जनों का उपकार कर्ता (जा० सं०) । पुत्रबान्‌

गुणी, यदि पापयुक्त हो तो दुष्ट स्त्रो का पति हो (qo पा०) |

६--षष्ठ में तृतीयेश-भाई बंधुओं का विरोधी, नेत्र का रोगो, अकस्मात्‌ मुमि

राभ, रोग व्याप्त (मान०) (जा० áo) 1 भाई से शत्रुता करने वाला, बड़ा बनी,

मामा से शत्रुता और पापो से प्रेम करने वाला (वृ०.पा०) ।

७--पप्तम में तृतीये थ-सुशोला, सोमाग्यवतो स्त्रो हो, कूर ग्रह हो तो देवर के

घर में रहने बाली हो (मान०) 1 राजा का सेवक, वास्यावस्या में दुःखी, अंत में

सुखी (बृ० पा०) 1 ८--अष्टम में तृतीयेश-भाई मरे । यदि पापग्रह हो तो बांह को पीडा से दुःखो,

८ वषं जीवे (मान०) । मरे हुए सदाहर भ्राताओं वाला । पापग्रह हो तो ८ वर्ष दक

जी सके तो भुजा से होन अंग वाला हा (जा० सं०) । चोर, नोकरो करने वाला,

राजा के द्वारा मरण पाने वाला (qo पा०) ।

९---नवम में तुतीयेश--माई बंदों से होन। शुभग्रह हो-बांवव जन सज्जन हों

स्वयं विद्वान्‌ और सहोदर भाई का भक्त (मान०) । पुण्यवान्‌, सगे भाई से स्नेद करने

बाला, बांघवों से पराजित होता है । शुमग्रह हा-अच्छे वांधवों से युक्त अच्छे कायं करने

चाला, अआताओं का भक्त (जा० सं०) । पिता के gq से होन, स्तो के दारा भाग्योदय,

पुत्रादि से युक्त (qo पा०) ।

१०--दशम में तृतीयेश-राजाओं का पुज्य, भाता पिता भाई बंबुओं का मक्त,

उत्तम बुढि, सब बंघुओं से मेल (मान०) । राजा से सत्कार पाने वाला, बांबवो का

भक्त, उत्तम बांघव जनों से मान्य, अच्छे निश्‍चय वाला (जा० सं०)। सब प्रहार से

सुखो, अपने पराक्रम से घन कमाये, दुष्ट स्त्रियों को पालने बाला (वृ० पाऽ) 1

११--छाम में तृतीयेश-सत्पात्र, बांधवों से युक्त, किसी राजा के द्वारा शोमा पाने

वाला, भाई बंदों का सेवक, मोग विलास युक्त (मान०) 1 अच्छे ahaqi से युक्त, बांघवों

से पूज्य, सेवा चाहने बाला, भोगवान्‌ (जा० सं०) व्यापार में बनी, विद्याहोन भी

बुद्धिमान्‌, साहसो ओर दूसरों को सेवा करने याला (बुर पाऽ)

१२--व्यय में तृतीयेश-मिन्रों से विरोध करने बाला, आई बंदों को संताप देने

३७८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

वाला, भाई बंदों से दूर भागने पर बहुत काल तक परदेश में रहने वाला (मान०) t

स्त्रियों से विरोध करने वाला, अच्छे वांघवो से विरोध वर्ता, संतापकर्ता, दूर के बसाये

हुए बंधु वाला, विदेश गामी (जा० सं०) । कुकाय॑ में खर्च करने वाला, उसका पिता

क्र होता ë तथा पत्नी द्वारा भाग्योदय होता है। (go पा०) 1

३--तृतीयेश का विशेष फल

१--सहोदर सुख-तृतीयेशञ या मंगल तीसरे भाव को देखता हो या उसमें हो तो

सहोदरों का सुख हो (वु० पा०) ।

२--सहोदर नाश-तृतीयेश और मंगल दोनों पाप युक्त पाप राशि में हो तो सहोदरों

का नाश (qo पा०) 1

३--वंधुनो से होन-तृतीयेश q मंगल व दोनों लग्न से त्रिक में हो (जा० लकार) ।

४--बंघुमो वाला-तृतोयेश स्वस्थानी होकर शुभग्रहों से दृष्ट हो (जा० सं०) ।

५--बंघुओं से बहुत सूख-तृतीयेश शुभग्रह युक्त केन्द्र में हो (जा० लं०)। |

६--बंधुनो से सुख नहीं-तृतीयेश पापयुक्त या दृष्ट होकर केन्द्र में ।

७--सहोदर सुख-तृतीयेश और मंगल दोनों केन्द्र या कोण में हो या अपने उच्च

या मित्र गृह में हो (qo पा०) ।

<--छोटे सहोदरों का अभाव, बड़े ३ सहोदर-भ्रातू कारक ग्रह राहु से युक्त हो

और तृतीयेश नीच में हो तो छोटे सहोदरों का अभाव और बड़े ३ सहोदर समझना

(ुण्पा०)। `

९--१२ सहोदर-तृतीयेश केन्द्र में हो और भ्रातृ कारक ग्रह उसके त्रिकोण में यदि

गुरु के साथ उच्च में हो तो १२ सहोदर हों उसमें जातक बड़े २ और तीसरा सातवां

नवां और बारहवां ये अत्पायु होंगे शेष ६ सहोदर दीर्घायु होते हैं ।

१०--शूर धैयंवान्‌ साहसी आदि--तृतीयेश और लग्नेश एक दूसरे के स्थान में हों

शौर बलवान्‌ हों तो जातक श्र, धेयंवान्‌, अपने भाइयों का सहायक, और साहसी होता

है (फल०) ।

११-भाइयों की उन्नात-तृतीयेश बळी हो शुभग्रह से युक्त हो और उस भाव का

कारक भी शुभ घर में हो--तो भाइयों की उन्नति हो । भाइयों की हानि-यदि बलहीन

हो और बुरी स्थिति में हो तो भाइयों की हानि हो ।

१२--भाई संस्या-तृतीयेश और कारक दोनों विषम राशि में हों गुरु सूय और मंगर की दृष्टि हो और तीसरे घर मे विषम राशि हो तो नवांश से जितना मालूम हो उतने भाई होंगे ।

१३--बहिन या भाई तृतीयेश स्त्रीग्रह हो, या तृतीय में स्त्रीग्रह हो तो-बहिन

होगी तृतीयेश पुरुष ग्रह हो, या तृतीय में पुरष ग्रह हो तो-भाई होगा । स्त्री ओर पुरुष अहोंका मिश्रण हो तो भाई बहन दोनों हों इसमें बल अबल दृष्टि आदि का भी विचार

करना।

(३७९)

दानि दशा वर्ष १० गुरु वर्ष १९ राहु वर्ष १२ शुक्र वर्ष २१

व. मा. दि. घ. व. मा. दि. घ. ब. मा. दि. घ. व. मा. दि. घ.

ह०० ११ ३२० गुरु ३ ४ ३२० राहु ४ ०० qv १ ००

गुस १ ९ ३२० राहु २ ११० ० शुक्र ४ ०० सूर्यं १ २ ००

राहु १ ११० ० शुक्र दे ८१० ० सूर्य ० ८ ०० चंद्रर ११ ००.

शुक्र १ १११० ० सूर्य ०२० ० चंद्र१ ८ ०० मं०१ ६ २००

सूर्य ० ६२० ० चंद्र २ ७ २० ० मं०० १० २० ० शुक्र ३ ३२००

चंद्र १ ४२० ० qoq ४२६ ४० बुघ १ १० २०० mo १ ११ १००

मं० ० ८२६४० qq २११२६४० श० १ ११०० गुरु रे ८१००

बुध१ ६२६४० श०१ ९ ३२० गुरु २ ११०० राहु रे ४ ०९

यो, १०० ० ० १९ ० ० ० १२ ० ०० q ० ००

अष्टोत्तरी दशा की प्रत्यंतर दशा निकालना

अन्तर्दशा के समय में १०८ का भाग देने से प्रत्यन्तर दशा का ध्रवांक बन जाता

है उसमें ग्रह वर्ष से गुणा करने से प्रत्यन्तर दशा का समय निकल जाता है परन्तु इस

प्रकार गणित में कुछ असुविधा होतो है इससे नीचे बताये प्रकार से प्रत्यन्तर दशा

निकाल लेना ।

प्रत्येक अन्तर ग्रह के वर्ष मास आदि के दिन बना लेना ओर जिस ग्रह का अन्तर

दशा का प्रत्यन्तर निकालना है उस ग्रह को अन्तर दशा के वर्ष से प्रत्येक में प्रथम￾प्रथम गुणा कर १०८ का भाग देने से प्रत्यन्तर का समय निकल आयेगा ।

उदाहरण

सुर्य में सूर्य के अन्तर को प्रत्यन्तर को दशा ।

अह अन्तर दशा दिन सूर्य गुणन प्रत्यन्तर समय

मास दिन वर्ष फ़ल [दन घडी पल

सूर्यं ४-० =१२० १२८६ २२७२० =१०८= ६ ४० ०

sg १०- ० = ३०० x६ = १८०० =१०८= १६ ४० ०

मंगल ५-१० = १६० x६ =९६० +१०८८ ८ ५३ २०

बुष ११-१० = ३४० २६ २०४० *१०८=१८ ५३ २०

शनि ६-२० = २०० >६ =१२०० =१०८=११ ६ ४०

गुरु १२-२० = ३८० ३६ =२२८० =१०८=२१ ६ ४०

राहु ८-० = २४० ५६६ =१४४० =१०८=१३ २० ०

शुक्र १४- ० न” ४२० x६ 5२५२० =+१०८=२३ = २० ०

योग १२०-० ¬ ०

३८० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

पराक्रमी, नौकरों से युक्त, उदार, निरोग, गुणी, दाता भोर स्वभुजोपाजित घन

चाला (वृ० पा०) ।

( ४ ) चतुर्थ में चतुर्थेश--पिता, राजा, स्वामो, इनका मान करने में तत्पर

पिता से लाभ, स्वघर्म में सावधान तथा सुखी (जा० सं० ) ।

पिता को राज्य से मान कराने वाला, जाति में विदित, पिता द्वारा धन लाभ,

सुधर्म करने वाला, सुखी, घनवान्‌ ( मान )!

राजमंत्री, सबं घन सम्पन्न, चतुर, सुशील, मानी, ज्ञानी, स्त्री का श्रिय, और

सुखी ( वृ० पारा० ) ।

(५) पंचम में चतुर्थेश-पिता के लाभ से भोग वाला, दीर्घायु, राजा से विख्यात, पु

से लाभदायक ( जा० सं० ) । पिता से लाभ, दीर्घायु, कर्तव्यों द्वारा प्रसिद्ध, पुत्रवान्‌,

पुत्रों का पालक ( मान० ) । सुखी, सबका प्रिय, विष्णु का भवत, गुणी, मानी, स्व

उपाजित घन ( वु० पारि० ) ।

( ६) षष्ठ में चतुर्थेश--पिता के घन का नाशक, पिता से वैर कर्ता, पाप तो

पिता को दोष करने वाला, शुभ हो तो पुत्र घन का संचय करने वाला ( जा० सं० ) ।

थापग्रह--माता के घन का नाशक, पिता के दोषों के करने में रत । शुभ रह

घन का संचय कर्ता ( मान० ) ।

माता के सुख से हीन, क्रोधी, चोर, व्यभिचारी, स्वच्छन्द, दुष्ट हृदय (qe पा०) à

७--सप्तम में चतुर्थेश-पाप ग्रह हो तो सुख से इवसुर को नहीं पाळता, शुभग्रह

हो तो पालनकर्ता । बली हो तो कुलपति हो (जा० सं०) । पापग्रह हो तो स्त्री अपने

इवसुर की सेवा नहीं करती, शुभग्रह हो तो पालन करने वाली होती है ( मान०) ।

बहुत विद्या का ज्ञाता, पैतृक घन को त्यागने वाला, सभा में गुँगा के समान ।

८--अष्टम में चतुर्थेश-ऋर, रोगी, दरिद्र, बुरे कर्म, मृत्यु प्रिय ( जा० सं० ) ।

क्रूर स्वभाव, रोगी, दरिद्र, दुष्कर्म कर्ता, इन्हो सब कारणों से उसे मरना अच्छा लगता

है (मान०) । चर स्त्री आदि के सुख से हीन, माता-पिता से भी अल्प सुख, नपुंसक

समान ( qo पा० )।

९--नवम में चतुर्थेश-सत्संगी, समस्त विद्याओं से युक्त, पिता के धमम का संग्रहकर्ता,

"पिता के तीर्थ का चाहने वाला (ज॥० सं०) । पिता से पृथक-पृथक रहने वाला, समस्त

विद्याओं का ज्ञाता, पितृ घमं का संग्रह कर्ता, पिता के व्यवहार से पृथक (मान०)। सबका

प्रिय, देवो का भक्त, गुणी, मानी, सवंसुख युक्त (qo पा०) ।

१०--दशम में चतुर्थेश-पापग्रह हो तो पुत्र माता को त्याग दे और कन्या का

“प्यारा होता है, पापग्रह हो तो उसको और उसकी माता को छोड़ दे ओर दूसरी कन्या

से विवाह कर छेता है । शुभग्रह हो तो अन्य विवाह न करने वाला एवं दूसरी स्त्री के

साथ रहने वाला हो (मान०)। राजमान्य, रसायन ज्ञाता, अति प्रसन्न, सुखी,

जितेन्द्रिय (वृ० पा० )1

(३८१)

सूर्य में शनि के अन्तर का प्रत्यन्तर

ग्रह मा. दि घ. प. वि.

शनि ० १८ ३१ ६ ४०

गुरु १ ५ ११ ६ ४०

राहु ० २२ १३ २० ०

शुक्र १ ८ ५३ २० ०

सूर्य ० ११ ६४० ०

चन्द्र ० २७ ४६ ४० ०

मंगल ० १४ ४८ ५३ २०

बुध १ १ २८ ५३ २०

योग ६ २० २ ० ०

सूर्य में राहु के अन्तर का प्रत्यंतर

ग्रह मा. दि घ. प. वि.

राहु ० २६ ४० ०

शुक्र सूर्य

१ १६ ४० ० ०

स ० १३ Qo ० ०

` चन्द्र १ रे २० ० ०

मंगल ० १७ ४६ ४० ०

बुध १ ७ ४६ ४० ०

शनि ० qq १३ २० ०

गुर १ १२ १३२० ०

योग ८ ० ० ० ०

चन्द्र में चंद्र के अंतर का प्रत्यंतर

ग्रह मा. .दि. घ. प. वि.

चंद्र ३ १४ १० ०

मगल १ २५ ३३ २० बुघ ३ २८ ३ २० शनि २ ९ २६ vo गुर ४ ११ ५६ ४२ राहु २ २३ २० ० शुक्र ४ २५ ५० ० सूर्यं १ १ ४० ०

योग २५ ० ० ० | ०००००० ० O

सूर्य में गुरु के अन्तर का प्रत्यंतर

ग्रह मा. दि. घ. प. वि.

गुर २ ६ ५१ ६ ४०

राहु १ १२ १३ ०

शुक्र २ १३ ५३३० ०

सूर्य ० २१ ६ ४० ०

चन्द्र १ २२ ४६ ४० ०

मंगल ० २८ ८ ५३ २०

बुघ १ २९ ४८ ५३ २०

शनि १ ५ ११ ६ ४०

१२ २० ० ० ०

सूर्य में शुक्र के अन्तर का प्रत्यन्तर

ग्रह मा. दि. w. प. वि.

शु २ २१ ४० ० ०

सूर्यं ० २३ २० o ०

चन्द्र १ २८ २० ० ०

मंगल १ १२ ६४० ०

बुध २ ६ ७४० ०

शनि १ ८ ५३ २० ०

गुरु २ १६ ५३२० ०

राहु १ ६४० ० ०

१४ ० ० ० ०

चन्द्र में मंगल के अंतर का प्रत्यंतर

ग्रह मा. दि. घ. प. वि.

मंगल ० २९ ३७ ४६ ४०

बुघ २ २ ५७५६ ४०

शनि १ ७ २ १३ २०

गुर २ १० २२ १३ २०

राहु ११४२६४० ०

शुक्र २ १७ ४६४० ०

सूर्य ० २२ १३ २० ०

w sos १ २५ ३३ २० ० She १३१३० ० ० ०

३८२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

१४--उल्टा फल-चतुर्थश अस्त हो तो चतुर्थेश का सव फळ उल्टा हो (जा०सं०)।

१५--सुखकारी-चतुर्थेश शुभ युक्त या दृष्ट होकर बलवान्‌ हो तो सुखकारी है 1

१६- मित्र हानि-चतुर्थेश शुक्र बुत्र मंगल से दृष्ट हो (जा० So) 1

१७--माता को क्लेश--चतुर्थेश पाप युक्त हो ।

१८--माता को शुभ-चतुर्थेश शुभ युक्त हो ।

१९- श्वसुर, मित्र पिता का शरीर सुख-चतुर्थश के समान, शवसुर, मित्र और

पिता का शरीर सुख का विचार करना (जा० सं०) ।

२०--गृह भूमि वाहन खेती माता आदि का सुख-चतुर्थेश स्वगृह, स्वनवांश,

सर्वोच्च में हो तो गृह भूमि, वाहन, खेती, माता, वाजा आदि का पूर्ण सुख

हो (बृ० पा०) ।

२१--उच्च श्रेणो का घर-चतुर्थंश यदि दशमेश के साथ केन्द्र त्रिकोण में हो तो

उच्च श्रेणी का मकान हो (go पा०) । -

qq—= में मान्य-चतुर्थेश शुभ ग्रह हो या शुभ ग्रह से युक्त हो लग्न में बुथ

हो तो वन्धुओं में श्रेष्ठ मान्य होता है (वृ० पा०)

२३--माता का पूर्ण सुख-चतुर्थेश और शुक्र केन्द्र में हो उच्च का बुध हो ।

२४--बाहन सुख-लामेश चतुथं में चतुथँश लाभ में हो तो १२ वर्ष में वाहनों का

ख हो। ;

: २५--वाहन लाभ-चतुर्थश यदि दशमेश युक्त होकर अपने उच्चांश में होतो

४२ वर्ष में याहनों का विशेष लाभ हो (qo पा०) ।

२६--वाहन लाभ--चतुर्थेश उच्च में शुक्र युक्त हो चतुर्थ में सूर्य हो तो ३२ वर्ष में

वाहन का विशेष लाभ हो (go पा०) ।

२७--गूगा-चतुर्थ में चर राशि हो चतुर्थेश ओर मंगळ ६, १२ भाव में हो वो

बह गुंगा हो (qo पा०) ।

२८--माता को मृत्यु-जन्म में चतुर्थंश और चन्द्र दुःस्थान में हो शुभ ग्रह का योग

दृष्टि न हो या दो पाप ग्रहों के वीच में हो और पाप दृष्टि भो हो तो माता की मृत्यु हो (फल दी०) 1

२९--माता का सुख-यदि उपरोक्त दोनों ग्रह बली हों और चतुर्थ शुभ युक्त या

दुष्ट हो तो माता का सुख होगा (फल दी०) । :

३०--माता की दाह क्रिया करे-चतुर्थंश लग्न में हो और लग्नेश चतुर्थ में हो

और दोनों में कोई चन्द्र से युक्त या दृष्ट हो तो जातक माता की दाह क्रिया करेगा ।

३१--माता का दाह संस्कार न कर सकेगा-यदि वे दोनों ग्रह एक दूसरे के शत्रु

या नीच घर या ६, ८ भाव में दों और एक दूसरे से किसी प्रकार सम्बन्धित न हों

सहयोग से या दृष्टि से, तो माता की मृत्यु पर उसका दाह संस्कार न कर

सकेगा (फल०) ।

२--पिता पुत्र आदि के विषय में बिशेष विचार-जैसा कि ऊपर माता के लिये

भावेश का भिन्न-मिन्न भावों में फल : ३८३

कहा गया है उसी प्रकार पिता, भाई, पुत्र, आदि के विषय में, उसके सम्बन्धित भाव

का सम्बन्धित कारक, उसके स्वामी, लग्न लग्नेश के सम्वन्ध से विचार कर फळ कहना (फल०) ।

३३--मान वाहन, आधिपत्य आभूषण आदि प्राप्त-चतुर्थेश और शुक्र यदि लग्न में और चतुर्थ भाव में मुस्थित हो तो मान के लिये वाहन, मनुष्यों पर आधिपत्य, सुवणं

और भी दूसरे कीमती मणि आभूषण वस्त्र, शैया और इसी प्रकार के भोग को आवश्यक

सामग्री प्राप्त हो हाथी घोड़े गाय आदि मिले (फल०)

३४--घर जले-चतुर्थेश दुःस्यान में हो या चतुर्थ में मंगल और शनि हो तो उसका

घर जळ जावे (फल०) ।

३५--घर मिळे-चतुर्थेंश चतुर्थ में हो या चतुर्थ में लरनेश हो तो घर मिछे।

यदि वे दुःस्यान में हों तो विपरीत फल हो ।

३६--घर मिले--चतुर्थेश सप्तमेश से युक्त होकर चतुथं में हो या केन्द्र या कोण

में हो या अपने उच्च का होकर सप्तम को देखे तो घर की प्राप्ति हो ।

३७--चतुर्थेश का नवांश अनुसार फल--चतुर्थेश स्वगृहो हो या अन्य ठिकाने हो वह

जिस ग्रह के नवांश में हो वह ग्रह अपनी स्थिति प्रमाण से फळ देता है। मां का स्वभाव

भी उसी ग्रह प्रमाण से रहता है (प्रा० यो०) ।

३८--राशि जिनमें चतुथँश शुभ द्वोता है-क्रेवर ६ राशियाँ है जिनमें चतुर्थेश शुभ

(होता है वे कुम्भ, मीन, मिथुन, ककं, कन्या और घन लग्न हँ । इनसे से चोथे घर में

शुभ ग्रह का घर पड़ता है । शेष राशि की लग्न होने से; चतुर्थ में पाप प्रह को राशि

पड़ती है 1 कर्क के लिये जव चंद्रमा पूणं हो तो शुभ हैं निर्बल हो तो पाप प्रह होतो

है। इसी प्रकार मिथुन कन्या के विषय में है जव उस का स्वामी बुघ शुम युक्त हो तो

` शुभ है । पाप युक्त हो तो पाप गिना जाता है । परन्तु यहाँ इसका विचार न कर मियुन

और कन्या को शुभ राशि गिना है ।

(३९) चतुर्थं में बली चतुर्थश ग्रह का फल

चतुर्थेश सूर्य हो तो उसका गृह अदृढ ओर विशेषकर जा हुआ होता है । चन्द्र ह!

तो उसका गृह नवीन होता है । मंगल हो तो उसका गृह टूटा हुआ तया जला हुआ,

बुघ.हो तो उसका गृह चित्र विचित्र प्रकार का, गुरु हो तों उसका qg अच्छा मजबुत

दृढ़, शुक्र हो तो उसका गृह मनोहर, शनि हो तो उसका गृह पुराना होता हे

( जा० सं० )।

(४० ) चतुर्थेश का धन भाव में विशेष फल

चतुर्थेश चन्द्र घन में--दहो शक्कर आदि मोठे पदार्थ मिळे चांदी का पात्र पीने

को हो, मांस मछली आदि का खाने वाळा हो । सूर्य घन में-खारा व उष्ण पदार्थ प्राप्त

हा तांबे का पात्र हो बकरे का मांस भक्षो हो । मंगळ घन में-खारा, तिलह, मशालेशर

पदार्थ मिले हरिण या पक्षी का मांस प्रिय हो, रांगा या कलई वाछा पात्र हो न्याय

३८४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

करने कौ विधि व लड़ाई करने की विद्या प्राप्त हो। लाल नेत्र, क्रूर व कठोर वचन

बोलने वाला हो । बुध घन में हो--सात्विक अन्न प्राप्त हो कांसे का पात्र प्रिय हो.

(प्रा यो० ) ।

५--पंचमेश का भिन्न भिन्न भाव में फल

१--लग्न में पंचमेश--संसार में प्रसिद्ध, थोड़े पुत्र, शास्त्र जानने वाला, देववेत्ता,

सत्कर्म में निरत (मान०) | विख्यात बहुत से पुत्रों से युक्त, शास्त्रवेत्ता, शीलवेत्ता, सुकर्म

में सावघान | जा० सं० ) । पुत्र सुखयुक्त, बिद्वान्‌, वद्य, कुटिल हृदय, परधन हारक

( वृ० पा० ) ।

२--घन में पंचमेश --क्रर ग्रह हो-दरिद्र, शुभग्रह--गाने बजाने आदि कला का

ज्ञाता । नौकरी आदि के लिए अच्छी जगह होने पर भी कठिनता से भोजन चलाने वाला

( मान० ) । पापग्रह हो--घनहीन, गाना बजाना आदि जाने, कविता करने में चतुर,

कष्ट भोगी, स्थानाधिक हो ( जा० सं० ) । बहुत पुत्र और घन से युक्त, परिवार का

पोषक, मानी, स्त्री का प्रिय, यशस्वो ( व० पा० ) 1

३--तृतीय में पंचमेश-मनोहर मीठी बातें कहने वाळा, सब वस्तुओं में प्रसिद्ध,

उसका पुत्र सारे कुटुम्ब का पालन पोषण करे ( मान० ) 1 मधुर भाषी, अच्छे बन्धुजनं

से विख्यात । उसके पुत्रों तथा बांघवों को पुत्री पालतो है ( जा० सं० ) । सहोदर का.

प्रिय, चुगुलखोर, कंजूस स्वार्थी (वृ ० पा०) ।

४- चतुर्थ में पंचमेश-पिता के समान कमं करने में उद्यत, पिता द्वारा अधिक समय

तक पाला जाय, माता की सेवा करने वाबा । क्रूर ग्रह हो पिता का विरोधी (मान०) ।

गुरु भक्त, पिता के कायं में युक्त, माता का भक्त । पापग्रह हो तो विपरीत फर हो

( जा० सं० ) सुख युक्त, माता पिता से भी सुखी, घनवान्‌, बुद्धिमाद्‌, राजमंत्री या

राजगुरु (बृ० पा०)।

५--पंचम में पंचमेश-बुद्धिमान्‌, मनुष्यों में माननीय, पुत्रों से युक्त, एवं प्रसिद्ध

(मान०) । बुद्धिमान्‌, मानी, कहने में प्रवीण, पुत्रयुक्त, बहुत धन से सम्पन्न, ख्याति युक्त

( जा० सं० ) । शुभग्रह युक्त हो तो पुत्रवान्‌ । पापयुक्त हो तो संतान होन किन्तु गुणी

और मित्र का उपकारी होता है ( वृ० पा० )।

. ६- षष्ठ में पंचमेश-क्रर ग्रह हो-सदा शात्रुओ से आक्रान्त, मान से हीन, बंघन

से रहित ( मान० ) शास्त्र प्रिय, पुत्रहीन, रोगी और निर्धनी । पापग्रह हो तो अतीव

दुष्ट हो ( जा० सं० ) । पुत्र से शत्रुता या पुत्रहीन या दत्तक पुत्र वाला (वृ० पा०) ।

७-सप्तम में पंचमेश-मनुष्य देव गुरुजनों का भक्त, पुत्रों से युक्त, स्त्री प्रियभाषिणी

और सुशीला ( मान० ) स्त्रो सुन्दर संतान वाली, सोभाग्य युक्त, भाग्यवती, गुरुभक्त

प्रिय बोलने वाली अच्छे शील वाली (जा० सं०)। मानी, सब घर्म को मानने वाला,

पुत्रादि सुख युक्त) परोपकारी ( qo पा० ) ।

८ अष्टम में पंचमेश-दुर्वावय कहने वाला, स्त्री से रहित, भाई तथा पुत्र असह्य

| बातें कहते हैं ( मान० ) । बुरे वचन बोलने वाला, स्थानहीन, मू, उसके भाता व

भावेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल : ३८५

पुत्र नष्ट, अंगहीन ( जा० qo

हीन (qo पा० ) ।

९--नवम में पंचमेश-विद्या में सुबोध, बड़ा कवि, गान विद्या का जानने वाला राजाओं से पूजित, रूपवान्‌, नाटक विद्या का प्रेमी ( मान० ) । सुन्दर गान विद्या से युक्त, गान में निपुण, राजा से सत्कार पानेवाला, सुन्दर रूप नाटक रसिक (जा० सं०)। ea पुत्र अ या राजा के तुल्य हा, स्वयं ग्रथक्रार, विख्यात, कुल में श्रेष्ठ वृ० पा०) ।

) । थोड़े पुत्र वाला, कास इवास से युक्त, क्रोधी, सुख￾१०--ददाम में पंचमेश-राजा के समान कर्म करने व विचारने वाला, सत्कर्म में निरत, सबों में उत्तम, माता को आनन्द देने वाला ( मान० )। राज काज करने

वाला, राजपृरुषों से सेवित, सत्कमं में निपुण और श्रेष्ठ, माता के लिए सुख का भोगने वाला ( जा० सं० ) 1 राजा, अनेक सुख से युक्त, विख्यात कीति ( qo पा० ) ।

“११--जछाभ में पंचमेश-शूरवोर, पुत्रवान्‌, गाने बजाने को कला का ज्ञाता, राजा

के समान भोगी ( मान० ) शुरवीर, पुत्रवान्‌, अच्छे कार्य करने वाला, गीत और

कलाओं में निपुण, राजा से लाभ ( जा० सं० ) । विद्वान्‌, लोकप्रिय, ग्रंथकार, कार्य में

समर्थ बहुपुत्र, घनवान्‌ (qo पा०) ।

१२--व्यय में पंच मेश-क्ूरग्र हु-पुत्र से हीन, पुत्रों के दुःख से संतापित, परदेश￾वासी | शुभग्रह हो तो सुन्दर पुत्र हो (मान०)। पापग्रह हो तो पत्रहीन, शुम हो तो

पुत्रयुक्त, पुत्र संताप से युक्त, परदेश में जाने में तत्पर (जा० सं०) । पुत्र सुख पे हीन,

दत्तक या करोत पुत्र वाला (qo पा०) 1

पंचमेश का विशेष फल--

१--पुत्र सुख-लग्नेश व पंचमेश पंचम भाव में हो या केन्द्र त्रिकोण में हो तो पूणं रूप से पुत्र सुख हो ।

२--पुत्र का अभाव-पंचमेश ६-८-१२ भाव में हो तो पुत्र का अभाव हो (वृ०्पा०)

३-पुत्र न हो या मरे-पंचमेश अस्त हो या पाप युक्त हो तो पुत्र नहीं होता

होवे तो मर जाता ë (qo पा०) ।

४--संतान नष्ट स्त्री काकवंष्या-पंचमेश ६भाव में या मंगल से युक्त हो तो उनकी

प्रथम संतान होकर नष्ट हो जाती है और स्त्री काकवंध्या हो जाती है ।

५--स्त्री काकवंध्या-पंचमेश नीच में होकर ६-८-१२ भाव में हो या पंचम भाव

में केतु और बुघ हो तो उसको स्त्री काकवंघ्या हो जाती ë 1

६-स्त्री काकवंध्या-पंचमेश नीच में होकर पंचम भाव को नहीं देखता हो और

पंचम में शनि बुघ हो तो भी स्त्री काकवंध्या हो 1

७--यल से पुत्र-पंचमेश नीच में हो लग्न में नवमेश हो, पंचम में केतु बुघ हो

तो बहुत यत्न घर्मानुष्ठान आदि से पुत्र होता ë (qo पा०) ।

¿Z— से पुत्र-पंचमेश ६-८-१२ में हो या शत्रु राशि या नीच में होकर

पंचम भाव में हो तो भी यल करने से पुत्र होता है 1

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३८६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

९--कन्या हो-पंचमेश चन्द्र के द्रेष्काण में और चन्द्र से युवत हो तो कन्या संतति

होती हैं । (qo पा०)

१०--मृत्यु-पंचमेश चर राशि में होकर चन्द्रमा राहु से युक्त हो शनि पंचम भाव

में हो तो जातक मर जाता है (वृ० पा०) ।

११-नीचपुत्र-पंचमेश नोच राशि में प्रथम भाव में ३ या ४ पापग्रह से युक्त हो

तो नीच कमं करने वाला पुत्र हो (qe पा०) |

१२--एक पुत्र-पंचमेश गुरु हो या सूर्य शुभ स्यान में हो या केन्द्र या कोण में

बुम ग्रह हो तो १ पुत्र हो ।

१३- पूर्ण पुत्र सुख-पंचमेश उच्च में होकर २, २, १, या ५ घर में हो और गुरु

से युक्त दृष्ट हो तो वह पूणं पुत्र सुख पावे (qo पा०) ।

१४--३२-३३ वर्ष में पुत्र-पंचमेश शुक्र के साथ हो पंचम में गुरु हो तो ३२-

३३ वर्ष में पुत्र हो (qo पा०) ।

१५--३०-३६ वर्ष में पुत्र-पंचमेश केन्द्र में हो पुत्र भाव के कारक ग्रह से युक्त

हो तो ३० या ३६ वर्ष में पुत्र हो ।

१६--! ० पुत्र-चतुथं. और षष्ठ भाव में पाप ग्रह हो लग्नेश के साथ पंचमेश

परमोच्च में हो, पुत्र भाव कारक शुभ ग्रह युक्त हो तो १० पुत्र हों (qo पा०) 1

१७--६ पुत्र हों ३ मरें-पंचमेश के साथ धनेश पुत्र भाव में हो तो ६ पुत्र हों

उनमें ३ का मरण हो जाता है (वु० पा०) ।

१८--३२ वर्षे में पुत्र मरण-पंचम में राहु हो, पंच मेश पाप ग्रह से युक्त हो तथा

गुरु नीच में हो तो ३२ वर्ष में पुत्रका मरण हो (qo पा०) ।

१९-घुडिमान्‌ निष्कपटो-पंच मेश सुस्थित हो ओर उसे वैशेषिक्रांश प्राप्त हो तो

बुद्धिमान्‌ और निष्कृपटो हो (फल०) ।

-षष्ठेश का प्रत्येक भाव में फल

१--लग्न में षप्ठेश -रोग रहित, बलवान्‌, कुटुम्ब को कष्ट देने वाला, आत्मपक्षोय

जनों से युक्‍त, शत्रु हंता, स्वच्छंद रहने वाला, इच्छित घन एकत्र करने वाळा. (मान०) ।

रोग होन, उत्पाह वजित, कुटुम्ब से कष्ट पाने वाला, बहुत से पक्ष वाला, शत्रु नाशक,

इच्छानुसार कहने वाला, घनवान्‌, (जा० सं०) । रोगी, यशस्वी, अपने सम्बन्धो का

शत्रु, घनो मानो, साहसी, गुणी (zo पा०) ।

२--घन में षष्ठेश-बड़ा दुष्ट, प्रत्येक कार्य में चतुर, घन प्रतिष्ठा बढ़ाने में तत्पर,

अच्छी जग रहने वाला, सर्वत्र विख्यात, व्याधित शरीर वाला, मित्रों का घन नाशक

(मान०) । दुष्ट, चतुर, संग्रहकर्ता, विख्यात, व्याधि वाला, पुत्र से हरे हुए घनवाला,

साहसी, कुळ में श्रेष्ठ, विदेश वासो, सुखी, वक्ता, अपना कर्तव्य करने वाला (बृ०पा०) ।

३--सहज में-छोगों को कष्ट देने वाळा, अपने कुटुम्बियों के मारने में चतुर, संग्राम

में शत्रु से कष्ट (मान०) क्रूर ग्रह हो तो अपने जनों को कष्ट कर्ता, पिता को लक्ष्मी से

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भावेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल : ३८७

बिकास कर्ते की बुद्धि वाला, ग्राम जन का अति कष्ट दायक नगर दाख की खान होता

है नाभि में दृढ रोग (जा० सं०) क्रोघो, बठहोन, भाई का नु, क्रूर नोकर वाला

(go पा०) ।

४--चतुर्थ में-पुत्र पिता में परस्पर वेमनस्य, पिता रोगी, वह और उसके लड़के बहुत

समय तक लक्ष्मी को प्राप्त (मान>) । पिता पुत्र में परस्पर वैर, संकर जाति का पुत्र

होकर बहुत कालीन पिता की लक्ष्मी को प्राप्त करता है (जा० सं०) । मातु सुख से हीन

मनमाना काम करने वाला, चुगुक खोर, द्वेषो, चंचल, अधिक घनवान्‌ (go पा०) ।

५--पंचम में-क्रर हो तो पिता पुत्र में वेर, अपने पुत्र के कारण मरण पाने वाला,

शुभ हो तो निर्धन, पदवी पाकर दुष्ट स्वमाव, कपटी (मान०) । पापग्रह हो तो-पिता-

पुत्र में वैर बुद्धि, शुभग्रह हो-निर्धन, षदवी द्वारा दुष्ट होता है । (जा० सं०) । घन

आदि स्थिर नहीं रहता, पुत्रादि से शत्रुता, स्वयं सुखी, स्वार्थी, दयालु (वृ० पा०) ।

६--षष्ठ में-रोग रहित, बहुतों से वैर, सुखी, बड़ा कृपण, जन्म से सुख युक्त,

कुस्थान बासी (मान०) । ॥

रोग होन, कर्ता, सुखी, कृपण, दुःखी नहीं होता, अ पने स्थान में बास, सहोदर ç

विरोध अन्यजनों के साथ शुभ, मित्र जोर वाहन की वृद्धि, नीच जनों की वृद्धि (जा०

सं०) । रोगी व वेरी से युक्त न होकर सुखी व कृपण होगा (जा० लं०) ।

अपने गोत्रियों से शत्रुता, दूमरों से मैत्रो, घन आदि जन्य मध्यम सुख (वृ० पा०) ।

७--सप्तम में षष्ठेश-विरोघ करने वाली, क्रोधी, संताप हारी स्त्री मिले यदि क्रूर

ग्रह हो । शुभ हो तो स्त्री बंध्या या गर्भपात कराने में प्रवृत्त (मान०) ।

शुभ ग्रह हो तो स्त्रो बंच्या गर्भ गिराने में तत्पर, पाप ग्रह हो तो स्त्री विरोध करने

चाली बड़ी प्रचंड, संताप हरने वाली हो (जा० सं०) 1

स्त्री सुख से रहित, यशस्वी, गुणी, मानी, साहसी, घनी हो (go पा०) 1

८--अष्टम में-संग्रहणी रोगी । ग्रह के अनुसार, षष्ठेश सूर्य-सिह से, चन्द्र-तत्काल

मृत्यु, मंगल-सपं से, बुच्र-विष दोष से, गुरुबुद्धि की खराबी या पागलपन से, शुक्र

नेत्र रोग से मृत्यु हो (मान०) । 3

पष्ठेश मंगल हो तो सपं से स्त्री की मृत्यु, बुध हो तो विष से स्त्री की मृत्यु, चद्र

व सूर्य--राजा व सिंह से, गुरु घ शुक्र गान पीड़ा या नेत्र से, शनि हो तो संग्रहणी

रोग व वात रोग से स्त्री का मरण (जा० सं०) ।

बहुत मेहरती, व्याधि रहित सुखी (जा० लं०) । रोगी पंडितों का शत्रु, दूसरे के

घन का लोभी, परस्त्री गामो तथा अशुचि (वृ० पा०)।

९--नवम में-क्रूर, लंगडा, भाई बंधु से विरोध करे, शास्त्र को नहीं माने, भिक्षुक

(मान०) ।

वाप ग्रहृ हो तो-भ्रष्ट हो, देव विरोधी और क्रूर होकर याचक और गुरु को मानता

है । काष्ठ शिला आदि बेचने वाला व्यापार में कहीं हानि कहीं वृद्धि (जा० सं०) ।

३८८ ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

पत्थर और लकड़ी बेचने वाला, व्यापार में कहीं हानि कहीं वृद्धि भो होती है

(ge पा०) ।

१०-दशम में षष्ठेश-क्र्र ग्रह-माता से वेर करे, दुष्ट स्वभाव, धर्म और पुत्र के

  • पालने में बुद्धि, माता के दोष से उसका बैरी वना रहता है । (मान०) ।

पाप ग्रह--अति दुष्ट, माता से वेर करे, घमं और पुत्र को पालन करने में बुद्धि,

मातु द्वेषो (जा० सं०) ।

कुछ में श्रेष्ठ, पिता का अभक्त, वक्ता और विदेश जाने में सुखो (qo पा०) ।

११--छाभ में पष्ठेश-करर ग्रह शत्रु के द्वारा मृत्यु, सबका वेरो, चोरों के द्वारा

हानि, घोड़ा भेस आदि चतुष्पद के निमित्त से लाभ (मान०) ।

पाप ग्रह-शत्रु से मरण, चोर द्वारा हानि, चौपाये से लाभ (जा० सं०) ।

शत्रु से घन पाने वाला, गुणी, साहसी, मानो, कितु पुत्र सुख से रहित (वृ० पा०) ।

१२--व्यय में षष्ठेश-व्यापार में द्रव्य हानि, विदेश आदि में जाने से घन को हानि,

भाग्य से होता है ऐसा मानने वाला (मान०) ।

चौपाये, घन धान्य से युवत, चपल भौर लक्ष्मो से मदान्ध, लक्ष्मो के आनन्द से

युक्त (जा० सं०) ।

व्यसन में खर्च करने वाला, विद्वानों का द्वेपी, जोव हिंसक (qo पा०) 1

षष्ठेश का विशेष फल 2

१--शत्र से पीड़ा--षष्ठेश केन्द्र में पापयुक्त या दृष्ट हो तो शत्रु से लगातार बड़ी

पोड़ा हो जिसका वह सरलता पूर्वक परिहार न कर सके (फल०) ।

२--श त्रुनाश-षष्ठेश दुःस्थान में हो और नीच में या शत्रुगृही या अस्त भी हो,

और यदि लग्नेश बली हो और यदि सुर्य नवम घर में हो तो शत्रु का नाश हो (फळ०)

३--निरोग सुखी-षष्ठेश से लग्नेश बली हो और शुभग्रह की राशि या अंश में

हो शुभ दृष्टि भी हो ओर यदि चतुर्थेश बली होकर केन्द्र या कोण में हो तो निरोग 8

शरीर हो सब सुख व आराम भोगे (फ&०) ।

४- जातक वी शुभता बढ़े-(१) जिस भाव का स्वामी पष्ठेश युक्त हो (२) षष्ठेश

से जो भावयुक्त हो । (३) षष्ठ भाव में जो ग्रह है उसका स्वस्थान हो । ये भाव जातक

की शुभता को बढ़ावेंगे (फल०) ।

५--दौर्घायु-षष्ठेश ६ या १२ स्थान में हो। व्ययेश ६ या १२ स्थान में हो या लग्न या अष्टम स्थान में हो ।

६--व्रण-षष्ठेश, ६, १ या ८ भाव में हो तो शरीर में व्रण कारक हो (वृ० पा०) | षष्ठ भाव में जो राशि हो उस राशि के आधित अंग में विशेषकर व्रण होंगे (वृ० पा) । इसो प्रकार पिता आदि (१० स्थानादि) भावो के स्वामी पष्ठेश से युक्‍त हां ६-८ भाव में हों तो पिता आदि को भो व्रण हो (वृ पा०) 1

७--ज़ण स्थान--षष्ठेश से युक्त होकर उक्त स्थान में यदि चन्द्र हो तो-मुख में,

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भावेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल : ३८९

हठी मंगल हो तो कंठ में, बुघ-नाभि, | गुरु-नाक, शुक्र- शुक्र-नेत्र, शनि-ओर — ` में ब्रण

८--मुख में ब्रण-छन्नेश मंगल की राशि १-८ में या बुध की राशि ३-६ में या

किसी भाव में बुघ से दृष्ट हो तो मुख में qa हों (qo पा०) 1

९--ब्रण-अष्ठेश पापयुक्त लग्न या अष्टम में हो तो व्रण करे (जा० सं०)। ऐसा

योग माता पिता पुत्र आदि की उनके सम्बन्धी भाव से विचारना जैसे चतुर्थश पापयुक्त

रूरन या अष्टम में हो तो माता के शरीर में व्रण हों (जा० सं०) ।

१०--व्रण स्थान-पापयुक्त लग्न या अष्ठम में षष्ठेश सूर्य हो-शिँर में, चन्द्र-मुख,

मंगल-गछा, बुघ- हृदय, गुरु-कटि, शुक्र-नेत्र, शनि-प्रांव, राहु या केतु हो तो-ओठों में

स्रण हो (जा० सं०) ।

११--शत्रु भय-पष्ठेश शुभ युक्त या दृष्ट हो तो शत्रु मय हो, अन्य प्रकार से हो

तो शत्रु भय न हो (जा० सं०) ।

१२- शत्रु से रोग-षप्ठेश उच्च राशिगत या विषम राशि में होकर पष्ठ में हो

तो शत्रु से भी गूढ़ रोग होता है (जा० सं०) 1

१३-- हृदय में रोग-षष्ठेश सूर्य के नवांश में हो ।

१४--गुप्त रोग-पष्ठेश वृरिचिक या कर्क के नवांश में हो मंगल से दृष्ट हो तो गुप्त

रोग से अंग पोड़ा ।

१५--पवन और रुघिर विकार-षष्ठेश वृष्चिक या ककं के नवांश में शनि से दृष्ट

` हो तो पवन ओर रुधिर विकार से पीडा हो 1

१६--पष्ठेश भिन्न भिन्न ग्रहों के साथ रहने का फल-षष्ठेश चंद्रमा मंगल से

युक्त-शस्त्र प्रहार, अग्नि रोग, दाह से संतप्त देह । शनि से युक्त-पवन, पत्यर चोपायों

से चोट । मंगल से युक्‍त-रुधिर और शस्त्र प्रहार से संतप्त देह, देशाटन करने में राज￾दर्शन करने में युक्त करता है, भूख से संतप्त, पत्थर, पक्षी तथा पवन इनसे प्रहार । बुघ

से युक्त दृष्ट-गिरने व लोह प्रहार से विदीणं अंग वाला, जीते हुए शत्रु वाला । शुक्र गुर

युवत-विख्यात, शत्र, के वर के भय से युक्त, स्वस्थ देह (जा० सं०) ।

७--सप्तमेश का भिन्न-भिन्न भाव में फल

१--लग्न में सप्तमेश--पर स्त्री से प्रीत न करे, अनेक भोग भोगे, रूपवान्‌, अपनी

स्त्री में मन (मान०) । अति तुच्छ तथा स्नेह रहित, अन्य स्त्री से युक्त, भोगी, रूपवान्‌

तथा अच्छी पत्नी से युक्त और जनों के प्रति चंचल चित्त (ste सं०) पर स्त्री गामी,

दुष्ट, चतुर, अधीर, वात रोगी (बु० पा०) ।

q— म सप्तमेश-दुष्ट भार्या, पुत्रों की इच्छा करने वालो, स्तरो के द्वारा घन

प्राप्त, स्वतः भी स्त्री के संग से होन होकर रहता है (मान०) । स्त्री अति दुष्ट ओर पुत्र

हीन, स्त्री के हाथ उसका घन उसे निरन्तर दुखानुषंगी करता है (जा० सं०) । बहुत

पत्नी वाला, स्त्री द्वारा घन लाभ, दीर्घसूत्री (a° पा०) 1

३९० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

३--सहज में सप्तमेश-स्वबल युक्त, बन्धु स्नेहो, बडा दुःखी । पापग्रह हो तो स्त्री

देवर के साथ रहे, वह स्त्री रूपवती और मित्रो के घर रहने वाली होती है (मान०) ।

पुत्र बत्सल तथा दुःखी । क्रूर ग्रह हो तो स्त्रो रूपवती होकर देवर से भोग करती है

(ब्‌? पा०) ।

४--सुख में सप्तमेश-चंचल स्वभाव) पितृ वरी, उसका पिता भो खोटे वाक्य

कहे । उसकी भार्या का पालन पोषण ।पता करता हैँ अर्थात्‌ मायके में जाकर जीवन

निर्वाह करे (मान०) । चंचल, पिता से बैर कर्ता, स्नेह युक्त, पिता खोटे वचन कहने

वाला, पिता उसक्ष्त्री का पालन करता है (जा० सं०) । उसकी स्त्री वश् में नहीं रहती,

स्वयं वह सत्यवादी, वुद्धिमान्‌ धर्मात्मा और दन्त रोगो (वृ० पा०) ।

५--पंचम में सप्तमेश-सौभाग्य युक्त, पुत्रवान्‌, साहसप्रिय, दुष्ट बुद्धि, उस की

स्त्री को पुत्र पालन करता है (मान०) । सौभाग्य युक्त, पौत्रवान्‌, प्रिय साहस, दुष्ट

बुद्धि, उसका पुत्र उसको स्त्रो का पालन करता है (जा० सं०) । मानी, सब गुणों से

युक्त, सदा हर्षित, सब धन से युक्त (वृ० पा०) ।

६--षष्ठ मे सप्तमेश-स्त्रो से वेर करने वाला, स्त्रो रोगिणी । पाप गुहू--स्त्री के

साथ अधिक संभोग करने से क्षय रोग, शीघ्र मृत्यु (मान०) । स्त्री के साथ वर, रोगिणी

स्त्री, स्त्री के संग से क्षय रोग, पाप गृह हो तो, उसे मृत्यु के आश्रय करता है (जा०,,

सं०) । रोगणी स्त्रियाँ, स्त्री से शत्रुता, स्वयं क्रोधी ओर सुखहीन (qo पा०) १ अ

७--सप्तम में सप्तमेश-दोर्घायु, सब के साथ प्रीति, अच्छा स्वभाव, तेजस्वी

(मान०) । दीर्घायु, प्रसन्नचित्त, कृपा युक्त, स्नेही, निर्मल शोल, तेजस्वी (जा० सं०) ।

स्त्री सुख से युक्त, धीर, चतुर, बुद्धिमान्‌, वात रोगी (qo पा०) ।

८--अष्टम में सप्तमेश-वेद्या गामी, विवाह स रहित, नित्य चिन्तायुक्त, दुःखी

(मान०) । वेश्या से भोग, अपनी स्त्री से प्रेम वर्जित, विदुषी द्वितीय स्त्री में आसक्त,

स्त्री को सेवा नहीं करने वाला (जा० सं०) । स्त्रो सुरत से होन, स्त्री रोग युक्त, दुष्टा

मोर वश्च में नहीं रहने वाली (qo पा०) ।

९--नवम में सप्तमेश-बड़ा तेजस्वी, शोलवान्‌, स्त्री सुशीला तेज युक्त । क्रूर गृह

हो तो नपुंसक या कुरूप 1 यदि लग्नेश देखे तो नीति शास्त्र में प्रवीण (मान०) 1 तेजस्वी,

शिल्प (कारीगरो) युक्त उसको स्त्री भी उसो प्रकार की होती ६ । क्रूर गत हो तो,

स्त्री खण्ड रूप वाली होतो है । लग्नेश से दृष्ट हो तो तप से अधिक बल पाता है

(जा० सं०) । अनेक स्त्री से संग, स्त्री में आसक्त, बहुत कायं आरम्म करने वाला

(वृ० पा०) । :

१०-“दशम में सप्तमेश-राजा से दोष युक्त, अति कामी, कपटो, । क्रूर गृह हो

तो, अति दुःखी और शत्रु के आघीन (मान०) । राज रोग वाला, व्यभिचारो, लंपट,

क्रूर । यदि पाप गृह हो, इवसुर बडा दुष्ट और विदिशाओ में विख्यात होता है । (जा०

सं०) । स्त्री वश में नहीं होती । स्वयं धर्मात्मा और घन शत्रु से युक्त (q o पा०) 1

भावेश का भिन्न-भिन्न भावों Š फल : ३९ १

११--लाम में सप्तमेश-स्त्री पति भक्ता, रूपवती, सुशक्ति, दुर्वलांग, (मान०) ।

डळ द व्य ज्पवती, शुभ शक्ति युक्त विवाहिता स्त्री हो, वह स्त्री सस्तान उत्पन्न हे वे i अधिक कन्या Ce पावे (जा० सं०) । स्त्री के द्वारा धनलाभ, पुत्र सुख अल्प,

१२--ज्यय. में सप्तमेश-कुटुम्व के काम काज में लगा रहे । स्त्री बडो, नवीन,

चंचल, दुष्टों के साथ रहने वालो, पति को छोड़कर हर जगह रहने वाली वेश्या सदृश

(मान०).। चंचल पुरुष को स्त्री, गृह बन्धनों से हीन चंचल तथा दुष्ट ( जा० सं० ) 1

a m. उसकी स्त्री बहुत खच करने वाली होतो है, वस्त्र के व्यापार से लाभ qo सं०..) । प

(७) सप्तमेश का विशेष फल

१--स्षी सत गुणो-सप्तमेश बली हो मौर सप्तम घर का सम्बन्ध शुभ गृह से

हो चाहे शुभ युक्त या दृष्ट से हो तो उसकी स्त्री सतगुणी होतो है। पति के साथ

आनन्द पूर्वक रहेगी । सन्तान होंगे और वह अच्छे गुण वाली होगी (फल०) ।

२--स्त्रो रोगिणी-सप्तमेश ६-८-१२ स्थान में हो और अपने घर का न हो तो

स्त्री रोगिणी हो । यदि सप्तमेश उच्च घरों का हो तो यह फल नहीं होता हैं 1

८--अष्टमेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल

१--छरन में अष्टमेश-प्रत्येक कायं में विघ्न, बहुत काल तक रोगो, चोर निदनीय

कार्य, किसी राजा की आज्ञा से लक्ष्मो प्राप्त ( मान० ) बहुत से विष्नों से युक्त, दोघं

रोगी, चोर, इष्टानुवाद में युक्त, राजा के संग से लक्ष्मी प्राप्त ( qo पा० ) ।

२--घन में अष्टमेश-कऋर ग्रह हो तो-थोड़े दिन तक जीने वाला, शत्रुओं से युक्त,

चोर, शुम ग्रह हो अति शुम कारक होता है परन्तु किसी राजा द्वारा मृत्य पावे (मा०) ।

पाप ग्रह-धन लाभ न हो चोर होवे, शुभग्रहू-शुभ फल, अत में राजा के प्रकोप से मरण

( जा० सं० ) भुज बल से हानि, थोड़ा घन वाळा उसका जो कुछ नष्ट होता है वह

मिलता नहीं ( qo पा० )।

३--तृतीय में-बन्धु विरोधी, सुहृदजनों का विरोधी, अंगहीन, दुर्वाक्य कहने वाला,

बड़ा चंचल, सहोदर भाई से रहित ( मान० ) बन्धुजनो के विरोध से मित्रजनों से

बिरोध करता है, अंगहीन, दुर्बल, चंचल, सहोदर भ्राता से वंचित ( जा० सं० ) भाइयों के सुख से होन, नोकर और बल से हीन ( qo पा० )।

४--चतुर्थ में-पिता का वैरी, पिता से घन पाने वाला, पिता से लड़ने वाला

पिता रोगी ( मान० ) पिता से अन्याय पूर्वक पिता की लक्ष्मी को प्राप्त करता है,

पिता पुत्र दोनों का परस्पर युद्ध, पिता रोगी ( जा० सं० ) माता से होन, घर जमोन

रा रहित, मित्र द्रोही (qo पा०) ।

५--पंचम मे-क्र्रग्रह-पुत्र रहित । शुभग्रह हो तो शुभ फल । जातक अधिक नहों

जीता शांति आदि कराने से जीवे, कपट कर्म में तत्पर (मान०) । क्र्र-पुत्र हीन, शुभ

अह हो तो पुत्र युक्त होता है। प्रथम तो उत्पन्न होकर पुत्र जोता नहीं यदि जिये तो

कपटी हो (जा० सं०) मूर्खं, थोड़े पुत्र वाला, दीर्घायु घनी ( qo पा० ) । i

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३९२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

६--षष्ठ में-राजा का विरोधी हो 1 यह गुरु हो तो अंग में कष्ट पावे । शुक्र नेत्र

रोगी, चन्द्र-रोग युक्त । मंगल-कोप युक्त, बुघ-डरपोक । शनि-मुख में कष्ट । चन्द्र या

सोम्य ग्रह उसे देखे तो अनेक अरिष्ट हो (मा०) सुयं-राजा से विरोध । चंद्र-रोग युक्त ।

मंगल, क्रोधी । बुध-भयभीत, गुरु-अंग में कष्ट । शुक्र-नेत्र रोग, शनि-दुःखी। राहु

बुध-कष्ट । षष्ठ स्थित चन्द्र शुभग्रह से दृष्ट हो तो कुछ भी नहों होता (जा० सं०) शत्रु

को जीते, रोगी, वाल्यावस्था में सर्प या जल का भय ( qo पा० ) 1

७--सप्तम में अष्टमेश-उदर में रोग, दुष्टों से स्नेह, बडा दुष्ट । पाप ग्रह हो तो.

भार्या से द्वेष करने वाला । स्त्री के द्वेष से मृत्यु पाने पाने वाला ( मान० ) गुदा में व्याधि,

दुष्ट कुळ की स्त्री का प्रिय हो, क्रूर ग्रह हो तो स्त्रो से वेर कर्ता, स्त्री के दोष से मरण

( जा० सं० ) दो पत्नी हो । यदि पापयुक्त हो तो व्यापार में हानि ( वृ० पा० ) 1

८--अष्टम में-व्यवसाय करने वाला, रोगों से रहित, निरोग, कपट विद्या जानने

वाला, कपटो कुछ में जन्म, प्रसिद्ध ( मान० ) 1 व्यसनी, व्याधि हीन, रोग होन, कपट

कला से युक्‍त, कपट कुल में विख्यात (जा० सं०).। दीर्घायु, यंदि अष्टमेश निबेल. हो तो

मध्यमायु, चोर, स्वयं मिंदनोय 2\र पर निंदक (qo पा०) 1

९--नवम में-दुष्ट संग रहित, जीव हिसक,-पापो, _बन्बु रहित, स्नेह रहित, शत्रु

पक्ष में पुजनोय, मुख में व्यंग ( झांईं ) ( मान०) । संग हीन, जीव घाती, पापी बन्धु

होन, स्नेह रहित, पुज्य के सेवन में विमुख । सुख में-अंग होन . ( व्यंग ) ( जा० सं&) ।

घर्म निदक, नास्तिक, दुःशीला स्त्री वाला, परघन हर्ता (व.० पा०) ।

१०--इश्षम में-राजा के कर्म करनेवाला, नोच कमंकर्ता । क्रूर ग्रह हो तो आलसी

पुत्र तथा माता न जीवे ( मान० ) राज कमे करने वाला, नोच कर्म में युक्त, आलसी

क्रूर, अन्य पुरुष से उत्पन्न, पुत्र वानू, उसको माता नहीं जीती ( जा० qo ) । पिता

के सुख से होन, यदि शुभग्रह से य॒त्र व दृष्ट न हा तो चुगल खोर और कमं हीन होता है (वृ पा० ) ।

११--छाम में-बालपन में दुःखो पश्चात्‌ सुखो, दीर्घायु । पापग्रह हो तो अल्पायु

( जा० सं० ) ( मान० ) । पापयुक्त हो तो.धन हीन, बाल्यावस्था में दुःखी पीछे सुखी ।

शुभग्रह हो तो दीर्घायु । ( qo पा० ) ।

१२--व्यय में-क्रर वाक्य कहने .वाला, चोर, शठ, निर्दय, सर्वत्र स्वतन्त्र रहने

वाला, भंग होन, काक गोघ आदि का भक्षो ( मान० ) क्रूर, चोर, व नोच, अत्मज्ञान

से हीन, अंग हीन शरोर, काक आदि पक्षियों से भक्षण करने योग्य (जा० सं०) | कुकाय

में खच 1 पाप युक्त हो तो अल्पायु (वृ०-पा०) ।

८--अष्टमेश का विशेष फल

(१) दोर्घायु चिता रहित--अष्टमेश केन्द्र छोड़ कर ओर किसी स्थान में हा ओर

बल हीन भो हो जो लग्नेश के बळ से वळ में कम हातो दोर्घायु, चिता रहित, विष्त

ओर क्लेश रहित हो (फल०) ।

भावेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल : ३९३

र (२) दीर्घायु--अष्टमेश या sss स्वगृही हो अपने नवांश या अधिमित्र के नवांश में न हो परन्तु मित्र के नवांश में या घर में हो तो दीर्घायु होता है । (३) दोर्घायु अष्टमेश--लग्नेश, कर्मेश तथा शनि त्रिकोण छाम में या केन्द्र में हो तो दीर्घायु होता है ।

(४) अल्पायु--अष्टमेश पाप ग्रहों के साय हो या अष्टम में लग्नेश हो तो अल्पायु हो । इसी प्रकार से दशमेश से भी आमु विचारना।

“*-नवमेश का भिन्न भिन्न भाव में फल

लग्न में नवमेश-देवगुरु का मानने वाला, बड़ा शूर, कृपण, राजा के समान कमें

करने वाला, अल्पाहारो, विद्वान्‌ (मान०) । शूरवीर होकर देव गुरुजनों का सत्कार

करता है, कृपण, राज्य कमं कर्ता, थोड़ा संग्रह कर्ता, बुद्धिमान्‌ (जा० सं०) । भाग्यवान्‌

राजमान्य, सुशील, सुन्दर, विद्वान्‌, लोकपूज्य (go पा०) ।

२--घन में नवमेश-बल के निमित्त से विख्यात, उत्तम स्वभाव, सबका प्रेमी

सुकृत करने वाला, मुल में झांई, चोपाये पशु से पीड़ा (मान०) 1 srl के सम आचरण,

'विश्यात, अच्छे शील से युक्‍त, सत्यमाषो, पुण्यात्मा, चोपायों से उत्पन्न हुई पोड़ा, मुख

में अंगहीन (झांई) । (जा० सं०) । पंडित, लोकप्रिय, घनो, कामी, स्त्री पुत्रादि सुख से

युक्त (qo पा०) ।

३--तृतीय में नवमेश--रूपवती स्त्रो तथा वांघत्रों से प्रेम करने वाला, वंबुबर्ग ओर

सत्री का रक्षक । यदि जीता रहे तो सदा भाई बंधु समेत रहने वाला (मान०)। रूप

स्त्री बंधु इनसे प्रेम करने वाला, बंधु, स्त्री का रक्षक, बांधव गणों से युक्त होकर जोता

' है (जा० सं०) | भाई के सुख से युक्त, धनी, गुणी, रूप और शीळ से युक्त (वृ० पा०)।

४--चतुथ में नवमेश-पिता का भक्त, पितृ यात्रा आदि में विख्यात, सुकृत करने

'वाला, पितृ कर्मो में बुद्धि रखने वाला (मान०) । पिता का भक्त, पिता का पूजक,

विख्यात, अच्छा कायं करने वाळा, मित्र वर्गों में और उत्तम कर्म में प्रोति होवे

(जा० सं०)। घर को सवारी से सुखी, सब सम्पत्ति से युक्त, माता का भक्त

(वृ ० पा०)।

५--पंचम में नवमेश-सुकृत करने वाला, देवगुष पूजक, शरोर से सुन्दर, अनेक धमं

निष्ठ (मान०) । पुण्यात्मा, देवगुरु पूजक, शरीर सुन्दर, उसके पुत्र अच्छे कार्य से युक्त

'(जा० सं०) । पुत्र सुख से युक्त, गुरुमवत, घोर, धर्मात्मा और पंडित (बृ० पा०) 1

६--पष्ठ में नवमेश-शत्रु की प्रणति करने में परायण, धर्मकर्ता, किंचित न्यून कारय

करने वाळा, दर्शन की निंदा करने वाला (मान०) । शत्रु प्रयत पालक ओर घमंहीन,

कला से विफल शरोर वाला, दर्शक निदा में तत्पर (जा० सं०) । अल्प भाग्यवान्‌, मामा

आदि के सुख से होन, शत्रुता से दुःखी (go पा०) 1

७--सप्तम में नव मेश-सत्य बोलने वालो, सुख्या शीलयुक्त लक्ष्मी से युक्त) पुण्यवतो

स्त्री मिळे (मान०) । सत्यमाषिणो स्त्री, अच्छे वचन और रूप वालो, शील, श्रीयुक्त

३९४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

स्त्री पुष्पयुबत (जा० सं०) स्त्री के द्वारा भाग्योदय, गुणी, यशस्वी और हिजातियों में श्रेष्ठ (ao पा०) ।

८--अष्टम में नवमेश-बड़ा दुष्ट, जीवहंता, घर तथा भाइयों से विवजित, पृण्यहीन।

यदि क्रूर ग्रह हो तो-नपुंसक (मान०) । दुप्ट हिसक, बन्धुजनों से होन, पुण्यहीन,

क्रूर ओर खंडित (जा० २०) 1 भाग्यहीन, बड़े भाई के सुख से हीन (वृ० पा०) ।

९--नेवम में नवमेद--सुकृत मति, भाई बंधु से प्रीति, सबसे समता रखने वाला

(मान -) । बांधवो के साथ प्रीति, अनुचित बल, दानी, देवगुरु, स्वजन स्त्रो आदि में

भक्ति (जा० सं०) । अत्यन्त भाग्यवान्‌, गुण रूप और सहोदरो के सुख से युक्त (बु० पा०) ।

१०--दशम में नवमेश-राजाओं के कमं करने वाला, शूरवीर माता पिता का

पूजक, घर्म विख्यात (जा० सं०)4 राजा या राजा के समान, मंत्री या सेनापति, गुणी, लोफ्रमान्प (बु० पा०) ।

११--डाभ में नबमेश-दोर्घायु, धर्मी, धन स्वामी, स्नेही, राजा से लाभ पाने वाला

पुण्य करने मे विख्यात (मान०) | दीर्घायु, घमंयुक्त, धन स्वामी और स्नेही, राजा से

लाम पाने वाला, पुण्प्र में विख्यात (जा० सं०) । नित्य लाभ करने वाला, गुरुजनों का भक्त, गुणी, पुण्यात्मा (वृ ० पा") ।

१२--व्यय में नदमेश-बडा मानी, देशान्तर में रहने वाला, कुरूप, विद्यावान्‌

पापग्रह हो तो अत्यन्त धूर्त (मान०) । देशान्तर में लाम वाला, सुन्दर रूप घाला,

विद्यावान्‌, यदि पापग्रह हो तो कुबु.द्ध और धुत (जा० सं०) । भाग्यहीन, शुभकाय में

अधिक खर्च, अतिथियों के आदर से निधन (go पा०) 1

(९) नवमेश का विशेष फल

१--जन्म के बाद पिता मरण-नवमेश दुःस्थान में हो या २ पापग्रहों के बोच हो

या मंगल या शनि नवम घर में हो तो जन्म के बाद शीघ्र पिता का मरण हो (फल०) ।

२--पिता दीघंजीवी-यदि दिन में जन्म हो तो सूर्य, रात्रि में जन्म हो तो शनि

सुस्थित हो और शुभग्रह को दृष्टि हो नवमेश भो प्रबळ हो तो जातक का पिता दीघंजोवी होता हे (फल०) ।

-— अन्य पिता की रक्षा में-शनि नवमेश होकर चर राशि में हो और शुभ दृष्टि

न हो या सूर्य दुःस्थान में हो तो वह अन्य पिता की रक्षा में रह कर जीये (फल०) ।

४--दूसरा दत्तक बनावे-तवमेश या नवम घर में चर राशि हो और शनि से युक्‍त

गं हो यदि (२वां घर का स्वामी बली हो तो जातक को दूसरा दत्तक पुत्र बनावे

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५--कीतिमान्‌-नवमेश लग्न में हो तो जातक कीतिमानु हो (जा० पारि०)

$--विशेष कोति-नवमेश घन में हो वही उच्चादि से युपरत घन भाव में हो तो विशेष कीति हो (जा० पारि०) ।

७- शरीर नाश दुजंन-नवमेद दुष्ट स्थान में हो तो चंचल, यात्रा से शरीर का

नाझ हो वा दुर्जन हो (जा० पारि०) ।